भारत में ″ग्रीन″ पटाखा कहां से आएगा? | दुनिया | DW | 23.10.2018
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

भारत में "ग्रीन" पटाखा कहां से आएगा?

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में केवल "ग्रीन" पटाखे चलाने की इजाजत दी है लेकिन क्या सचमुच "ग्रीन" पटाखे होते हैं? पटाखा बनाने वालों का कहना है कि ऐसा कोई पटाखा नहीं और फिलहाल यह कोरी कल्पना है.

सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली के मौके पर दिल्ली में पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया. कोर्ट ने कहा है कि रात को आठ बजे से दस बजे तक पटाखे चलाए जा सकते हैं लेकिन यह सिर्फ ग्रीन "पटाखे" होने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर डाली है.

प्रदूषण से जूझती दिल्ली में पिछले साल पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था. इसका व्यापक विरोध भी हुआ और कई लोगों ने तो महज विरोध जताने के लिए ही पटाखे जलाए. इसमें व्यापारियों का भी काफी नुकसान हुआ क्योंकि कोर्ट ने पटाखे बेचने पर भी रोक लगा दी थी.

दुस्साहसी लोगों ने पास पड़ोस के इलाकों से जा कर पटाखे खरीदे और विरोध जताने के लिए जलाए. कोर्ट ने यह भी समझा है कि इस से उन हजारों लोगों के रोजगार पर भी असर पड़ेगा जो पटाखों के व्यवसाय या फिर निर्माण में जुटे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि सिर्फ लाइसेंस वाली दुकानों को ही पटाखे बेचने की अनुमति होगी और इसका ऑनलाइन व्यापार नहीं होगा.

कोर्ट ने रोक नहीं लगा कर राहत तो दे दी है लेकिन "ग्रीन" पटाखों की बात कह मामले को उलझा जरूर दिया है. डीडब्ल्यू ने यह समझने के लिए कि "ग्रीन" पटाखे क्या होते हैं पटाखा बनाने वालों से बात की. देश में पटाखा बनाने के सबसे बड़े केंद्र शिवकाशी में है. शिवकाशी पटाखा मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के सचिव कालीराजन मणियप्पन ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि "ग्रीन" पटाखा जैसी कोई चीज नहीं होती. मणियप्पन का कहना है, "यह पूरी तरह से काल्पनिक है, भारत सरकार चाहती है कि ऐसे पटाखे बनाए जाएं जो इकोफ्रेंडली और ग्रीन हों लेकिन यह अभी बने नहीं हैं. यह अभी सिर्फ विचार है."

दरअसल प्रदूषण पर मचते शोर और अदालतों की ओर से आते सख्त आदेशों के बाद यह बात उठी थी कि पटाखों को प्रदूषण रहित बनाया जाए. इसके लिए रिसर्च की शुरुआत भी हुई लेकिन यह इतना आसान नहीं है. पटाखा उद्योग ने इस बारे में सरकार से बात करने की कोशिश की. इसके लिए रिसर्च की जिम्मेदारी काउन्सिल ऑफ साइंटिफिक इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) और पेसो यानी पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोजिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन को सौंपी गई.

कोशिश यह थी कि उद्योग और सरकार के मंत्रालय इन संस्थाओं के साथ मिल कर इस बारे में कोई विकल्प ढूंढें. मरियप्पन का कहना है कि लैब में जो पटाखे बनाए गए हैं उन्हें औद्योगिक स्तर पर बनाने और परखने के लिए समय चाहिए. उन्होंने कहा, "इस पर कोई व्यापक सहमति बनाने की कोशिश ही नहीं हुई. रिसर्च संस्था ने उद्योग जगत से बात किए बगैर ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जिसमें पेसो की जिम्मेदारी उसमें शामिल विस्फोटकों के खतरे को देखना था. कोर्ट ने उसे विकल्प मान कर सरकार को उस पर आदेश जारी कर दिए कि ग्रीन क्रैकर ही बनाओ. जबकि फिलहाल ऐसा कोई क्रैकर तैयार है ही नहीं."

मरियप्पन का कहना है कि ग्रीन क्रैकर बनाने के लिए व्यापक रिसर्च के साथ और भी बहुत कुछ करने की जरूरत होगी. उनका कहना है कि हमें पारंपरिक कच्चे माल की जगह नए कच्चे माल का इस्तेमाल करना पड़ेगा और सबसे पहले उसकी सप्लाई सुनिश्चित करनी होगी. उन्होंने कहा कि पटाखों के बनाने में बहुत से रासायनों का इस्तेमाल होता है, अगर उनकी जगह दूसरी चीजों का इस्तेमाल करेंगे तो सिर्फ हल्की सी रोशनी भर दिखेगी, तो इनसे पटाखे नहीं बनेंगे. मरियप्पन का कहना है, "हम ऐसी कोशिशों का स्वागत करते हैं, हम भी चाहते हैं कि इकोफ्रेंडली पटाखे बनें लेकिन इसके लिए समय भी देना होगा. सारी तैयारियों में कम से कम 3-4 साल का समय लगेगा."

मरियप्पन ने कहा कि वे पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे और कोर्ट को बताएंगे कि फिलहाल इस तरह के पटाखे मौजूद नहीं हैं और जो पटाखे हैं, उन्हें ग्रीन नहीं कहा जा सकता. मरियप्पन कहते हैं, "सीएसआईआर पहले हमारे साथ मिल कर कम प्रदूषण वाले पटाखे विकसित करे. पेसो उसकी जांच करे और फिर हम उन्हें बनाने की तैयारी कर लें उसके बाद ही ये पटाखे बाजार तक पहुंच पाएंगे."

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन