बीते 45 सालों में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा | भारत | DW | 31.01.2019
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भारत

बीते 45 सालों में बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा

रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करने की केंद्र की कथित कोशिशों के विरोध में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के अध्यक्ष समेत दो गैर-सरकारी सदस्यों के इस्तीफे ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है

भारत में रोजगार के लिहाज से नए साल की शुरुआत ठीक नहीं रही है. इस महीने की शुरुआत में खबर आई थी कि बीते साल लगभग 1.10 करोड़ नौकरियां खत्म हुई हैं और अब महीने के आखिर में नेशनल सैंपल सर्वे आफिस (एनएसएसओ) के एक सर्वेक्षण के हवाले से यह बात सामने आई है कि वर्ष 2017-18 के दौरान भारत में बेरोजगारी दर बीते 45 वर्षों में सबसे ज्यादा रही. बीते दिनों सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण का एलान किया था. उस समय भी सवाल उठा था कि जब नौकरियां ही नहीं हैं, तो आरक्षण देने की क्या तुक है.

क्या कहती है रिपोर्ट

दो साल पहले हुई नोटबंदी के बाद यह देश में बेरोजगारी पर किसी सरकारी एजंसी की ओर से तैयार सबसे ताजा और व्यापक रिपोर्ट है. इसमें कहा गया है कि देश में वर्ष 1972-73 के बाद बेरोजगारी दर सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई है. शहरी इलाकों में बेरोजगारी की दर 7.8 फीसदी है, जो ग्रामीण इलाकों में इस दर (5.3 फीसदी) के मुकाबले ज्यादा है.

रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों की शिक्षित युवतियों में वर्ष 2004-05 से 2011-12 के बीच बेरोजगारी की दर 9.7 से 15.2 फीसदी के बीच थी, जो वर्ष 2017-18 में बढ़ कर 17.3 फीसदी तक पहुंच गई. ग्रामीण इलाकों के शिक्षित युवकों में इसी अवधि के दौरान बेरोजगारी दर 3.5 से 4.4 फीसदी के बीच थी जो वर्ष 2017-18 में बढ़ कर 10.5 फीसदी तक पहुंच गई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों के 15 से 29 साल की उम्र वाले युवकों में बेरोजगारी की दर वर्ष 2011-12 में जहां पांच फीसदी थी, वहीं वर्ष 2017-18 में यह तीनगुने से ज्यादा बढ़ कर 17.4 फीसदी तक पहुंच गई. इसी उम्र की युवतियों में यह दर 4.8 से बढ़ कर 13.6 फीसदी तक पहुंच गई.

विशेषज्ञों का कहना है कि खेती अब पहले की तरह मुनाफे का सौदा नहीं रही. इसी वजह से ग्रामीण इलाके के युवा रोजगार की तलाश में अब खेती से विमुख होकर रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाने लगे हैं. शहरी इलाकों में सबसे ज्यादा रोजगार सृजन करने वाले निर्माण क्षेत्र में आई मंदी के चलते नौकरियां कम हुई हैं.

ये देते हैं सबसे ज्यादा नौकरियां

रिपोर्ट पर विवाद क्यों

एनएसएसओ की उक्त रिपोर्ट विवादों में घिरी रही है. राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कामकाज के तरीके पर सरकार से मतभेदों की वजह से नाखुश होकर इसी सप्ताह उसके दो गैर-सरकारी सदस्यों, पीसी मोहनन व जेवी मीनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया. आयोग के अध्यक्ष रहे मोहनन कहते हैं, "बीते कुछ महीनों से यह महसूस हो रहा था कि सरकार हमारी बातों को गंभीरता से नहीं ले रही है और हमें अनदेखा किया जा रहा है. आयोग के हाल के फैसलों को भी लागू नहीं किया गया." मोहनन के मुताबिक उक्त रिपोर्ट को बीते दिसंबर में ही सार्वजनिक किया जाना था. लेकिन सरकार इसे दबाने का प्रयास कर रही थी. केंद्र सरकार ने हालांकि इन दोनों के इस्तीफे पर सफाई दी है. लेकिन इससे एक गलत संदेश तो गया ही है.

अब सरकार चाहे बेरोजगारी के आंकड़ों को दबाने का जितना भी प्रयास करे, रोजगार परिदृश्य की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. सेंटर ऑफ मॉनीटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) ने अपनी हाल की एक रिपोर्ट में कहा था कि देश में बीते साल 1.10 करोड़ नौकरियां कम हुई हैं. हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा कर सत्ता में आने वाली एनडीए सरकार के लिए यह स्थित अच्छी नहीं कही जा सकती. वह भी तब जब अगले दो-तीन महीने में लोकसभा चुनाव होने हैं.

रोजगार के अभाव में शिक्षित बेरोजगारों में हताशा लगातार बढ़ रही है. नौकरी के लिए आवेदन करने वालों के आंकड़े इस हताशा की पुष्टि करते हैं. मिसाल के तौर पर बीते साल मार्च में रेलवे में 90 हजार नौकरियों के लिए ढाई करोड़ बेरोजगारों ने आवेदन किया था. इसी तरह गुजरात में 12 हजार नौकरियों के लिए 9.70 करोड़ ने आवेदन भेजा था. सबसे दयनीय हालत तो उत्तर प्रदेश में देखने को मिली. बीते साल अगस्त में वहां चपरासी के 62 पदों के लिए भारी तादाद में आवेदन करने वालों में 3,700 आवेदक पीएचडी डिग्रीधारी थे.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का आकलन है कि भारत में बेरोजगारों की तादाद वर्ष 2019 में बढ़ कर लगभग दो करोड़ पहुंच जाएगी. लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जमीनी हालत इससे भी भयावह है. उक्त अनुमान 3.5 फीसदी बेरोजगारी दर पर आधारित है. एक अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमलेंदु मुखर्जी कहते हैं, "केंद्र के दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है. एक ओर जहां नौकरियां तेजी से घट रही हैं, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है. इस असंतुलन को पाटने की दिशा में ठोस पहल जरूरी है." विशेषज्ञों का कहना है कि बेरोजगारी अगर इसी रफ्तार से बढ़ती रही, तो हालात विस्फोट होने का अंदेशा है.

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