बाल श्रमिकों को न्याय दिलाने में मदद कर रहे हैं काउंसलर | भारत | DW | 29.11.2019
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भारत

बाल श्रमिकों को न्याय दिलाने में मदद कर रहे हैं काउंसलर

भारत में करीब 44 लाख बच्चे मजदूरी कर रहे हैं. तस्कर इन्हें लालच देकर ले जाते हैं और बंधुआ मजदूर की तरह काम करवाते हैं. कभी-कभी ऐसा होता है कि तस्करों के चंगुल से छुड़ाए गए बच्चे ठीक से खड़े तक नहीं हो पाते.

आरती शर्मा एक काउंसलर हैं. वे 10 साल के एक बच्चे से मिली जिसे उसके पिता ने 500 रुपये में चूड़ी बनाने वाले कारखाने में काम करने के लिए बेच दिया था. आरती को उम्मीद थी कि बच्चा जब उनसे मिलेगा तो उसकी आंखों में आंसू होंगे लेकिन ऐसा नहीं था. बच्चा पूरी तरह खामोश था. यह बच्चा उस फैक्ट्री से भाग गया था. आरती उस बच्चे को उसके घर भेजना चाहती थी. इसके लिए उन्हें उसके घर का पता चाहिए था. लेकिन बच्चे से उसके घर का पता लेने में उन्हें एक सप्ताह से ज्यादा का समय लग गया. हालांकि तस्करों को सजा नहीं मिल सकी क्योंकि पुलिस के पास मामला दर्ज नहीं हुआ था.

पश्चिमी भारत के पर्यटन के लिए मशहूर राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में आरती काउंसलिंग का काम करती हैं. यहां एक प्रशिक्षण केंद्र है जहां बाल मजदूर और अन्य कमजोर बच्चों की देखरेख की जाती है. प्रशिक्षण केंद्र के अपने काउंसलिंग कमरे में बैठी 27 वर्षीय आरती कहती हैं, "वह काफी दर्द और गुस्से में था और उसे तत्काल सहायता की जरूरत थी. मैं जानती थी कि उसके साथ जुड़ना और जो कुछ हुआ था उसे समझना कितना आवश्यक है. लेकिन मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था. लड़का कुछ नहीं बोल सकता था." आरती ने कहा कि तीन साल बाद बाल सुरक्षा में सुधार पर विचार किया गया है. जयपुर प्रशासन ने जनवरी महीने में इस किले और महलों के लिए प्रसिद्ध शहर को बाल श्रम से मुक्त बनाने की शपथ ली. इसमें पीड़ितों की काउंसलिंग के साथ दोषियों को सजा दिलाने के लिए पुलिस और वकीलों का एक पूल बनाया गया.

बड़ी चुनौती

भारत के बिहार जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में गरीब बच्चों की तस्करी कर उन्हें जयपुर लाया जाता है. यहां उन्हें चूड़ी और कपड़ों की सिलाई के करोड़ों के कारोबार में बंधुआ मजदूर की तरह काम करवाया जाता है. जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि जयपुर में सबसे ज्यादा बाल मजदूर हैं जिनकी संख्या करीब दो लाख 50 हजार है. वहीं पूरे देश में 5 से 14 साल उम्र वाले कामकाजी बच्चों की संख्या करीब 44 लाख है.

हालांकि राज्य द्वारा संचालित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण का अनुमान है कि जयपुर की अदालतों में लगभग 200 बाल श्रम मामले चल रहे हैं. 2019 के शुरुआत तक पिछले एक दशक में इस मामले में एक भी सजा नहीं हुई. बिहार स्थित बाल संरक्षण चैरिटी सेंटर डाइरेक्ट के कार्यकारी निदेशक सुरेश कुमार कहते हैं, "तस्करों के ऊपर तब तक मुकदमा चलाना मुश्किल है जब तक बच्चे और उनके परिवार वाले ये न समझें कि बाल श्रम एक अपराध है. इस अपराध का भंडाफोड़ बच्चे और उसके परिजनों की काउंसलिंग के माध्यम से ही हो सकता है. परिजनों को प्रायः यह नहीं मालूम होता है कि उनके बच्चे से लगातार 12 घंटे काम करवाया गया, उसे खाना नहीं दिया गया और पिटाई की गई. उन्हें इस बात का एहसास नहीं है कि जब उन्हें बचाया जाता है तो कुछ लड़के मुश्किल से खड़े हो सकते हैं."

मनोवैज्ञानिक समस्या

पुलिस द्वारा बचाए गए बच्चों को शेल्टर होम में ले जाया जाता है लेकिन यहां बच्चों के ज्यादा मनोवैज्ञानिक सहायता नहीं मिल पाती है. बचाए गए बच्चे आमतौर पर वकीलों, कर्मचारियों और पुलिस के सामने ज्यादा कुछ नहीं बोल पाते हैं. सरकार ने 2015 में राजस्थान पुलिस एकेडमी में बच्चों की सुरक्षा के लिए बाल संरक्षण केंद्र खोला. इसका उद्देश्य बच्चों की तस्करी से निपटने के पुलिस, न्यायपालिका और काउंसलरों को प्रशिक्षित करना है. बाल संरक्षण केंद्र प्रमुख राजीव शर्मा कहते हैं, "पुलिस लगातार बच्चों को बचा रही थी और उन्हें उनके घर भेज रही थी. इसके बावजूद समस्या जस की तस बनी थी. बचाए गए बच्चे सभी के लिए एक बड़ी समस्या थे. किसी को यह नहीं पता था कि उनके साथ कैसे बातचीत करनी है या ऐसा क्या करना है कि बच्चों खुद को सुरक्षित महसूस करें."

केंद्र ने पुलिस थानों में दर्ज शिकायतों, अदालतों के फैसलों, पुलिस और वकीलों से बात करने के बाद इस बात पर निष्कर्ष निकाला कि आखिर कमी कहां रह जा रही है. शर्मा कहते हैं, "हमें यह आभास हुआ है कि बाल श्रम को समाप्त करने में हमारी कोशिशों में कहीं कमी रह जा रही है. बच्चे कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे थे और तस्कर अपराध को अंजाम दे रहे थे."

केंद्र ने अपने शोध में यह पाया कि बच्चे अकसर अपना नाम गलत बताते थे और उनके साथ जो दुर्व्यवहार होते थे, उसे बताने से इनकार कर देते थे. यहां तक की अपनी जिंदगी के डर से तस्करों को अपना रिश्तेदार तक बता देते थे. कई बच्चों की सिर्फ एक बार ही काउंसलिंग की गई जो कानूनन जरूरी थी. लेकिन प्रायः उनके काउंसलर योग्य नहीं होते थे और बच्चों के साथ अनुचित व्यवहार करते थे.

काउंसलरों का प्रशिक्षण

दर्जनों नए काउंसलरों को 450 से अधिक लड़कों को नियमित सहायता प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है. ये वे बच्चे हैं जिनके मामले अदालत में लंबित हैं. ये काउंसलर यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे बाद में सुरक्षित घर लौट जाएं. पुलिस को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है कि वे सही से शिकायत दर्ज करें. वकील बच्चों को अदालत में पूछताछ की प्रक्रिया और गवाह बॉक्स में पुख्ता प्रमाण देने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं. बचाए गए बच्चों और उनके परिजनों को भी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान सुरक्षा दी जा रही है ताकि तस्कर उन्हें डरा नहीं पाएं. इसकी वजह ये है कि ज्यादातर मामलों में तस्कर उनके गांव या आस-पड़ोस के ही होते हैं.

बाल श्रम और तस्करी मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम करने वाले संगठन के साथ काम करने वाली वकील तुशिका अग्रवाल कहती हैं, "काउंसलर को चाहिए कि वे बच्चों को यह समझा सकें कि कोर्ट में बच्चों को डराया नहीं जाता है. नहीं तो पहले जो चला आ रहा है, वह चलता रहेगा. बच्चे कोर्ट में कहते हैं कि वे शहर में घूमने आए थे और उन्होंने यहां कभी काम नहीं किया. तस्कर अकसर बच्चों के साथ अदालत में जाते हैं और बच्चों माध्यम से यह कहलवाते हैं कि उनके साथ कुछ गलत नहीं हुआ.

हालांकि नए प्रयास से सफलता मिल रही है. अगस्त महीने में अग्रवाल ने एक असामान्य जीत की खुशी मनाई. एक आदमी पांच बच्चों को अच्छी शिक्षा का लालच देकर चूड़ी के कारखाने में काम करवाने ले गया. उस आदमी को उम्र कैद की सजा हुई. यह इस मामले में राजस्थान में पहली सजा थी. अग्रवाल कहती हैं, "यह एक उल्लेखनीय मामला था. तस्कर ने बच्चों और उनके परिजनों को धमकी दी थी. यहां तक की परिवार के एक सदस्य को अगवा भी कर लिया था ताकि बच्चे उसके खिलाफ कोर्ट में गवाही न दें. लेकिन बच्चों ने गवाही दी." और पांच लड़कों की गवाही ने ऐतिहासिक जीत हासिल की.

बदल रहीं हैं चीजें

प्रशिक्षण केंद्र की दीवार पर सैकड़ों बच्चों की तस्वीर लगी है जिन्होंने घर जाने से पहले कुछ समय शेल्टर होम में बिताया. प्रशिक्षण केंद्र के संस्थापक रमेश पालीवाल कहते हैं, "प्रत्येक लड़के के साथ जुड़ना एक चुनौती थी और हमें उन्हें समझने के लिए थिएटर, संगीत और कला का सहारा लेना पड़ा. लेकिन हमेशा यह काफी नहीं होता. लड़के सिर्फ कुछ महीनों के लिए हमारे साथ थे. हमें उनके साथ पूरी तरह जुड़ने और चीजों की तह तक जाने के लिए बहुत कम समय दिया गया."

पालीवाल को लगता है कि चीजें धीरे-धीरे बदल रही हैं क्योंकि काउंसलर बच्चों का भरोसा जीतने में ज्यादा समय देते हैं. इससे बच्चे अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को बता पाते हैं. वे कहते हैं, "हम इस चुनौती का अकेले सामना कर रहे थे. हमें यह भी नहीं मालूम था कि हम सही कर रहे हैं या नहीं? अब काउंसलर भी जुड़ गए हैं और अपने अनुभव को साझा कर रहे हैं. हम सब मिलकर समाधान तलाशते हैं और इससे मदद मिलती है."

मनोवैज्ञानिक प्रज्ञा देशपांडे बाल संरक्षण केंद्र में काउंसलर को प्रशिक्षित करती हैं. वे कहती हैं, "अभी भी कई सारी चुनौतियां हैं. जैसे कि वे बच्चों के साथ उनके स्थानीय भाषा में बात करें और जब उन्हें बचा कर लाया जाता है उस समय उपलब्ध रहें. यह काम अकसर रात में ही होता है. चुनौती बहुत बड़ी है." पुलिस अधिकारी शर्मा कहते हैं कि अगले साल से काउंसलर 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे. बचाव के दरम्यान तथा उसके बाद पुलिस और वकील की सहायता के लिए उन्हें कभी भी बुलाया जा सकेगा. 

आरआर/आरपी (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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