ब्राजीली हथियार सौदे पर सवाल | दुनिया | DW | 10.08.2013
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दुनिया

ब्राजीली हथियार सौदे पर सवाल

ब्राजील लुका छिपा कर छोटे हथियारों का बड़ा सौदा कर रहा है. छोटे हथियारों में वह चौथा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया है. हालांकि संयुक्त राष्ट्र के एक समझौते के बाद उसे बताना पड़ेगा कि हथियार कहां जा रहे हैं.

तुर्की में जारी विरोध प्रदर्शन में फेंके जा रहे आंसू गैस के कुछ गोलों पर लिखा हुआ दिख सकता है, मेड इन ब्राजील. अरब क्रांति के दौरान बहरीन में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान भी ऐसे ही किसी हथियार पर ब्राजील का झंडा बना था.

छह करोड़ यूरो की सालाना कमाई के साथ ब्राजील फिलहाल हल्के हथियारों का निर्यात करने वाला चौथा सबसे बड़ा देश बन गया है. अमेरिका, जर्मनी और इटली उससे आगे हैं. ब्राजील के विकास, उद्योग और विदेशी व्यापार के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक छोटे हथियारों के नियार्त में बढ़ोतरी हुई है. इनमें बंदूकें, शॉट गन और राइफल शामिल हैं. पांच साल में इनकी बिक्री 36 फीसदी बढ़ी है. 2007 में बिक्री 20 करोड़ 10 लाख डॉलर की थी, जो 2012 में बढ़ कर सवा तीन करोड़ डॉलर हो गई.

फायदे का धंधा

ब्राजील से हथियार लेने वालों में अमेरिका सबसे आगे है. फिर एस्टोनिया, सिंगापुर, बेल्जियम और जर्मनी का नंबर है. जर्मनी ब्राजील को हथियार निर्यात भी करता है. जी3 गन्स जर्मनी की हेकलर एंड कॉख कंपनी ब्राजील को बेचती है जो वहां की वायु सेना इस्तेमाल करती है. वहीं दूसरा पीएसजी वन मॉडल रियो डी जेनेरो की सैनिक पुलिस इस्तेमाल करती है.

स्विट्जरलैंड में छोटे हथियारों पर किए गए सर्वे का अनुमान है कि दुनिया में छोटे हथियारों का साढ़े आठ अरब डॉलर का व्यापार होता है. हालांकि यह भी कहा जाता है कि कई देश हथियारों के आयात निर्यात के बारे में सही जानकारी नहीं देते इसलिए सटीक आंकड़े मौजूद नहीं हैं. ब्राजील अपना पूरा निर्यात तो बताता है लेकिन इसके आंकड़े नहीं देता कि कितने हथियार किस साल में बेचे और कब इनका लेन देन हुआ.

चुपचाप बिक्री

इसी के साथ ब्राजील सिर्फ उन देशों में शामिल नहीं है जो हथियारों का सबसे ज्यादा निर्यात करते हैं बल्कि उनमें भी शामिल है जो इसके बारे में गोपनीयता बरतते हैं. कभी ये पता नहीं चलता कि क्या हथियार उन देशों में गए हैं जो मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं या फिर उन देशों में जहां सरकार का बर्ताव तानाशाही है.

सोऊ दा पाज नाम की संस्था में हथियार नियंत्रण समन्वयक ब्रूनो लागियानी कहते हैं, "यह जानकारी बहुत अहम है. क्योंकि अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार में त्रिकोणीय सौदा कोई नई बात नहीं. इसका मतलब है कि एक देश ऐसे दूसरे देश को हथियार बेचता है जिसका नाम अच्छा है. लेकिन यह देश सिर्फ मध्यस्थ होता है और हथियार तीसरे देश को आगे देता है. यह मानवाधिकारों का हनन है."

नियंत्रण जरूरी

अतिरिक्त चिंता यह है कि हथियार गलत हाथों में पड़ सकते हैं. यह शंका भी बढ़ रही है कि हथियार खरीदने वाले देश क्या इस पर नियंत्रण रखने में समर्थ हैं, "जब ऐसे नियंत्रण नहीं होते तो हथियार आतंकियों, अपराधियों के हाथ में पड़ सकते हैं. या फिर ऐसे लोगों के हाथ पड़ सकते हैं जो देश की नीतियों का विरोध करते हैं. सौदे में देश के नियंत्रण का सामर्थ्य जरूर देखा जाना चाहिए."

रोशनी की उम्मीद

जून की शुरुआत में जर्मनी और ब्राजील संयुक्त राष्ट्र में हथियार व्यापार पर नियंत्रण के प्रस्ताव पर राजी हुए. समझौते में शामिल देशों को देखना होगा कि जिन्हें हथियार दिए जा रहे हैं वो देश मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं या नहीं. साथ ही ये रोकने की भी कोशिश की जाएगी कि हथियार आतंकियों या संगठित अपराधियों के हाथ में नहीं पड़ जाएं. इसमें छोटे और हल्के हथियारों के साथ बड़े और युद्ध के हथियारों के व्यापार पर नजर रखी जा सकेगी.

ब्राजील में एमनेस्टी इंटरनेशन के मॉरिसियो सांतोरो कहते हैं, "ब्राजील के हथियार व्यापार में पारदर्शिता, दूसरे देशों को प्रेरित करेगी जहां लोगों को पता नहीं कि उनके देश के प्रतिनिधि कहां से हथियार खरीदते हैं." समझौता लागू तभी किया जा सकेगा जब इसे कम से कम 50 देश मंजूर करें. इसमें कई साल लग सकते हैं. ये उन्हीं देशों पर लागू होगा जो इसे समर्थन देंगे.

रिपोर्टः फर्नांडो कॉलिट/आभा मोंढे

संपादनः ए जमाल

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