भविष्य का ईंधन बायोस्पिरिट | विज्ञान | DW | 26.09.2012
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विज्ञान

भविष्य का ईंधन बायोस्पिरिट

मक्के या दूसरे अनाज से बनने वाला बायो ईंधन पर्यावरण के लिए ठीक है या नहीं इस विवाद के बीच ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए. पेट्रोल कंपनी शेल खेत से मिलने वाले ईंधन का भविष्य अच्छा आंकती है.

जर्मन पेट्रोल पंप पर इन दिनों एक और ईंधन गाड़ियों में भरने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका नाम है ई10. यह कच्चे तेल वाला ऐसा ईंधन है जिसमें 10 फीसदी बायो ईंधन का इस्तेमाल किया गया है. लोगों में ये डर नहीं है कि पौधे से बना तेल उनकी कार या गाड़ी को नुकसान पहुंचाएगा, उनकी चिंता कुछ और है. जर्मनी के विकास मंत्री डिर्क नीबेल ने कुछ ही दिनों पहले कहा था कि फसल लोगों के लिए उगाई जानी चाहिए न कि हमारी कारों को पर्यावरण के लिए अच्छा बनाने के लिए. नीबेल ने इस विवाद को टैंक या प्लेट का नाम दिया है. और जर्मनी में ई10 की बिक्री रोकने के लिए कई लोगों ने उनका साथ दिया.

ई10 अंतिम नहीं

ब्रिटिश नीदरलैंड्स की तेल कंपनी शेल ने जैव ईंधन के भविष्य के बारे में एक शोध पेश किया है. शेल सालाना आधा अरब मुनाफे के साथ दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है. इसका मुख्य व्यापार कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल हैं. टिकाऊ विकास की दिशा में दो निजी संस्थाओं के साथ शेल ने जैव ईंधन के बारे में शोध पेश किया.

शेल जैव ईंधन रिसर्च में कहा गया कि भविष्य के एनर्जी मिक्स में ये अहम भूमिका निभाएंगे. जर्मनी में फिलहाल जैव ईंधन का कुल ईंधन में हिस्सा 5.6 फीसदी है और यूरोप में औसतन साढ़े चार प्रतिशत. अंदाजा है कि 2030 तक ईंधन में बायोस्पिरिट का हिस्सा 20 और 2050 तक 70 प्रतिशत तक बढ़ सकता है.

दूसरी पीढ़ी

रिसर्च में कहा गया है कि पेट्रोल और डीजल में पौधों से मिलने वाला पदार्थ तेजी से बढ़ेगा लेकिन इससे अनाज में कमी नहीं होगी क्योंकि यह तत्व नए तरीके से निकाले जाएंगे जिसे जैव ईंधन की दूसरी पीढ़ी कहा जा रहा है. अभी तक सरसों, मक्का, गन्ना से जैव ईंधन बनाए जाते थे. इसलिए टैंक या प्लेट का विवाद सामने आया. अगली पीढ़ी के उत्पाद कुछ हट के होंगे. वह पौधों के ऐसे हिस्सों से बनाए जाएंगे जो खाने के काम नहीं आते. जैसे कि जैविक कचरा, सूखी पत्तियां, जड़ें या टहनियां.

हालांकि कारों और लॉरियों के इंजन फिलहाल ज्यादा बायोईंधन वाले पेट्रोल के लिए नहीं बनाए गए हैं इसलिए इन्हें भी थोड़ा बदलना होगा. इसमें समय लगेगा. जैव ईंधन के विशेषज्ञ ऊवे फ्रिट्शे भी इस रिसर्च में शामिल थे. उनकी मांग है कि दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन का यूरोप में बाजार तैयार करने के लिए दस साल का प्रोग्राम चलाया जाना चाहिए.

पेट्रोल या डीजल के साथ जैविक तत्वों को मिलाने का मुख्य कारण ईकोफ्रेंड्ली ईंधन बनाना है जिससे कार्बन डाइऑक्साइड और बाकी जहरीली गैसों का उत्सर्जन कम हो. यूरोपीय आयोग दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन को बढ़ावा देना चाहता है और टैंक या प्लेट की बहस का हल भी. इसके लिए जरूरी है कि पौधों के बचे हुए हिस्से या सेल्यूलोज का इस्तेमाल हो. यूरोपीय संघ ऊर्जा आयुक्त गुंथर ओएटिंगर की प्रवक्ता ने कहा कि पौधे के किसी भी हिस्से से इसे निकाला जा सकता है.

इकोफ्रेंड्ली

शेल की स्टडी में कहा गया है कि पौधों का हिस्सा बढ़ाना तब ही सही रहेगा जब पेट्रोल डीजल का इस्तेमाल कम हो. अगर यह सफल हो जाए और बायोईंधन के सही मूल्यांकन अगर हो जाएगा तो कार्बन डायोक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम हो सकेगा.

बायोईंधन इसलिए भी अहम है क्योंकि बेंजीन पेट्रोल जैसे प्राकृतिक संसाधन कभी न कभी खत्म हो जाएंगे लेकिन पौधे, सेल्यूलोज बढ़ते रहेंगे. इसलिए इन टिकाऊ जैविक पदार्थों की ईंधन में मात्रा बढ़ने के साथ पर्यावरण में यातायात के कारण जाने वाली जहरीली गैसें काफी कम होंगी.

रिपोर्टः डिर्क काउफमान/आभा मोंढे

संपादनः एन रंजन

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