भारत में समलैंगिक संबंध अपराध | दुनिया | DW | 11.12.2013
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दुनिया

भारत में समलैंगिक संबंध अपराध

समलैंगिकों के हक के लिए लड़ने वालों को बड़ा झटका देते हुए भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंध को अपराध करार दिया है. हाई कोर्ट के फैसले को पटलते हुए अदालत ने कहा कानून में बदलाव संसद की जिम्मेदारी है.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के 2009 में दिए गए उस फैसले को दरकिनार कर दिया, जिसमें वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था. बेंच ने विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों की उन अपीलों को स्वीकार कर लिया जिनमें हाई कोर्ट के फैसले को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि समलैंगिक संबंध देश के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों के खिलाफ हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध "अप्राकृतिक हरकत" हैं और यह गैरकानूनी है. बेंच ने कहा कि धारा 377 को हटाने या उसमें बदलाव करने का अधिकार संसद के पास है, लेकिन जब तक यह प्रावधान मौजूद है, तब तक कोर्ट इस तरह के यौन संबंधों को वैध नहीं ठहरा सकता. हालांकि बदलते समाज और सामने आती वैज्ञानिक जानकारी को संज्ञान में लेते हुए अदालत ने कहा कि समलैंगिकता पर कानून में परिवर्तन का संसद का काम है.

कोर्ट के फैसले से मायूस

सर्वोच्च अदालत के फैसले के साथ ही समलैंगिक संबंध के खिलाफ दंड प्रावधान प्रभाव में आ गया है. फैसले के बाद कोर्ट में मौजूद समलैंगिक कार्यकर्ता मायूस नजर आए. कोर्ट के बाहर मौजूद दर्जनों कार्यकर्ता रोने लगे और एक दूसरे को दिलासा देने के लिए गले मिलने लगे. समलैंगिकों के लिए लड़ाई लड़ने वाले संगठन हमसफर के अशोक रो कवि के मुताबिक, "यह हमारे लिए बहुत ही दुखद दिन है. समलैंगिक समुदाय के लोकतांत्रिक अधिकार की लड़ाई में हम फिर वापस उसी जगह पहुंच गए हैं.''

Oberstes Gericht in Indien

दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटा

वकील आनंद ग्रोवर के मुताबिक, ''हम बहुत हारा हुआ महसूस कर रहे हैं. लेकिन हमारी लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है. हम अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ाई जारी रखेंगे.'' कोर्ट के फैसले के बाद समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने कहा की वे सर्वोच्च अदालत से फैसले की समीक्षा की मांग करेंगे. कोर्ट का फैसला तमाम समलैंगिक विरोधियों, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के उन याचिकाओं के बाद आया है जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिक संबंध को अपराध मुक्त करार दिया था.

संसद के पाले में गेंद

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के मुद्दे पर लापरवाह रवैया अपनाने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई. साथ ही कोर्ट ने इस अहम मुद्दे पर संसद में चर्चा नहीं होने पर चिंता जाहिर की. गौरतलब है कि 2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने आपसी सहमति से वयस्कों के बीच बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने का आदेश दिया था.

भारतीय दंड संहिता, आईपीसी की धारा 377 के तहत सहमति से भी बनाए गए समलैंगिक संबंधों को जुर्म माना गया है. धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध अपराध है जिसमें उम्रकैद की सजा तक का प्रावधान है. केंद्र सरकार ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी थी कि भारत में करीब 25 लाख समलैंगिक लोग हैं और जिनमें 7 फीसदी (1.75 लाख) एचआईवी संक्रमित हैं. भारत में समलैंगिक संबंध को अपराध बनाने वाला कानून करीब 150 साल पुराना है और इसे बदलने की मांग समाज का एक तबका लंबे समय से कर रहा है.

एए/ओएसजे (पीटीआई, एएफपी)

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