भारतीय डाक घाटे में बीएसएनएल से भी आगे निकला | भारत | DW | 17.04.2019
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

भारत

भारतीय डाक घाटे में बीएसएनएल से भी आगे निकला

बीएसएनएल घाटे के चलते अपने कर्मचारियों को तनख्वाह नहीं दे पा रही है. एयर इंडिया भी ऐसे विवादों में आती रहती है लेकिन भारतीय डाक अब घाटे के मामले में इन दोनों से आगे निकल गई है.

छह साल पहले एक सरकारी कंपनी ने अपने विज्ञापनों की एक सीरीज लॉन्च की. इन विज्ञापनों में एक सामान्य बात यह थी कि ये इस कंपनी की देश की दुर्गम जगहों तक पहुंच को दिखा रहे थे. कंपनी का नाम था इंडिया पोस्ट. जिसे भारतीय डाक भी कहते हैं. एक विज्ञापन में दुनिया का सबसे ऊंचाई पर स्थित भारतीय डाकखाना दिखाया गया था. यह हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति के हिक्किम में 15,500 फीट की ऊंचाई पर था. इतनी ऊंचाई पर डाकखाना खोलने वाली कंपनी खुद डूबने की कगार पर आ गई है. एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में भारतीय डाक का घाटा सबसे अधिक हो गया है. इसने बीएसएनएल और एयर इंडिया को भी घाटे में पीछे छोड़ दिया है. 1854 से चल रहा भारतीय डाक अब गर्त में जा रहा है.

पिछले तीन वित्त वर्षों में डाक विभाग का घाटा करीब 150 प्रतिशत बढ़ गया है. वित्त वर्ष 2016 में यह घाटा करीब 6,007 करोड़ था जो वित्त वर्ष 2019 में बढ़कर करीब 15,000 करोड़ हो गया है. दो और बड़ी सरकारी कंपनियां बीएसएनएल करीब 7,500 करोड़ और एयर इंडिया करीब 5,337 करोड़ के घाटे में हैं. फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इसका बड़ा कारण है भारतीय डाक का भारी भरकम अमला. भारतीय डाक का करीब 90 प्रतिशत राजस्व कर्मचारियों की तनख्वाह देने में खर्च हो जाता है. डाक विभाग का कुल राजस्व लगभग 18,000 करोड़ रुपये का है. इसमें से करीब 16,620 करोड़ रुपये कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर ही खर्च हो रहे हैं. अगर इस खर्च में पेंशन खर्च लगभग 9,782 करोड़ रुपये को भी जोड़ दिया जाए तो कुल खर्च 26,400 करोड़ हो जाता है. यह कंपनी के कुल राजस्व से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है.

दो साल के भीतर ऐसे कंगाल हुआ बीएसएनएल

इस घाटे की वजह क्या है

भारतीय डाक चिट्ठी पार्सल भेजने के अलावा बचत योजनाएं, पेमेंट्स बैंक और एक ई-कॉमर्स पोर्टल भी चलाती है. भारतीय डाक में लगभग 4 लाख 33 हजार कर्मचारी काम करते हैं. पूरे भारत में इसके लगभग 1 लाख 56 हजार डाकघर हैं जो पूरे देश में मौजूद सभी व्यवसायिक बैंकों की शाखाओं से 50 हजार ज्यादा है. रिपोर्ट के मुताबिक समय के साथ कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है लेकिन कंपनी का राजस्व उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है. वित्त वर्ष 2020 में कंपनी को 19,203 रुपये के राजस्व की कमाई का अनुमान है. इसमें से 17,451 रुपये वेतन-भत्तों और 10,271 रुपये पेंशन देने में खर्च हो जाने का अनुमान है. इस अनुमान के मुताबिक ये घाटा और बढ़ेगा. इससे आगे चलकर कंपनी डूब भी सकती है.

अनुमान के मुताबिक, एक पोस्टकार्ड भेजने में भारतीय डाक का करीब 12.15 रुपये खर्च करता है लेकिन इससे महज 50 पैसे की कमाई होती है. ऐसे ही एक पार्सल भेजने में 89.23 रुपये खर्च होते हैं लकिन आमदनी इसकी आधी होती है. बुक पोस्ट, स्पीड पोस्ट और दूसरी सेवाओं में भी घाटा हो रहा है. सेवा शुल्क और खर्चे का अंतर ज्यादा है जिससे घाटा बढ़ रहा है. राजस्व में कमी आने का एक बड़ा कारण तकनीकी विकास भी है. मोबाइल, ईमेल और निजी कूरियर कंपनियों के आने से भारतीय डाक को नुकसान हुआ है.

जनवरी, 2019 में सरकार की ओर से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि मोदी सरकार में स्पीड पोस्ट का राजस्व दोगुने से भी ज्यादा बढ़ा है. 2014 के 788 करोड़ के मुकाबले यह 2018 में 1,682 करोड़ हो गया है. साथ ही सरकारी प्रबंधन के तहत आने वाली परिसंपत्तियों में भी बढ़ोत्तरी हुई है. 2014 में स्पेशल सिक्योरिटी और फ्लोटिंग रेट बॉन्डस की राशि 25,856 करोड़ थी जो 2018 में 25,856 करोड़ हो गई. लेकिन इन सालो में कर्मचारियों की आय, सामान की लागत, डीजल की कीमतें, सरकारी इमारतों का सर्विस टैक्स भी बढ़ा है. इससे भारतीय डाक का खर्च भी बढ़ता गया.

सरकार के पास क्या समाधान

व्यय सचिव की अध्यक्षता में हुई वित्त व्यय समिति की बैठक में कहा गया कि केंद्र सरकार भारतीय डाक का घाटा कम करने के लिए इतनी आर्थिक मदद नहीं दे सकती है. भारतीय डाक को ही अपने खर्चों में कटौती करनी होगी. अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाने के साथ  सुविधाओं में विविधता लाने और कर्मचारियों का सही तरह से इस्तेमाल करने के निर्देश दिए.

भारत में टिकटोक पर क्यों लगी रोक?

हालांकि भारतीय डाक अपने घाटे को कम करने के लिए नए कदम भी उठा रहा है. डाकघरों में नए तरह की पोस्ट शॉप खोलना, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, म्यूचुअल फंड और बीमा पॉलिसी बेचना, पासपोर्ट सर्विस देना और रेलवे टिकट बेचना इसमें शामिल हैं. लेकिन इन सबसे साल 2018 में 844 करोड़ रुपये का ही राजस्व जमा हो सका. अभी भी अधिकतर राजस्व राष्ट्रीय बचत योजना और बचत प्रमाण पत्रों से ही आ रहा है.

2017 में पेमेंट बैंक खोलने के साथ ग्रामीण कलाकारों और स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को बेचने के लिए एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी खोला गया. इससे भी ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा. बड़े और दूर-दराज तक फैले नेटवर्क के चलते डाक विभाग अब अमेजॉन, फ्लिपकार्ट जैसी बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों का डिलिवरी पार्टनर बन सकता है लेकिन फिलहाल डाक विभाग के पास बड़े वेयरहाउस नहीं हैं. इसकी वजह से बड़े स्तर पर यह नहीं हो पा रहा है.

भारत में सरकारी कंपनियों के घाटे में जाने का सिलसिला अभी जारी है. इनको कैसे घाटे से निकाला जाएगा और एक मुनाफा देने वाली कंपनी बनाया जाएगा वो तो आने वाली सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा.

DW.COM

विज्ञापन