बिगड़ रहे हैं बिहार में अदालत और पुलिस के रिश्ते | भारत | DW | 30.11.2021
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भारत

बिगड़ रहे हैं बिहार में अदालत और पुलिस के रिश्ते

कोर्ट कैंपस के भीतर हुई एक लड़ाई ने न्यायपालिका और पुलिस विभाग के बीच बढ़ती खाई की पोल खोली. जिला जज और पुलिस अधिकारियों की बीच मारपीट की शर्मनाक घटना पर खेद जताने की जगह क्यों आरोप प्रत्यारोप पर उतारु हैं दोनों पक्ष?

बिहार का एक जिला है, मधुबनी. इसका एक सब-डिविजन है, झंझारपुर. करीब डेढ़ हफ्ते पहले की बात है. झंझारपुर कोर्ट में एक बड़ा बवाल हो गया. यहां अदालत परिसर के भीतर ही अडिशनल जज (प्रथम) अविनाश कुमार का दफ्तर है. आरोप है कि 18 नवंबर की दोपहर दो पुलिसकर्मी जबरन यहां घुस आए. इनमें से एक थे, घोघरडीहा पुलिस स्टेशन के थानाध्यक्ष गोपाल कृष्ण. और दूसरे थे, सीनियर इंस्पेक्टर अभिमन्यु शर्मा. इल्जाम है कि इन दोनों ने जज अविनाश कुमार को खूब गालियां दीं. सरेआम उनके साथ मारपीट की. काफी हो-हंगामा हो चुकने के बाद जब पुलिस महकमे को इस घटना की जानकारी मिली, तो डीएसपी रैंक के एक अधिकारी मौके पर पहुंचे. उन्होंने दोनों आरोपी पुलिसकर्मियों को हिरासत में ले लिया.

आप सोच सकते हैं कि ये घटना तो बासी हुई. फिर हम आज क्यों ये खबर बता रहे हैं आपको?

सच बात है कि घटना पुरानी हो गई. इसपर खबरें भी खूब बनीं. सोशल मीडिया पर पोस्ट्स लिखकर रोष भी जताया गया. मगर इस घटना की जड़ में जो मसला है, उसपर ज्यादा चर्चा होती नहीं दिखी. ये मसला है, राज्य में अधिकारियों-कर्मचारियों की सुरक्षा का. भीड़ द्वारा अधिकारियों- कर्मचारियों पर सुनियोजित हमले की घटनाएं बिहार में पहले भी हुई हैं. मसलन, अभी दिसंबर महीने की 5 तारीख को जी कृष्णैया के हत्या की 27वीं बरसी है. कृष्णैया गोपालगंज के जिलाधिकारी हुआ करते थे. 5 दिसंबर, 1994 को वो अपनी आधिकारिक कार से पटना जा रहे थे. रास्ते में एक भीड़ ने उन्हें कार से घसीटकर बाहर निकाला और नृशंसता से उनकी हत्या कर दी. इस घटना को तीन दशक बीतने वाले हैं. इस बीच बिहार में सत्ता भी बदली. सरकार की ओर से दावे किए गए कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पहले से कहीं बेहतर है. लेकिन झंझारपुर में हुई घटना ने इन दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है.

जज अविनाश कुमार के साथ हुई मारपीट से पुलिस-प्रशासन और न्यायपालिका सकते में हैं. सवाल उठ रहे हैं कि जब कोर्ट परिसर के भीतर न्यायिक अधिकारी पर हमला हो सकता है, तो फिर बाकी अफसर-कर्मचारी किस हद तक सुरक्षित माने जा सकते हैं? बहस तेज हो गई है कि जब बड़े अधिकारी ही पुलिसिया ज्यादती से सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी? कुछ लोग इसे स्पष्ट तौर पर पुलिस की मनमानी का मसला मानते हैं. वहीं कुछ का मत है कि सिस्टमैटिक कमियों के चलते पुलिस पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है. इसी से उपजी निराशा का नतीजा है झंझारपुर की घटना. कुछ लोग पद और पावर के घमंड को भी घटना की वजह मान रहे हैं.

अनोखी शर्तों पर जमानत के लिए चर्चित रहे हैं अविनाश कुमार

एडीजे अविनाश कुमार अतीत में अपने कुछ फैसलों की वजह से खबरों में रहे हैं. इनमें से कुछ फैसले जमानत देने की अनोखी शर्तों से जुड़े हैं. मसलन, लौकाहा थाने का एक केस जानिए. यहां ललन साफी नाम के शख्स पर महिलाओं से छेड़छाड़ के आरोप में एक केस दर्ज था. अविनाश कुमार ने आरोपी को इस शर्त पर जमानत दी कि वो छह महीने तक गांव की महिलाओं के कपड़े मुफ्त धोएगा और प्रेस करेगा. इसी तरह मधेपुर थाना में दर्ज एक मामले के आरोपी नीतीश कुमार यादव को इस शर्त पर जमानत दी कि वो पांच गरीब परिवार के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देगा.

नीरज कुमार साफी नाम के आरोपी को पांच गरीब निरक्षर महिलाओं व लड़कियों को साक्षर बनाने, मोहम्मद रुस्तम को नाले की सफाई, मोहम्मद शबीर को पांच बेरोजगारों को जड़ी बनाने का हुनर सिखाने, राजीव कुमार तथा नीतीश कुमार को बाढ़ पीड़ितों के बीच मुफ्त दाल बांटने तथा राम कुमार को निर्माणाधीन मंदिर में मुफ्त श्रमदान की शर्त पर जमानत दी थी. हालांकि, 24 सितंबर, 2021 को पटना हाईकोर्ट ने एक मामले में उनके फैसले पर रोक लगाने का आदेश भी जारी किया था.

पुलिस विभाग के साथ था विवाद

एडीजे अविनाश कुमार और पुलिस विभाग के बीच पिछले कुछ समय से मतभेद बने रहने की खबरें हैं. झंझारपुर अनुमंडल के भैरवस्थान थाने में दर्ज एक लड़की के अपहरण के मामले की सुनवाई के दौरान अविनाश कुमार ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए थे. इस मामले में उन्होंने एसपी डॉक्टर सत्यप्रकाश, डीएसपी आशीष आनंद और भैरवस्थान थाने के प्रभारी रूपक कुमार से स्पष्टीकरण मांगा था. सुसंगत धारा नहीं लगाए जाने पर कड़ी आपत्ति भी दर्ज की थी. साथ ही, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री व प्रदेश के डीजीपी को पत्र लिखकर कहा था कि एसपी सत्यप्रकाश को कानून की जानकारी के लिए ट्रेनिंग पर हैदराबाद स्थित नेशनल पुलिस अकादमी भेजा जाए. ये घटनाएं भी हालिया विवाद की वजह हो सकती हैं.

क्या कहते हैं कानून के जानकार?

इस घटना पर टिप्पणी करते हुए पटना व्यवहार न्यायालय के अधिवक्ता राजेश के. सिंह कहते हैं, "यह पुलिस की गुंडागर्दी है. एडीजे भी एक हद तक दोषी हो सकते हैं, लेकिन पुलिसवाले तो सौ फीसद दोषी हैं ही. अपने मातहतों को फटकार तो एसपी भी लगाते हैं, क्या कभी इनलोगों ने अपने एसपी को पीटा है?" अधिवक्ता अभिमन्यु सिंह का मत है, "सबऑर्डिनेट स्टाफ को तो धैर्य बनाए रखना होता है. वरना पूरा सिस्टम फेल हो जाएगा. क्या वकीलों को कोर्ट रूम में जजों की फटकार नहीं सुननी पड़ती है? अगर वे समय पर हाजिर हो गए होते, तो उन्हें जज साहब क्यों खरी-खोटी सुनाते? थानेदार महोदय को तो किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता है."

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बिहार पुलिस पर कानून व्यवस्था में कोताही के आरोप लगते रहे हैं

यह सवाल तो स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति थी कि बात इतनी आगे बढ़ गई. नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने कहा, "ये तो मानना ही पड़ेगा कि काम और आबादी के हिसाब से पुलिस का वर्कलोड बढ़ा है. भले ही राज्य सरकार ने विधि व्यवस्था और अनुसंधान के नाम पर पुलिस बल को विभाजित कर दिया है, लेकिन पुलिसकर्मियों की भर्ती उस अनुपात में नहीं बढ़ाई गई है. अपनी दैनिक ड्यूटी के साथ-साथ अदालतों का चक्कर भी लगाना पड़ता है और इसमें न्यायिक अधिकारी जब अपने कटाक्षों से सिस्टम की कमियों का ठीकरा आप पर लादते हैं, तो खीझ स्वाभाविक ही है. हां, ये सही बात है कि धैर्य नहीं टूटना चाहिए."

इस मुद्दे पर एक अवकाश प्राप्त न्यायिक अधिकारी कहते हैं, "आजकल जो न्यायिक अधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं, वे काम करने के प्रति गंभीर तो हैं, लेकिन व्यावहारिक नहीं हैं. आप आदेशों को देखें, तो सब साफ हो जाएगा. ऑर्डर करते वक्त आपको व्यवस्थागत खामियों तथा दूसरे विभागों की स्थिति का भी ध्यान रखना होगा. पावर का खुमार समस्या का हल नहीं हो सकता है. अदालतों में आजकल तीखे व्यंग्य बाणों का प्रयोग ज्यादा हो रहा, जो मेरे विचार से उचित नहीं है."

इस घटना पर बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक अभयानंद ने कहा, "कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध ऐतराज की स्थिति में लाठी-डंडे से काम नहीं किया जा सकता है. यह घटना पुलिस के दामन पर दाग लगाने वाली है. कोर्ट में पुलिस का यह कृत्य शर्मनाक है. ऐसी घटना से पुलिस की किरकिरी ही होती है."

पुलिस विभाग और न्यायपालिका के बीच आरोप-प्रत्यारोप

अविनाश कुमार की पिटाई प्रकरण में मामले को सुलझाने की कोशिश के बदले दोनों पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. पुलिस असोसिएशन ने घायल थानेदार और दारोगा के बयान पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की. पुलिस असोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह ने इस मामले की जांच हाईकोर्ट के वर्तमान जज या वरीय अधिकारियों से कराने का भी आग्रह किया. उधर बिहार न्यायिक सेवा संघ ने कहा है कि पुलिस एडीजे अविनाश कुमार के प्रति द्वेष की भावना रखती है. इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा तथा बिहार स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष रमाकांत शर्मा ने कहा है कि आरोपी पुलिसकर्मियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो.

जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट की सख्ती बता रही है कि यह प्रकरण बिहार पुलिस पर हर हाल में भारी पड़ेगा. दोनों आरोपी पुलिसकर्मियों की नौकरी तक जाने का अनुमान जताया जा रहा है. डीजीपी को भी कोर्ट में पुलिस की ओर से सफाई देनी पड़ सकती है. कोशिश होगी कि अगली सुनवाई के पहले विभागीय कार्रवाई कर दी जाए. हालांकि पुलिस असोसिएशन चुप बैठा रहेगा, ऐसा लगता नहीं है. समझा जा रहा है कि सरकार भी वहां के एसपी को हटाकर मामले को ठंडा करने का प्रयास करेगी क्योंकि एडीजे के बयान में कहीं न कहीं एसपी भी घेरे में हैं. एसपी को प्रोसिडिंग से गुजरना पड़ सकता है. उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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