बॉलीवुड में सिफारिशों का है पुराना सिलसिला | भारत | DW | 20.06.2020

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भारत

बॉलीवुड में सिफारिशों का है पुराना सिलसिला

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद मुंबई सिनेमा उद्योग का स्याह पहलू उभर कर सामने आया है. फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज का कहना है कि मुंबई फिल्म उद्योग में सिफारिशों का किस्सा पुराना है.

फिल्मों में प्रवेश पाना कभी आसान नहीं रहा. मूक फिल्मों के दौर में फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी जाते समय अवश्य कलाकारों की कमी थी. कथित रूप से सभ्य परिवारों की लड़कियां फिल्मों से परहेज करती थीं. लड़के भी मुश्किल से मिलते थे. फिल्मों के प्रति समाज का रवैया सकारात्मक नहीं था. अभिनय को इज्जत का काम नहीं माना जाता था. धीरे-धीरे कास्टिंग आसान हुई, लेकिन दिक्कतें दशकों तक बनी रहीं. याद करें तो आरंभ में कलाकारों का चुनाव पूरी तरह से स्टूडियो के संचालक (निर्माता-निर्देशक और कलाकार) की परख पर निर्भर करता था. पहली नजर में कोई भा गया तो ठीक. आरंभिक दिनों में फिल्म इंडस्ट्री स्थापित हो रही थी तो परिवार और परिचितों के परिजनों मात्र को मौका देने का सवाल ही नहीं पैदा होता था. सभी बाहर के कलाकार होते थे. निर्माता और निर्देशक भी कदम रख रहे होते थे. बाद में कुछ कलाकार स्थापित हुए. कुछ निर्माता-निर्देशक समर्थ हुए. फिर सिफारिशों और पहचान पर गौर किया जाने लगा.

Raj Kapoor

राज कपूर और वैजयंतीमाला

केदार शर्मा ने अपनी जीवनी ‘वन एंड ओनली केदार शर्मा' में ऐसे एक प्रसंग का स्पष्ट उल्लेख किया है. केदार शर्मा पंजाब से कोलकाता पहुंचे थे. उन्हें अपने प्रिय और आदर्श निर्देशक देवकी बोस के साथ काम करना था. जब ‘न्यू थियेटर्स' के दरबान ने उन्हें गेट पर ही बार-बार रोक दिया तो उन्होंने ‘न्यू थियेटर्स' में काम कर रहे पंजाबी कलाकार पृथ्वीराज कपूर और फिर केएल सहगल से मिन्नत की कि उन्हें देबकी बोस से मिलवा दें. उनसे सिफारिश करने की बात कही. पृथ्वीराज कपूर ने साफ शब्दों में यह कहते हुए मना कर दिया कि "मैंने हाल ही में अपने भाई त्रिलोक कपूर की सिफारिश की है, इसलिए तुम्हारी सिफारिश नहीं कर पाऊंगा." अगर इंटरनेट सर्च करें तो मालूम होगा कि त्रिलोक कपूर ने उनकी फिल्म ‘सीता' में काम किया था, जिसे देबकी बोस ने ही निर्देशित किया था. यह 1934 की बात है. तभी से किसी न किसी रूप में भाई-भतीजावाद चल रहा है. उन दिनों स्टूडियो के लिए कलाकारों और तकनीशियनों की चयन प्रक्रिया पर अलग से कोई शोध कार्य नहीं हुआ है, लेकिन कलाकारों की जीवनी और आत्मकथाओं से संकेत लिए जा सकते हैं. अगर कोई कहता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गुटबाजी या भाई-भतीजावाद नहीं है तो सफेद झूठ को सार्वजनिक सच बताने की नाकाम कोशिश कर रहा है.

किसने डाली बॉलीवुड में वंशवाद की नींव

आगे चलकर कपूर परिवार के ही राज कपूर ने नेपोटिज्म के एक प्रकार वंशवाद की बेल बोई. उन्होंने अपने बेटे ऋषि कपूर को ‘बॉबी' में लांच किया. आठवें दशक से आरंभ हुई यह प्रवृति पिछली सदी के नौवें और आखिरी दशक में मजबूत हुई. पहली पीढ़ी के स्थापित सितारों ने अपने बेटे-बेटियों को खुद या किसी दोस्त-हमदर्द के जरिए लॉन्च किया. फिल्म इंडस्ट्री से वाकिफ पाठक और दर्शक ‘स्टारकिड' शब्द से परिचित होंगे. यह सिलसिला आज भी बदस्तूर चल रहा है. कोई न कोई लॉन्च हो रहा होता है और इंडस्ट्री के ताकतवर व नामवर इस चलन को लेकर शर्मसार नहीं होते. इसे स्वाभाविक मान लिया गया है. तर्क दिया जाता है कि यह तो हर पेशे में होता है. डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और नेता का बेटा नेता बनता है. सच्चाई यह है कि समाज के सभी क्षेत्रों में सक्रिय साक्ष्य मौजूद हैं. अब प्रश्न है कि फिर यह विमर्श क्यों?

ताजा दर्दनाक घटना ने ‘नेपोटिज्म' को विमर्श में ला दिया है. कुछ नामों पर निशाना साधा जा रहा है. उन्हें लक्षित किया जा रहा है कि उनकी वजह से सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या के लिए मजबूर हुए. पुख्ता सबूत के बगैर ऐसे आरोप-प्रत्यारोप से इस महामारी से मुक्त नहीं हुआ जा सकता. फिल्म निर्माण सृजनात्मक प्रक्रिया है. इसमें निर्माता-निर्देशक की दृष्टि, पसंद, रुचि और जरूरत बहुत मायने रखती है. अगर वह किसी को भी छोड़ता है तो उसे लग सकता है कि मेरे साथ हुई ज्यादती ‘नेपोटिज्म' की वजह से है. ‘नेपोटिज्म' के विकार को साबित करना असंभव है. जाहिर सी बात है कि इससे निदान का कोई फार्मूला नहीं खोजा जा सकता है. सक्रिय फिल्मकारों और कलाकारों को मिलजुल कर ही विवेकपूर्ण राह तलाशनी होगी. निस्संदेह बाहर से आई प्रतिभाओं को आजमाने का जोखिम हर फिल्मकार नहीं उठा सकता. भविष्य में भी फिल्म बिरादरी अपने बच्चों के भविष्य के लिए फिल्में या कोई प्रोडक्शन कंपनी लॉन्च करती रहेगी. हां, यह कोशिश की जा सकती है कि सभी प्रतिभाओं को समान अवसर मिले.

कैसे बनी मुंबई हिंदी फिल्मों की राजधानी

यह समस्या मुंबई में फिल्म इंडस्ट्री के केंद्रित होने से भी है. हिंदी फिल्मों में प्रतिभा आजमाने के लिए देश भर की प्रतिभाओं का मुंबई आना होता है. आजादी के बाद हिंदी फिल्मों के निर्माण केंद्र के रूप में मुंबई के होने के ऐतिहासिक कारण रहे हैं. मुंबई में ही फिल्म निर्माण की आरंभिक गतिविधियां हुईं. धीरे-धीरे दूसरे केंद्रों में इसका विकास हुआ. वे देश की अन्य भाषाओँ की फिल्मों के केंद्र बने. हिंदी फिल्मों के लिहाज से मुंबई के साथ पुणे, कोलकाता और लाहौर में हिंदी फिल्में बनती थीं और पूरे देश में वितरित और प्रदर्शित की जाती थीं. आजादी के पहले से ही तकनीकी और अन्य सुविधाओं की वजह से दूसरे केंद्रों के निर्माता-निर्देशक मुंबई आते रहे. बड़े मौके की संभावना और वास्तविकता भी उन्हें खींचती रही. आजादी के बाद लाहौर से अनेक कलाकारों और और फिल्मकारों ने मुंबई का रुख किया. तब तक अधिकांश हिंदी फिल्में मुंबई में निर्मित होने लगी थीं. इतिहास खंगाले तो पाएंगे कि आजादी के पहले फिल्मों के निर्माण के लिए मुंबई, कोलकाता और लाहौर के कलाकार और निर्देशक एक-दूसरे केंद्रों में भी आते-जाते रहे. असल चीज हैं संभावना, सुविधा और कमाई.

Indien Traditionelle Kinos in Lucknow

लखनऊ में पुराना सिनेमाहॉल

अगर आजादी के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का विकेंद्रीकरण किया गया रहता तो आज स्थिति भिन्न होतीं. सभी हिंदीभाषी राज्यों में फिल्म इंडस्ट्री के लिए आधारभूत संरचना तैयार की जाती और जरूरी साधनों का इंतजाम किया जाता तो मुंबई में प्रतिभाओं की ऐसी जमघट और मारकाट नहीं होती. विभिन्न हिंदीभाषी राज्यों की प्रतिभाओं को अपने राज्यों में आरंभिक मौका मिल सकता था. फिर योग्यता और लोकप्रियता के अनुसार दूसरे राज्य में मुंबई में उन कलाकारों और तकनीशियनों की मांग बनती. आजादी के पहले सभी केन्द्रों में प्रतिभाओं की जैसी आवाजाही रहती थी. वैसा ही कुछ होता तो मुंबई में ‘टैलेंट जाम' नहीं होता. पिछले दो दशकों से सभी राज्यों की सरकारें फिल्म नीति विकसित और क्रियान्वित करने का यत्न कर रही हैं. राजधानियों और उनके आसपास फिल्मसिटी के निर्माण की घोषणाएं और खबरें आती रहती हैं. और फिर सरकार बदलने के साथ सब कुछ फुस्स हो जाता है. जिन राज्यों ने फिल्म गतिविधियों के लिए अतिरिक्त फंड का इंतजाम भी किया है, वहां स्थानीय प्रतिभाओं से अधिक तरजीह मुंबई के नामी और लोकप्रिय कलाकारों और बैनरों को दी जाती है. नतीजतन सभी राज्यों से प्रतिभाएं मुंबई की तरफ कूच करती रहती हैं.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में फिलहाल ‘नेपोटिज्म' का मसला गर्म है. बहसें और अटकलबाजियां चल रही हैं. पिटीशन डाले जा रहे हैं. ठोस सुझाव, निदान और समाधान के प्रयास नहीं हो रहे हैं. शायद हम फिर किसी बड़ी दर्दनाक दुर्घटना के इंतजार में हैं...

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