भारतीय डाक्टरों में मची इंग्लैंड जाने की होड़ | दुनिया | DW | 14.12.2018
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दुनिया

भारतीय डाक्टरों में मची इंग्लैंड जाने की होड़

इंग्लैंड में गैर-यूरोपीय संघ के देशों के चिकित्सा विशेषज्ञों की पढ़ाई और तैनाती की तादाद पर लागू सीमा हटने के बाद भारत से डाक्टरों में वहां जाने की होड़ मच गई है.

इसका असर यूं तो पूरे भारत में हो रहा है लेकिन कोलकाता के कई अस्पतालों को विशेषज्ञों और जूनियर डॉक्टरों की कमी से जूझना पड़ रहा है. विशेषज्ञों ने निकट भविष्य में डॉक्टरों की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में गंभीर संकट पैदा होने का अंदेशा जताया है. पहले बाहरी देशों से पढ़ाई व नौकरी के लिए इंग्लैंड जाने वाले चिकित्सा विशेषज्ञों की सालाना तादाद 20,700 तक तय थी. इसे हाल में हटा लिया गया है. अब भारतीय डॉक्टर वहां की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) में शामिल हो सकते हैं.

ब्रिटिश एसोसिएशन आफ फिजिशियंस ऑफ इंडियन ओरिजिन समेत विभिन्न स्वास्थ्य सेवा समूहों की लॉबिंग की वजह से हाल में सालाना वीजा की अधिकतम सीमा खत्म कर दी गई थी. इन संगठनों की दलील थी कि भारतीय डॉक्टरों से नेशनल हेल्थ सर्विस में चिकित्सकों की भारी कमी को पूरा किया जा सकता है. बीते साल दिसंबर से इस साल जून तक डॉक्टरों, इंजीनियरों समेत छह हजार से ज्यादा लोगों को महज इसलिए इंग्लैंड का वीजा नहीं मिल सका कि उनकी तादाद तय सीमा तक पहुंच गई थी. बीती मई में एनएचएस में नौकरी पाने के बावजूद सौ डॉक्टरों को वीजा नहीं मिल सका था.

कलकत्ता मेडिकल कालेज से डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले देवांजन सिन्हा ने एमआरसीपी के लिए वर्ष 2005 में लंदन जाने की पूरी तैयारी कर ली थी. लेकिन वीजा नहीं मिलने की वजह से उनके सपने पर पानी फिर गया. इंगलैंड में प्रैक्टिस करने के लिए जरूरी पीएलएबी टेस्ट पास करने के बावजूद सिन्हा जैसे हजारों डॉक्टर इंग्लैंड नहीं जा सके थे. लेकिन अब यूरोपीय संघ के बाहर के देशों से आने वाले पेशेवरों के लिए टीयर-2 (जनरल) वीजा की सीमा खत्म हो जाने के बाद सिन्हा जैसे डॉक्टरों के मन में फिर सपने सजने लगे हैं. इंग्लैंड में पढ़ाई के इच्छुक मेडिकल छात्रों के लिए कोचिंग चलाने वाले प्रतीक चटर्जी कहते हैं, "पीएलएबी टेस्ट पास करने के बावजूद इंग्लैंड के अस्पतालों में उच्चशिक्षा या प्रैक्टिस से वंचित लोगों को अब अपना लंदन जाने का सपना अचानक साकार होता नजर आ रहा है.” वह बताते हैं कि उनके संस्थान के छह छात्र अगले दो-तीन महीने में ही लंदन जा रहे हैं. उक्त परीक्षा की फीस लगभग एक लाख रुपए है. लेकिन कॉरपोरेट अस्पतालों में रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर (आरएमओ) के तौर पर काम करने वालों के लिए यह कोई बड़ी रकम नहीं है. यही वजह है कि अगले कुछ महीनों के दौरान भारी तादाद में मेडिकल छात्र और विशेषज्ञ डॉक्टर लंदन जाने की तैयारी कर रहे हैं.

इंग्लैंड जाने की होड़

महानगर कोलकाता के तमाम अस्पतालों में जूनियर से लेकर सीनियर डॉक्टरों में पढ़ाई या नौकरी के लिए इंग्लैंड जाने की बढ़ती होड़ को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र में निकट भविष्य में गंभीर संकट का अंदेशा जताया है. स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले से ही योग्य व अनुभवी डॉक्टरों की भारी कमी है. अब इंग्लैंड की ओर से वीजा पर लगी पाबंदी खत्म होने के बाद ये संकट और बढ़ सकता है. कोलकाता के पीयरलेस अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुजीत कर पुरकायस्थ कहते हैं, "बीते चार महीनों के दौरान कम से कम दस वरिष्ठ डाक्टकरों ने नौकरी छोड़ दी है. इससे खाली हुई जगह को भरना मुश्किल साबित हो रहा है. इसका असर इलाज की गुणवत्ता पर पड़ना तय है.” एक अन्य जाने-माने अस्पताल बेल व्यू क्लीनिक के कई विशेषज्ञ डॉक्टर भी बीते तीन महीनों के दौरान नौकरी छोड़ चुके हैं. अस्पताल प्रबंधन को अंदेशा है कि अगले दो-तीन महीनों में उसे विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी से जूझना पड़ सकता है.

बेल व्यू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी. टंडन कहते हैं, "जूनियर से लेकर सीनियर तक तमाम स्वास्थ्य विशेषज्ञ इंग्लैंड जाने की कतार में हैं. जल्दी ही हमें डॉक्टरों की कमी से जूझना पड़ सकता है. जूनियर डॉक्टर वहां पढ़ने जा रहे हैं तो सीनियर डॉक्टर नौकरी के ऑफर के साथ.” रूबी जनरल अस्पताल और फोर्टिस अस्पताल के कुछ डॉक्टरों ने भी इसी महीने नौकरी छोड़ दी है. लेकिन वहां फिलहाल कोई संकट नहीं है. एक अस्पताल के महाप्रबंधक शुभाषीष दत्त कहते हैं, "कुछ डॉक्टर इस मौके का फायदा जरूर उठाना चाहेंगे. आखिर हर कोई अपना करियर बेहतर बनाने का प्रयास करता है. लेकिन हमारे अस्पताल में फिलहाल पर्याप्त डॉक्टर हैं.” महानगर में शायद ही ऐसा कोई अस्पताल है जहां के कुछ डॉक्टरों ने बीते-दो-तीन महीनों के दौरान इंग्लैंड जाने के लिए अपनी नौकरी नहीं छोड़ी हो. पुरकायस्थ कहते हैं, "कोलकाता और बंगाल के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है.”

वजह

स्वास्थ्य सेवा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इंगलैंड में आव्रजन संबंधी नए बदलावों से यहां से ब्रेन ड्रेन यानी प्रतिभाओं का पलायन शुरू हो गया है. मध्यम-स्तर के डॉक्टर सिर्फ पैसों नहीं बल्कि शांति व पेशेवर माहौल की वजह से इंग्लैंड की ओर आकर्षित हो रहे हैं. इंग्लैंड की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) ने इस साल अपनी 70वीं वर्षगांठ के दौरान माना था कि भारतीय डॉक्टर ही उसकी रीढ़ की हड्डी हैं. लंदन के सेंट एंड्रूयूज अस्पताल में काम करने वाले कोलकाता के डॉक्टर प्रताप चटर्जी बताते हैं, "वहां मौसम काफी सर्द है और अंग्रेजी बोलने का लहजा अलग है. लेकिन कामकाज बेहद पेशेवर है. एक अन्य डॉक्टर सोमेन बनर्जी कहते हैं, "एनएचएस में कार्य संस्कृति काफी बेहतर है.” वह बताते हैं कि वीजा की दिक्क्त की वजह से पहले ज्यादा लोग नहीं आते थे. लेकिन अब इस पाबंदी के खत्म हो जाने की वजह से अगले कुछ महीनों में भारत से काफी डॉक्टरों के लंदन और आसपास के इलाकों में पहुंचने का अनुमान है.

मेडिका सुपरस्पेशलिटी अस्पताल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आलोक राय कहते हैं, "डॉक्टरों के लिए कोलकाता में अब कामकाज का माहौल पहले जैसा नहीं रहा. बीते दो-तीन साल के दौरान मरीजों के परिजनों की ओर से मारपीट की कई घटनाएं हुई हैं.” राय के मुताबिक, जल्दी ही यहां से डॉक्टरों का पलायन तेज होने का अंदेशा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अकेले कोलकाता नहीं बल्कि पूरे देश में है. सरकार को इस संकट से निपटने की दिशा में अभी से ठोस कदम उठाने होंगे.

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