भारत को विश्व बैंक की मदद | दुनिया | DW | 13.04.2013
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दुनिया

भारत को विश्व बैंक की मदद

विश्व बैंक ने कहा है कि वह भारत को सालाना तीन से पांच अरब डॉलर की धनराशि देश के गरीब प्रांतों के विकास के लिए देगा. जरूरतमंदों की मदद के लिए भारत को अपने वसूली ढांचे को बदलने की जरूरत है.

विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने अंतरराष्ट्रीय समुदायों से मांग की है कि वे 2030 तक विश्व से गरीबी हटाने में हाथ बंटाए. विश्व बैंक 2030 तक भारत में गरीबी को 5.5 फीसदी तक लाना चाहता है. 2010 में गरीबी 29.8 फीसदी आंकी गई थी.

शहरी विकास से गरीबी दूर नहीं होगी

अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं, "भारत जैसे विशाल देश के लिए तीन से पांच अरब डॉलर विकास के लिए बहुत मामूली रकम है. यह सागर में बूंद जैसा है. इससे बहुत फर्क पड़ने की उम्मीद तो नहीं है, लेकिन इस बात का खतरा जरूर है कि विश्व बैंक इसके जरिए निजी सेक्टरों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा हो. अगर ऐसा है तो इससे देश की गरीबी का कोई लेना देना नहीं क्योंकि निजी सेक्टर गरीब आदमी की पहुंच से बाहर ही हैं."

विश्व बैंक का प्रस्ताव अपनी जगह है, लेकिन यदि गरीबों को फायदा पहुंचाना है तो भारत सरकार को केवल निजी सेक्टर में निवेश से ज्यादा सब्सिडी पर ध्यान देना होगा. भारत का विकास निरंतर शहरों की तरफ बढ़ रहा है, ऐसे में ग्रामीण आबादी शहरों की ओर पलायन कर रही है. लेकिन शहरों में रहने और जीने का खर्च गावों के मुकाबले कहीं अधिक है. विश्व बैंक द्वारा दी जाने वाली धनराशि को अगर गांवों के विकास में लगाया जाए तो उतने ही पैसों से ज्यादा फायदा भी उठाया जा सकेगा और असल गरीब तबके को सीधे सीधे फायदा होगा.

अरुण कुमार मानते हैं कि 2030 तक यानि सिर्फ 17 साल में गरीबी को जिस हद तक कम करने की बात विश्व बैंक कर रहा है वह संभव नहीं दिखता. विश्व बैंक के प्रस्ताव से यह भी लगता है कि शायद वह भारत सरकार की कोशिशों का सेहरा अपने सर पहनने की ताक में है, ताकि इस मामूली मदद से वह विकास की दिशा में खुद सरकार के प्रयासों में अपना योगदान गिना सके.

समस्या कुछ और

विश्व बैंक ने इस प्रस्ताव में कहा है कि चार वर्षीय योजना के तहत हर साल वह 60 फीसदी आर्थिक मदद सीधे भारत सरकार के विकास कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने के लिए देगा जबकि बाकी मदद देश के गरीब प्रांतों को निजी कार्यक्रमों के लिए दी जाएगी. भारत सरकार खुद गरीबी दूर करने और विकास के क्षेत्र में इससे कई गुना अधिक पैसा पहले ही लगा रही है. लेकिन समस्या स्कीमों के संचालन और भ्रष्टाचार की है. विविध स्कीमों में लगाया गया खुद देश की सरकार का पैसा पूरी तरह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता है. अगर पहुंचता भी है तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ कट छंट कर. ऐसे में सीधे केंद्र सरकार के विकास कार्यक्रमों में विश्व बैंक की दी हुई रकम का 60 फीसदी हिस्सा भी कहां तक मदद करेगा इस पर सवाल उठता है. हालांकि कुमार कहते हैं, "अगर भ्रष्टाचार और संचालन की दिक्कतों को ज्यों का त्यों माना जाए तो भी विश्व बैंक से मिलने वाली रकम कुछ फायदा तो पहुंचाएगी ही."

कर चोरी से निबटना जरूरी

कुमार ने डॉयचे वेले से कहा, "भारत सरकार को आय कर चोरों की वजह से हर साल 400 अरब डॉलर का नुकसान होता है, जो विश्व बैंक की प्रस्तावित मदद से सौ गुना ज्यादा है. अगर सरकार इससे निबटने के रास्ते ही ढूंढ ले तो गरीबी दूर करने में बाहरी मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी."

ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में औसतन चार फीसदी लोग ही आयकर भरते हैं. अगर इस समस्या का समाधान हो जाए तो सरकार को हासिल होने वाली रकम किसी भी मदद के सामने कहीं ज्यादा होगी.

गरीबी को हर कोई अलग तरह से आंकता है. अगर अंतरराष्ट्रीय मानकों से यानि दो डॉलर प्रतिदिन आय के हिसाब से देखें तो भारत की 80 फीसदी आबादी गरीब कहलाएगी, लेकिन भारत के सरकारी आंकड़े इसे मात्र 29.8 फीसदी ही बताते हैं. सवाल यह है कि गरीबी को अंतरराष्ट्रीय चश्मा लगाकर देखा जा रहा है या भारत जैसे देश में जरूरतों को ध्यान में रख कर. किसी भी बाहरी मदद से ज्यादा जरूरी है देश का खुद का आंतरिक ढांचा बदलना, स्कीमों का सही संचालन और भ्रष्टाचार को खत्म करना.

रिपोर्ट: समरा फातिमा

संपादन: महेश झा

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