बोरिस जॉनसन चुनाव तो कराएंगे लेकिन क्या जीत भी पाएंगे? | दुनिया | DW | 30.10.2019
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दुनिया

बोरिस जॉनसन चुनाव तो कराएंगे लेकिन क्या जीत भी पाएंगे?

प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने चुनाव कराने पर संसद को तो मना लिया लेकिन क्या यह दांव उन्हें मनचाही जीत और ब्रेक्जिट में आए गतिरोध को तोड़ने में कामयाबी दिला पाएगा.

बोरिस जॉनसन ने प्रधानमंत्री बनने से पहले वादा किया था कि वो किसी भी कीमत पर 31 अक्टूबर की तारीख तक ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग कर लेंगे. ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऐसा तो नहीं करा पाए लेकिन उन्होंने अब ब्रिटेन में चुनाव कराने की अपनी कोशिश में कामयाबी पा ली है. ब्रिटेन की संसद के निचले सदन ने इस साल के खत्म होने से पहले चुनाव कराने के प्रस्ताव को 20 के मुकाबले 438 मतों से पारित कर दिया. 

प्रस्ताव जब पास हुआ तो ब्रेक्जिट की तीसरी समयसीमा 31अक्टूबर में अभी दो दिन बाकी थे और यूरोपीय संसद पहले ही इसे आगे बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है. क्रिसमस के मौसम में ब्रिटेन में चुनाव इससे पहले 1923 में हुए थे और लोगों का मानना है कि यह एक मुश्किल काम है.

ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन के वोटरों को मानसिक रूप से थका दिया है और उनमें नाराजगी पैदा की है. ब्रिटेन के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के पक्के वोटरों का आधार भी इस उथल पुथल में खिसक गया है. इसमें बोरिस जॉनसन की कंजर्वेटिव पार्टी और विपक्षी लेबर पार्टी शामिल है. जॉनसन ने मंगलवार रात को चुनाव पर संसद की मुहर लगवाने में कामयाबी के बाद कंजर्वेटिव सांसदों की बैठक में कहा, "यह देश को एकजुट करने और ब्रेक्जिट करवाने का वक्त है."

55 साल के जॉनसन को उम्मीद है कि बहुमत से जीत उन्हें ब्रेक्जिट डील पर दबाव बनाने के लिए जरूरी ताकत देगी जबकि उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन एक कट्टर समाजवादी सरकार बनाने और यूरोपीय संघ के मसले पर एक और जनमतसंग्रह कराने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं.

ब्रिटेन के चुनाव का नतीजा शुक्रवार 13 दिसंबर को आएगा और अगर किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो ब्रेक्जिट का भविष्य फिर अधर में लटक जाएगा. तब एक बार फिर बिना डील के ईयू से बाहर जाने या फिर एक और जनमत संग्रह की बात जॉनसन की उम्मीदों पर पानी फेर देगी.

कॉर्बिन चुनाव को सचमुच के बदलाव का एक मौका मान रहे हैं. उन्होंने लेबर पार्टी को असमानता और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से नजदीकी रिश्ते के एक समाजवादी विकल्प के रूप में तैयार किया है जिसे वो प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का चरित्र मानते हैं. 70 साल के कॉर्बिन ने कहा, "लेबर सरकार आपकी ओर रहेगी, जबकि बोरिस जॉनसन के कंजर्वेटिव सोचते हैं कि वे शासन करने के लिए ही पैदा हुए हैं और वो सिर्फ खास लोगों का ही ध्यान रखेंगे."

कॉर्बिन ने रेल, पानी और ऊर्जा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करने और ऊंची आय वालों पर कर लगा कर सार्वजनिक सेवाओं के लिए धन जुटाने की बात कही है.

कंजर्वेटिव सांसद रॉबर्ट हाल्फन का भी कहना है कि ब्रेक्जिट के अलावा घरेलू मुद्दे भी चुनाव में बड़ी भूमिका निभाएंगे. उन्होंने बताया कि जॉनसन ने कहा है, "वह कॉर्बिन के साथ एक राष्ट्र की नीति पर बहस करेंगे, स्कूल, अस्पताल और पुलिस पर होने वाली खर्च पर बात करेंगे... बात केवल ब्रेक्जिट के मुद्दे पर नहीं होगी."

जॉनसन की पूर्ववर्ती टेरीजा मे ने जब 2017 में समय से पहले चुनाव का दांव खेला तो उनकी मामूली बहुमत भी चली गई, इस नाकामी ने उन्हें ब्रेक्जिट डील पर संसद की मुहर लगवाने से वंचित कर दिया और उनका राजनीतिक करियर भी डूब गया.

इसी महीने हुए एक सर्वे में जॉनसन की कंजर्वेटिव पार्टी को लेबर पार्टी के मुकाबले 10 फीसदी आगे दिखाया गया. हालांकि सर्वे करने वालों ने 2016 में ब्रेक्जिट के लिए समर्थन को भी कम करके आंका था. बाद में उन्होंने माना कि जिन मॉडलों का उन्होंने इस्तेमाल किया वे ब्रेक्जिट की आग के सामने शिथिल पड़ गए.

दोनों प्रमुख पार्टियों को कम से कम तीन मोर्चों पर लड़ाई लड़नी होगी. आपसी लड़ाई के साथ ही उन्हें निजेल फराज की ब्रेक्जिट पार्टी के साथ साथ और लिबरल डेमोक्रैट्स से भी सामना करना होगा. ब्रेक्जिट पार्टी जहां ब्रेक्जिट के लिए वोट देने वालों को लुभाने में जुटी है, वहीं लिबरल डेमोक्रैट्स ब्रेक्जिट का विरोध करने वालों का दिल जीतने की फिराक में हैं.

फराज का कहना है, "कम से कम संसद में गतिरोध खत्म हो गया है. अब ब्रेक्जिट के पास सफल होने का एक मौका है."

एनआर/एके(रॉयटर्स)

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