भारत जारी रखेगा एड्स की सस्ती दवाएं बनाना | विज्ञान | DW | 08.07.2011
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विज्ञान

भारत जारी रखेगा एड्स की सस्ती दवाएं बनाना

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत ने आश्वासन दिया है कि वह यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार की अपनी प्रस्तावित संधि को एड्स के खिलाफ लाइसेंस के बिना बनने वाली दवाओं में कमी लाने के साथ नहीं जोड़ेगा.

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यूरोपीय संघ और भारत ने 2007 में मुक्त व्यापार की वार्ताएं शुरू की हैं, जिससे हर साल 134 अरब यूरो का नया व्यापार होने की संभावना है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सहित सामाजिक अभियान चलाने वालों ने इस पर चिंता जताई है कि इससे भारत की एंटी रेट्रोवाइरल एआरवी दवा बनाने की क्षमता घट जाएगी और दुनिया भर के गरीब एड्स की स्सती दवाओं से वंचित हो जाएंगे.

एड्स पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम यूएनएड्स के एक बयान में भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा के हवाले से कहा गया है, "भारत अनिवार्य लाइसेंसिंग के इस्तेमाल सहित कॉपीराइट संधि ट्रिप्स के तहत उपलब्ध नमनीयता का इस्तेमाल इस बात के लिए करेगा कि एचआईवी से संक्रिमित लोग सभी जान बचाने वाली दवाएं पा सकें."

Flash-Galerie HIV / Aids 2010

आनंद शर्मा ने ये बातें यूएनएड्स के कार्यकारी निदेशक मिशेल सिदिबे से बातचीत में कही. सिदिबे ने मंगलवार को समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा था कि यदि संधि के कारण भारत जेनेरिका दवाओं का उत्पादन रोक देता है तो लाखों लोग मर जाएंगे. गरीब देशों में डेढ़ करोड़ लोग एआरवी दवा पाने के अधिकारी हैं, हालांकि इस समय सिर्फ 66 लाख लोगों को चिकित्सा उपलब्ध है.

भारत का दवा उद्योग सस्ते जेनेरिका का 86 फीसदी बनाता है, जिसका उपयोग करने वाले अधिकांश लोग अफ्रीका में रहते हैं. इन दवाओं की कीमत प्रति व्यक्ति प्रति साल 137 डॉलर है जो पश्चिमी देशों की दवा कंपनियों द्वारा बेची जाने वाली पेटेंट वाली दवाओं का एक छोटा सा हिस्सा है.

भारत और यूरोपीय संघ के बीच सालाना कारोबार 2009 में 92 अरब डॉलर था, जिसके मुक्त व्यापार समझौता होते ही 134 अरब हो जाने की संभावना है. आर्थिक विशेषज्ञों की राय में 2015 तक इसके 237 अरब डॉलर हो जाने की उम्मीद है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: आभा एम

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