ब्लड टेस्ट से पता चलेगा अल्जाइमर | विज्ञान | DW | 10.03.2014
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विज्ञान

ब्लड टेस्ट से पता चलेगा अल्जाइमर

अमेरिका में रिसर्चरों का कहना है कि उन्होंने एक ऐसा प्रोटोटाइप ब्लड टेस्ट विकसित किया है जिसमें यह पता चल जाएगा कि एक स्वस्थ व्यक्ति को तीन साल के भीतर अल्जाइमर रोग होगा या नहीं.

रिसर्चरों का दावा है कि प्रोटोटाइप ब्लड टेस्ट के नतीजे 90 फीसदी सटीक हैं. नेचर पत्रिका में छपे शोध के मुताबिक परीक्षण चरबीदार प्रोटीन वसा के 10 चिह्नकों की खोज करता है. शोध के लेखक के मुताबिक टेस्ट उन परिवारों के लिए मददगार साबित होगा जिनके सदस्यों में असाध्य बीमारी का विकास हो रहा है. परिवार बेहतर देखभाल करने के बारे में जल्द फैसला ले पाएंगे. साथ ही वे बीमारी के इलाज के लिए विकल्प तलाश पाएंगे. भूलने की इस भयंकर बीमारी की भविष्वाणी के लिए प्रोटोटाइप तकनीक को आंकने के लिए कई साल तक क्लिनिकल परीक्षण की जरूरत पड़ेगी. आम तौर पर डिमेंशिया बुढ़ापे में सामने आने वाली दिमागी बीमारी है. लेकिन सिर की चोट की वजह से यह पहले भी हो सकती है. इसके शिकार लोग अक्सर भूलने लगते हैं. उन्हें बोलने में, किसी चीज पर ध्यान देने या फिर बहुत मामूली काम में भी परेशानी होती है. हाल की रिसर्च में सामने आया है कि डायबिटीज के मरीजों को इसका ज्यादा खतरा रहता है. फिलहाल इस बीमारी का इलाज नहीं मिल पाया है. दुनिया भर में साढ़े तीन करोड़ लोगों को यह बीमारी है. ऐसी संभावना है कि 2050 तक विश्व में 11.5 करोड़ लोग डिमेंशिया से जूझ रहे होंगे.

अल्जाइमर का जल्द पता चलेगा

शोधकर्ताओं ने इस परीक्षण को करने के लिए 70 वर्ष से अधिक उम्र वाले 525 लोगों के खून के साथ शुरुआत की. तीन साल बाद उन्होंने 53 लोगों के समूह की जांच की जिन्में अल्जाइमर के शुरुआती लक्षण विकसित हो रहे थे. इस समूह के खून के नमूनों को 53 अन्य लोगों के नमूनों के साथ तुलना की गई, यह जानने के लिए कि दोनों में क्या फर्क है. इस परीक्षण में वैज्ञानिकों ने 10 वसा प्रोटीन को चिह्नित किया.

वॉशिंगटन में जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय के मेडिकल सेंटर में तंत्रिकाविज्ञान के प्रोफेसर होवार्ड फेडेरोफ के मुताबिक, "हमारा नया रक्त परीक्षण उन लोगों की पहचान करने की क्षमता प्रदान करता है जिन्हें संज्ञानात्मक गिरावट का खतरा है. और वह मरीज, उसके परिवार और इलाज कर रहे डॉक्टरों के लिए योजना और विकार का प्रबंधन करने में परिवर्तन ला सकता है."

प्रोफेसर के मुताबिक तकनीक बीमारी का इलाज करने के प्रयासों में मदद भी दे सकती है. विकसित देशों में भूलने से जुड़ी बिमारियों से 20 से 50 फीसदी लोग पीड़ित हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि बीमारी का पता चलने की स्थिति में दवाइयां शुरू की जा सकती हैं. जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा उतना प्रभावी साबित हो सकता है. फेडेरोफ कहते हैं कि अगर इस तरह का परीक्षण शुरुआती चरणों में होता है तो बीमारी को रोकने या फिर उसे पलटने के बेहतर मौके होंगे.

एए/आईबी (एएफपी)

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