बिना एक भी मुसलमान के ये ″सबका साथ-सबका विकास” की जीत कैसे? | ब्लॉग | DW | 11.03.2017
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ब्लॉग

बिना एक भी मुसलमान के ये "सबका साथ-सबका विकास” की जीत कैसे?

उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानि मुसलमानों में से एक भी उम्मीदवार को चुनाव में खड़ा किये बिना भाजपा यहां मिली जीत को "सबका साथ-सबका विकास” नारे की सफलता कैसे बता सकती है?

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के अब तक सामने आये नतीजों से यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी लेकिन गोवा, पंजाब और मणिपुर में उसे मात खानी पड़ रही है. इन नतीजों का अनेक दृष्टियों और कोणों से विश्लेषण किया जाएगा लेकिन बिना विश्लेषण भी एक बात स्पष्ट है और वह यह कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में अभूतपूर्व सफलता हासिल करके भाजपा ने अगले दो वर्षों के लिए यह सुनिश्चित कर लिया है कि वह संसद के दोनों सदनों में अपनी मर्जी के कानून पारित करा सकेगी. यही नहीं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में भी अब उसके उम्मीदवार की जीत पक्की हो गई है. 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी उत्तर प्रदेश की जीत का भारी असर पड़ने की पूरी संभावना है.

उत्तर प्रदेश में मिली अपार सफलता इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पहले की तरह बरकरार है और नोटबंदी जैसे दुस्साहसिक कदम का उस पर कोई असर नहीं हुआ है. सभी अनुमानों को ध्वस्त करते हुए उत्तर प्रदेश ने मोदी को ही वोट दिया है. ऐसा कहना वाजिब होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी का भी नाम आगे नहीं किया गया था और सिर्फ मोदी के नाम पर ही वोट मांगा गया था. यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि अब आने वाले दो वर्षों के भीतर मोदी नोटबंदी जैसे अन्य जोखिम भरे फैसले लेने में कतई नहीं हिचकिचाएंगे.

मोदी लहर के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन भाजपा प्रवक्ताओं का यह दावा कि जनता ने उनके "सबका साथ-सबका विकास” के नारे को वोट दिया है, गले से नहीं उतरता. यह स्पष्ट है कि मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व के अलावा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के भाजपा के प्रयासों ने भी चुनाव के नतीजों पर बहुत बड़ा असर डाला है.

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों को विश्लेषित करने की एक दृष्टि यह भी हो सकती है कि इनके नतीजे इस बात का संकेत देते हैं कि लोग क्षेत्रीय पार्टियों के बजाय राष्ट्रीय पार्टियों की ओर मुड़ रहे हैं. आम आदमी पार्टी और अकाली दल की विफलता यही संकेत देती है. इसके अलावा यह भी स्पष्ट है कि लोगों ने हर जगह सत्तारूढ़ दल या गठबंधन के खिलाफ यानी सरकार की अकर्मण्यता के खिलाफ वोट दिया है. गोवा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तो अपनी सीट भी नहीं जीत सके हैं. मोदी लहर के बारे में भी यह सवाल उठाना लाजिमी है कि वह केवल उत्तर प्रदेश---और कुछ हद तक उत्तराखंड--- में ही क्यों चमत्कार दिखा पाई जबकि मोदी ने अन्य तीनों राज्यों में भी धुआंधार प्रचार किया था? उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों के खिलाफ वोट क्या इस बात का संकेत नहीं है कि मतदाता सरकार के कामकाज से असंतुष्ट होकर वोट दे रहा था?

इन नतीजों से एक बात यह भी स्पष्ट हो गई है कि राष्ट्रीय राजनीति में जिस किस्म का वर्चस्व कभी कांग्रेस पार्टी का हुआ करता था, अब वह भाजपा का है. विपक्षी दल यदि इस वास्तविकता को स्वीकार करके यदि उसी तरह एकजुट हो जाएं जिस तरह वे अतीत में गैर-कांग्रेसवाद के मंच पर इकट्ठे हुए थे, तो भाजपा को कड़ी टक्कर मिल सकती है. उत्तर प्रदेश में ही नहीं, अन्य राज्यों में भी यदि भाजपा के विरोधी दलों के मतों को जोड़ दिया जाए तो उनका प्रतिशत भाजपा को मिले वोट के प्रतिशत से कहीं अधिक है. यानी यदि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते तो संभवतः नतीजे कुछ और ही होते.

 

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