भारत की पर्यावरण न्याय की गुहार | दुनिया | DW | 23.11.2015
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

भारत की पर्यावरण न्याय की गुहार

फ्रांस की राजधानी पेरिस में 30 नवंबर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 138 देशों के राज्य व सरकार प्रमुख जलवायु सम्मेलन में मिल रहे हैं. पर्यावरण रक्षा के कदम तय करने वाली इस बैठक में भारत पर्यावरण न्याय की मांग करेगा.

दुनिया के सभी देशों द्वारा ग्लोबल वॉर्मिग को कम करने पर लक्षित इस सम्मेलन में 2020 से उठाए जाने वाले कदम तय होने हैं. पेरिस में जिहादी कत्लेआम के सिर्फ दो हफ्ते बाद होने वाले सम्मेलन के बारे में फ्रांस ने कहा है, वह सम्मेलन को रद्द कर "हिंसा के सामने घुटने नहीं टेकेगा." दो हफ्ते पहले हुए क्रमबद्ध जिहादी हमलों में 130 लोग मारे गए थे. पिछले दिनों अधिकारियों ने सुरक्षा चिंता का हवाला देकर दो रैलियों को रद्द कर दिया था.

फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा है कि किसी देश के राष्ट्रपति ने आतंकी हमलों के कारण पेरिस आने से मना नहीं किया है. एक बयान में कहा गया है कि हमलों के कारण व्यस्तता के बावजूद राष्ट्रपति पर्यावरण सम्मेलन पर पूरा ध्यान देंगे. पेरिस पर्यावरण सम्मेलन में राज्य व सरकार प्रमुखों के अलावा दुनिया भर के 40,000 प्रतिनिधि, पत्रकार, पर्यवेक्षक और प्रदर्शक भाग लेंगे.

इस साल के पर्यावरण शिखर सम्मेलन का लक्ष्य ग्लोबल वॉर्मिंग में वृद्धि की दर को औद्योगिक क्रांति के पहले के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकना है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस सीमा से आगे बढ़ने पर बाढ़, तूफान और बढ़ते समुद्री जल स्तर का सामना कर रही धरती पर जीवन के लिए मुश्किलें पैदा होने लगेंगी. लेकिन धनी और विकासशील देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं.

धनी और विकासशील देशों के बीच इस बात पर गहरे मतभेद हैं कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कौन क्या करे और इन कदमों का खर्च कौन उठाए. भारत का कहना है कि वह जलवायु सम्मेलन में पर्यावरण न्याय की मांग करेगा. पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने विकसित देशों से ज्यादा सख्त कदम उठाने की मांग की है ताकि गरीब देशों के विकास के क्रम में अपरिहार्य कार्बन उत्सर्जन के लिए "कार्बन स्पेस" खाली हो सके.

प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि भारत "प्रदूषणकर्ता खर्च उठाए" की नीति पर जोर देगा. उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि दुनिया के अरबों गरीबों के साथ पर्यावरण न्याय हो. भारत और दूसरे विकासशील देशों ने अपने हिस्से से ज्यादा जिम्मेदारी उठायी है, विकसित दुनिया ने अपनी क्षमता से बहुत कम हिस्सा लिया है." उन्होंने कहा कि विकसित देशों को वित्त और तकनीक में पहल करनी चाहिए, तकनीक समाधान लाती है, उसे सस्ते में उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

दुनिया में अमेरिका और चीन के बाद सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले भारत ने 2030 तक कार्बन सक्रियता में 35 प्रतिशत की कमी करने का वादा किया था. कार्बन सक्रियाता सकल घरेलू उत्पादन में प्रति डॉलर प्रदूषण की मात्रा है. अमेरिका और चीन के विपरीत बिजली की भारी कमी का सामना कर रहे भारत ने कार्बन उत्सर्जन कम करने का कोई लक्ष्य तो नहीं ही दिया है, उसने 2020 तक कोयला उत्पादन दुगुना करने की भी बात कही है. भारत का कहना है कि सख्त पर्यावरण लक्ष्यों का असर भारत की गरीब आबादी का जीवन स्तर सुधारने के प्रयासों पर पड़ेगा.

एमजे/एसएफ (एएफपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री

विज्ञापन