भारत की अदालतों में जाने से क्यों बचते हैं लोग? | ब्लॉग | DW | 24.01.2018
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ब्लॉग

भारत की अदालतों में जाने से क्यों बचते हैं लोग?

भारत की अदालतों में जाने की बजाय पड़ोसियों, रिश्तेदारों, जाति संगठनों और पंचायतों में जाना ही लोगों के लिए सुविधाजनक क्यों रहता है?

गैर-सरकारी संस्था दक्ष के कराये गये एक व्यापक सर्वेक्षण से जो निष्कर्ष सामने आया है वह लोगों को बिना किसी सर्वेक्षण के भी पता है. निष्कर्ष है कि अधिकांश भारतीय (73-74 प्रतिशत) पुलिस या अदालत का दरवाज़ा खटखटाने के बजाय दोस्तों, रिश्तेदारों, जाति संगठनों, पंचायतों और इसी तरह के पारम्परिक तरीकों का सहारा लेना बेहतर समझते हैं क्योंकि भारत में न्यायव्यवस्था बेहद खर्चीली तो है ही, हद से ज्यादा सुस्त भी है.

अंग्रेजी की कहावत "जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड" (न्याय में देरी का अर्थ न्याय से वंचित करना है) भारत में नहीं चलती. यहां न्याय का चक्का बहुत धीमे-धीमे ही घूमता है. अगर आदमी अमीर और असरदार हो, तो उसके लिए त्वरित न्याय भी उपलब्ध है हालांकि संविधान में सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा दिया गया है.

लोग भूले नहीं हैं कि जब राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देश के प्रमुख उद्योगपति ललितमोहन थापर पर छापा डलवा कर उन्हें गिरफ्तार कराया था तो सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने आधी रात को अपने निवासस्थान पर मामले की सुनवाई कर उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया था. आज भी इसी की पुनरावृत्ति होती रहती है जबकि न्याय की उम्मीद में अनेक विचाराधीन कैदी (वे कैदी जो अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाकर कैद की सजा पाये बिना ही मुकदमों की सुनवाई के इन्तजार में जेल की सलाखों के पीछे रहते हैं) अपनी उम्र का बेहतरीन हिस्सा जेल में ही गुजार देते हैं. असम के मचांग लालुंग को कौन भुला सकता है जिसने बिना किसी अपराध का दोषी होते हुए 54 वर्ष जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में गुजारे थे.

भारत में अदालत जाने का मतलब है लगातार अदालत के कर्मचारियों पर, अदालती कागजात तैयार कराने पर और वकीलों पर खर्च करते जाना, और बरसों नहीं बल्कि दशकों तक वहां न्याय की उम्मीद में धक्के खाना. निचली अदालतों में हर कदम पर चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है वरना वादी या प्रतिवादी को जज के सामने पेश होने के लिए आवाज तक नहीं लगेगी. पुरानी कहावत है कि दीवानी (सिविल) का मुकदमा आदमी को दीवाना बना देता है. तारीख पर तारीख पड़ती रहती है, जजों के तबादले होते रहते हैं, नया जज आने पर हर चीज नए सिरे से शुरू होती है, और मुकदमा चलता रहता है. ऐसे में कोई भी व्यक्ति अदालत में समय और धन बर्बाद करने के बजाय विवाद सुलझाने के पारम्परिक तरीकों और सामाजिक संस्थाओं का सहारा क्यों नहीं लेगा?

सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, न्यायिक प्रक्रिया में सुधार के लिए जबानी जमाखर्च करने के अलावा वह कुछ नहीं करती. इस समय स्वयं सुप्रीम कोर्ट में जजों के छह पद खाली पड़े हैं. विभिन्न हाईकोर्टों में चार सौ से अधिक और विभिन्न जिला अदालतों में छह हजार से अधिक जजों के पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं. ऐसे में अगर मुक़दमे दशकों तक लटके रहते हैं तो यह आश्चर्य की बात नहीं है. इस समय भारत की विभिन्न अदालतों में लगभग तीन करोड़ मुकदमें लटके पड़े हैं. अदालतों की इमारतों का हाल अक्सर काफी खराब होता है और उन्हें मिलने वाली ढांचागत सुविधाएं भी काफी कम हैं. इस सबका उनके कामकाज की गुणवत्ता और रफ़्तार, दोनों पर बुरा असर पड़ता है.

भारत में न्याय प्रक्रिया जटिल भी बहुत है. अंग्रेजों के जमाने के हजारों कानून समाप्त किये जाने चाहिएं लेकिन इस और कोई ध्यान नहीं दिया जाता. कानून को सरल और नागरिकों को सहूलियत देने वाला बनाने की जरूरत को भी नजरअंदाज किया जाता रहा है. ऐसे में यदि आम आदमी अदालत और पुलिस के पास जाने से घबराता है तो यह वहुत ही स्वाभाविक है.

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