बिखरे और कमजोर विपक्ष के बावजूद उपचुनाव में बीजेपी पूरी ताकत झोंक रही है | भारत | DW | 19.10.2019
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भारत

बिखरे और कमजोर विपक्ष के बावजूद उपचुनाव में बीजेपी पूरी ताकत झोंक रही है

बढ़ती महंगाई, बढ़ती आपराधिक घटनाओं और तमाम अन्य सत्ताविरोधी स्थितियों के बावजूद सत्तारूढ़ बीजेपी इन चुनावों में परिणाम को लेकर इतनी उत्साहित शायद इससे पहले कभी न रही हो.

साल 2017 में विधानसभा चुनाव में बड़ा बहुमत हासिल करने के बाद लोकसभा चुनाव में भी मिली बड़ी जीत से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले उपचुनाव में बेहद बिखरा हुआ और कमजोर विपक्ष चुनौती दे रहा है. विधानसभा में बीजेपी के पास इतना बड़ा बहुमत है कि वह ये सारी सीटें हार जाए, फिर भी सरकार की मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. बावजूद इसके भारतीय जनता पार्टी न सिर्फ पूरी ताकत से उपचुनाव लड़ रही है, बल्कि टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक की गतिविधियों पर बेहद सावधानीपूर्वक कदम रख रही है.

भारतीय जनता पार्टी ग्यारह में से दस सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि प्रतापगढ़ सीट उसने अपने सहयोगी अपना दल (एस) को दे दी है. इस सीट पर पहले भी अपना दल (एस) का ही कब्जा था लेकिन उसके विधायक संगमलाल गुप्त लोकसभा चुनाव में बीजेपी की टिकट पर जीतकर संसद पहुंच चुके हैं. जिन दस सीटों पर बीजेपी चुनाव लड़ रही है, उनमें दो सीटों को छोड़कर बाकी सारी सीटें उसके विधायकों के इस्तीफों की वजह से खाली हुई हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में अकबरपुर जिले की जलालपुर सीट बीएसपी और रामपुर सीट समाजवादी पार्टी ने जीती थी. लेकिन बीजेपी उपचुनाव में इन दोनों सीटों पर भी पूरा जोर लगा रही है.

उत्तर प्रदेश के लखनऊ की कैंट, बाराबंकी की जैदपुर, चित्रकूट की मानिकपुर, सहारनपुर की गंगोह, अलीगढ़ की इगलास, रामपुर, कानपुर की गोविंदनगर, बहराइच की बलहा, प्रतापगढ़, मऊ जिले की घोसी और अंबेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं.

ये सीटें लोकसभा चुनाव में जीतने वाले योगी सरकार में मंत्री रहे सत्यदेव पचौरी, रीता बहुगुणा जोशी और एसपी सिंह बघेल की वजह से खाली हुई हैं, तो घोसी से विधायक रहे फागू चौहान ने बिहार का राज्यपाल बनने के बाद इस्तीफा दे दिया. बाकी सीटें बीजेपी विधायकों के सांसद बनने के कारण खाली हुई हैं, जबकि रामपुर सीट आजम खान के और जलालपुर बसपा उम्मीदवार रितेश पांडेय के लोकसभा में पहुंचने के चलते खाली हुई हैं.

उपचुनाव की घोषणा के पहले ही मुख्यमंत्री योगी, प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव और संगठन महामंत्री सुनील बंसल चुनाव वाले क्षेत्रों का कई बार दौरा करके मतदाताओं तक अपनी उपस्थिति और सरकार की योजनाओं के बारे में बता चुके हैं. चुनावी घोषणा के बाद सभी सीटों पर इन नेताओं के दोबारा कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं और ठीक उसी तर्ज पर चुनाव प्रचार हो रहा है जैसे मुख्य चुनावों के दौरान होता है. इसके अलावा बीजेपी इन सीटों पर तमाम तरह के जातीय सम्मेलनों के आयोजनों से भी नहीं चूक रही है.

दरअसल, ये उपचुनाव बीजेपी के लिए इसलिए बहुत महत्व रखते हैं कि इनके जीतने पर बीजेपी का मनोबल तो सातवें आसमान पर पहुंचेगा ही, विपक्ष का मनोबल और टूटेगा. निश्चित तौर पर इसका प्रभाव 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा. दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के निशाने पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की तुलना में कांग्रेस ज्यादा है जबकि कांग्रेस के यूपी में महज सात विधायक हैं. पिछले दिनों प्रतापगढ़ में जनसभा के दौरान वहां कांग्रेस की कद्दावर नेता राजकुमारी रत्ना सिंह का बीजेपी में शामिल होना बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश दे रहा है. रत्ना सिंह का परिवार तीन पीढ़ियों से कांग्रेसी रहा है और वे खुद प्रतापगढ़ सीट से तीन बार सांसद रही हैं. उनके पिता दिनेश सिंह विदेश मंत्री रहे हैं.

जहां तक विपक्ष का सवाल है तो बीजेपी के आक्रामक चुनाव प्रचार के आगे विपक्ष मुकाबले में बेहद कमजोर दिख रहा है. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ गठबंधन न सिर्फ टूट चुका है बल्कि बहुजन समाज पार्टी पहली बार उपचुनाव में आधिकारिक रूप से हिस्सा ले रही है. अब तक वह उपचुनावों से दूरी बनाकर रहती थी. वहीं कांग्रेस सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार लड़ा रही है.

बताया जा रहा है कि बीजेपी की आक्रामक रणनीति और पूरी तरह से चुनावी मैदान में उतरने के पीछे पिछले दिनों हुए हमीरपुर विधानसभा सीट के परिणाम भी प्रमुख कारण रहे हैं. यह सीट बीजेपी विधायक के अयोग्य घोषित होने की वजह से खाली हुई थी और बीजेपी ने उसे फिर से जीत लिया. लेकिन बिखरे विपक्ष के बावजूद जिस तरीके से समाजवादी पार्टी ने उसे चुनौती दी और बीजेपी की जीत का अंतर बेहद कम रहा, उससे बीजेपी काफी सतर्क हो गई है.

इसके अलावा उपचुनाव पूरी तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साख से भी जुड़े हैं. उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य महाराष्ट्र में प्रभारी बनाए जाने के कारण वहां के चुनाव में व्यस्त हैं. ऐसे में पूरी जिम्मेदारी एक तरह से योगी आदित्यनाथ के कंधों पर ही है. बीजेपी के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उपचुनाव में किसी तरह की भी कोई कमी या हार सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ की हार के तौर पर देखी जाएगी और पार्टी नेता अमित शाह इस पर नजर रखे हुए हैं.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी और बहुजन समाज पार्टी कमजोर भले ही हैं लेकिन दोनों ने चुनाव प्रचार में अपने बड़े नेताओं को नहीं उतारा है. बीएसपी नेता मायावती जहां अन्य राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में व्यस्त हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी अपने राज्य स्तरीय नेताओं के भरोसे ही चुनावी मैदान में है. यहां तक कि महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी भी प्रचार में नहीं जा रही हैं. ऐसे में हार का ठीकरा कम से कम बड़े नेताओं पर नहीं फूट सकेगा. हां, समाजवादी पार्टी के पास उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के अलावा न तो कोई और नेता है और न ही कोई चेहरा. इसलिए उनका प्रचार में उतरना जरूरी है. और देखा जाए तो बीजेपी के मुकाबले उपचुनाव में मुख्य विपक्षी के तौर पर समाजवादी पार्टी ही है, कुछेक सीटों को छोड़कर."

यूं तो बीजेपी की निगाह अपनी जीती सीटों को वापस पाने पर है ही, जलालपुर और रामपुर सीटों पर वह खासतौर पर नजर गड़ाए हुए है और पूरी ताकत झोंके हुए है. इस सीट पर बीजेपी 1996 से लेकर अब तक कोई चुनाव नहीं जीत सकी है. 1996 में बीजेपी को पहली और आखिरी बार जीत मिली थी जबकि उसके बाद वह कभी दूसरे और तीसरे नंबर पर भी नहीं रही. हां, साल 2017 में बीजेपी ने यहां दूसरा स्थान हासिल किया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाले बीजेपी उम्मीदवार राजेश सिंह के पिता ही 1996 में यहां बीजेपी के टिकट पर जीते थे. लेकिन बाद में उन्होंने बीजेपी छोड़कर सपा, बसपा और निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता.

वहीं सबसे अहम मानी जा रही रामपुर सीट को भी बीजेपी ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ रखा है. इस सीट पर पार्टी को आज तक जीत नहीं हासिल हो सकी है. दिलचस्प बात यह है कि रामपुर लोकसभा सीट पर तो बीजेपी दो बार जीत चुकी है लेकिन विधानसभा सीट पर वह हमेशा मुकाबले से बाहर ही रही है. समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान 1980 से लेकर अब तक लगातार इस सीट पर चुनाव जीतते आए हैं. सिर्फ 1996 में उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार अफरोज अली खान ने हराया था. इस बार आजम खान की पत्नी तंजीम फातिमा समाजवादी पार्टी से उम्मीदवार हैं.

वहीं बाराबंकी जिले की जैदपुर सीट कांग्रेस नेता पीएल पुनिया के लिए प्रतिष्ठा बचाने की बची हुई है. पीएल पुनिया के बेटे तनुज पुनिया 2017 में इस सीट पर बीजेपी उम्मीदवार से हार चुके हैं लेकिन पार्टी ने इस बार भी उन्हीं पर दांव लगाया है. इस साल लोकसभा चुनाव में भी तनुज पुनिया कांग्रेस पार्टी से उम्मीदवार थे और हार गए थे. कांग्रेस पार्टी के लिए सहारनपुर की गंगोह सीट भी उम्मीद जगाने वाली है जहां 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे कम अंतर से बीजेपी के हाथों हार मिली थी.

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