ब्रिटेन में नए पुलिस बिल के विरोध में ‘किल द बिल’ का नारा | दुनिया | DW | 16.04.2021
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दुनिया

ब्रिटेन में नए पुलिस बिल के विरोध में ‘किल द बिल’ का नारा

ब्रिटेन में पुलिस से जुड़े एक बिल के विरोध में प्रदर्शनों का दौर जारी है. ये विरोध प्रदर्शन किसी एक संगठन ने आयोजित नहीं किए हैं बल्कि ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए कई मानवाधिकार संगठनों ने शुरु किए हैं.

लंदन में अप्रैल के शुरू में आयोजित किल द बिल प्रदर्शन में पुलिस ने 100 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. इससे पहले मार्च में ब्रिस्टल शहर में हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़पों की खबरें आती रही हैं. प्रदर्शनों का ताजा दौर शनिवार 17 अप्रैल को आयोजित हो रहा है जब लंदन, बाथ, बर्मिंघम, ब्राइटन, कार्डिफ, ब्रिस्टल और मैनचेस्टर समेत ब्रिटेन के कईं दूसरे शहरों में प्रदर्शनकारी एकजुट होंगे. लॉकडाउन खुलने के बाद किल द बिल प्रदर्शनों का ये पहला आयोजन है और इसमें पहले से कहीं ज्यादा लोगों की हिस्सेदारी की उम्मीद है.

मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की है. प्रदर्शनकारियों की दलील है कि पुलिस को बेहद ताकतवर बनाने वाला ये बिल विरोध-प्रदर्शन के अधिकारों का हनन करता है और सरकार को इस पर दोबारा सोचना चाहिए. बीते कुछ महीनों के दौरान ब्रिटेन और यूरोप में तमाम मसलों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित हुए. ब्लैक लाइव्स मैटर से जुड़े प्रदर्शन, फ्रांस में सुरक्षा कानूनों के विरोध में हुआ प्रदर्शन या फिर लॉक डाउन के विरोध में हुए प्रदर्शन हों, ये सवाल बराबर बना रहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कारगर उपाय क्या होने चाहिए और पुलिस किस हद तक जा सकती है. ब्रिटेन के इस बिल में विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण समेत पुलिस की भूमिका को मजबूत बनाने के प्रावधान है.

क्या कहता है बिल

पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग एंड कोर्ट बिल, 300 पन्नों का एक अहम और विवादित बिल है जिसमें पुलिस, अपराध और सजा से जुड़े व्यापक प्रस्ताव रखे गए हैं. इसमें गंभीर अपराधों के लिए सजा को कड़ा करने, सजा खत्म होने से पहले जेल से रिहाई की नीति का अंत करने समेत कई सिफारिशें हैं. प्रस्तावित कानून का एक हिस्सा पुलिस और पुलिस की ताकतों से जुड़ा है, जिसमें प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के अधिकार दिए जाने की बात है और इन्हीं पर विरोध हो रहा है. मौजूदा कानूनों के मुताबिक, पुलिस नागरिक प्रदर्शनों को तब तक रोक नहीं सकती जब तक वह ये साबित ना कर दे कि किसी प्रदर्शन से जान-माल और संपत्ति को भयंकर खतरा है या फिर आम जनजीवन के बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है. नया कानून पुलिस को ये अधिकार देता है कि यदि वो किसी प्रदर्शन को आम जीवन के लिए रुकावट मानती है तो उसके खिलाफ कदम उठा सके. उदाहरण के लिए पुलिस को प्रदर्शन का वक्त और आवाज की सीमा तय करने का हक होगा.

England I Leiche von Sarah Everard gefunden

यहीं मिली सैरा एवरर्ड की लाश

बिल के अन्य विवादास्पद पहलुओं में ये प्रस्ताव भी है कि यदि प्रदर्शन के दौरान किसी स्मारक या मूर्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो जिम्मेदार व्यक्ति को दस साल तक की सजा हो सकती है. गौरतलब है कि ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शनों के दौरान ब्रिस्टल में एक दास व्यापारी एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति को तोड़ा गया था. सरकार की तरफ से लगातार कहा जाता रहा है कि ये बिल पुलिस की सक्रिय भूमिका और आम लोगों की सुविधा का ध्यान रखने की कोशिश है. पिछले हफ्ते संसद में बोलते हुए, गृह मंत्री प्रीति पटेल ने साफ किया कि "अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों और आम जनजीवन के बीच संतुलन कायम की करने की जरूरत है.”

विरोध की शुरूआत

पुलिस का बर्ताव यूं तो ब्रिटेन समेत दुनिया भर में बहस का मुद्दा है लेकिन ये बिल अचानक विवाद का मसला बना एक तैंतीस वर्षीय महिला सैरा एवरर्ड की मौत के बाद. एवरर्ड 3 मार्च को लंदन के एक इलाके से लापता हो गईं और बाद में उनका शव बरामद हुआ. उनकी हत्या के मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ मामला तय हुआ. एवरर्ड की याद में 12 मार्च को एक कैंडिल लाइट सभा आयोजित की गई थी जिसे पुलिस ने तितर बितर कर दिया. वजह थी कोविड लॉकडाउन और लोगों के जमा होने की मनाही के नियम.

पुलिस ने हिंसा का विरोध कर रही महिलाओं को रोका और गिरफ्तारियां की. इस मामले में पुलिस की कड़ी आलोचना हुई और अधिकारियों के बर्ताव की जांच की जा रही है. ये घटनाएं, पुलिस और अपराध बिल पर संसद में हुई बहस से चंद रोज पहले हुई और पुलिस की ताकत और उसके बर्ताव का विरोध, किल द बिल प्रदर्शनों का आधार बन गया. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘सिस्टर्स अनकट' का कहना है ”पुलिस बिल प्रदर्शनों को आपराधिक घोषित करते हुए उन्हें रोकने का अधिकार देता है. वही पुलिस जो अभी प्रदर्शनकारियों को मारती है, वो आगे और भी ताकतवर हो कर ज्यादा हिंसक व्यवहार करेगी.”

ये विवादास्पद बिल संसद के निचले सदन में शुरूआती प्रक्रिया पार कर चुका है. फिलहाल कमेटी स्तर पर इस बिल के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत, सुझाव और बहस का दौर शुरू होगा जिसके बाद बिल वापिस निचले सदन मे चर्चा के लिए रखा जाएगा, लेकिन ये सारी प्रक्रिया फिलहाल इस साल के अंत तक के लिए टाल दी गई है. 

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