बारूद के ढेर पर बैठा है पूर्वोतर भारत | दुनिया | DW | 09.01.2016
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दुनिया

बारूद के ढेर पर बैठा है पूर्वोतर भारत

पूर्वोत्तर के मणिपुर में आए भूकंप से हुई तबाही ने विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है. उनका कहना है कि समूचा पूर्वोत्तर बारूद के ढेर पर बैठा है. बावजूद इसके कोई एहतियाती उपाय नहीं किए जा रहे हैं.

खड़गपुर स्थित भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी) के भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वोत्तर भारत के कई इलाके भूकंप के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते जा रहे हैं. वहां रिक्टर स्केल पर 9.2 की तीव्रता वाला भूकंप भी अस्वाभाविक नहीं है. इस पैमाने पर होने वाले भूकंप से न सिर्फ पूर्वोत्तर राज्यों बल्कि पश्चिम बंगाल के ज्यादातर इलाकों में भी भारी तबाही मचेगी. आईआईटी के भू-वैज्ञानिक और भूकंप विशेषज्ञ शंकर कुमार नाथ कहते हैं, "पूर्वोत्तर भारत में जमीन के नीचे कम से कम एक सौ विकृतियां (फाल्ट्स) हैं. उनसे लगातार ऊर्जा निकल रही है. इसी वजह से पूरा इलाका भूकंप के प्रति खतरनाक स्तर तक संवेदनशील हो गया है."

विशेषज्ञों का कहना है कि इलाके में इन फाल्ट्स की वजह से छोटे-छोटे झरोखे बन गए हैं. चट्टानों के खिसक कर जगह बदलने की वजह से ही इंफाल में धरती बैठ गई और व्यापक तबाही हुई. विशेषज्ञों की राय में चार इलाकों में आने वाले भूकंप भारी तबाही मचाने में सक्षम हैं. यह हैं शिलांग, आराकान (त्रिपुरा-चटगांव इलाका), मिसमी पर्वतीय क्षेत्र (म्यामांर से लगा मिसमी पहाड़) और पूर्वी सीमांत इलाका.

वजह

प्रोफेसर रोजर बिलहाम, विनोद के. गौड़ और पीटर मोलनार नामक भूविज्ञानियों ने वर्ष 2001 में ‘जर्नल साइंस' में ‘हिमालय सेशमिक हाजार्ड' शीर्षक वाले अपने शोधपत्र में कहा था कि इस बात के एकाधिक संकेत मिले हैं कि हिमालय के इस इलाके यानी दार्जिलिंग और सिक्कम की पहाड़ियों में एक बड़ा भूकंप कभी भी आ सकता है. उससे लाखों लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है. उन्होंने कहा था कि हिमालय के छह क्षेत्रों में रिक्टर स्केल पर आठ या उससे ज्यादा के भूकंप आने का अंदेशा है. दार्जिलिंग-सिक्किम रेंज भी इनमें शामिल है. इस बात का प्रबल अंदेशा है कि हिमालय के जिन इलाकों में बीते पांच-सात सौ वर्षों में कोई बड़ा भूकंप नहीं हुआ है वहां अब ऐसा हो सकता है. भूकंप के खतरे की अनदेखी कर पर्वतीय राज्यों में लगातार कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं.

मिट्टी के कटाव और इसके संक्षरण को विशेषज्ञ जमीन धंसने की प्रमुख वजह मानते हैं. लेकिन इसके अलावा एक और वजह यह है कि हिमालय की इस पूर्वी रेंज के पहाड़ अपेक्षाकृत जवान है. इनकी बनावट में होने वाले बदलावों की वजह से भूगर्भीय ढांचा लगातार बदलता रहता है और अब तक स्थिर नहीं हो सका है. इसके अलावा देश के दूसरे पर्वतीय इलाकों की तरह यहां होने वाली पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी मिट्टी खिसकने की एक प्रमुख वजह है.

काउंसिल फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के सेंटर फॉर मैथेमेटिकल एंड कंप्यूटर सिमुलेशन की एक टीम ने बीते कुछ वर्षों के अध्ययन के बाद अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि इन पहाड़ियों के नीचे धीरे-धीरे दबाव बन रहा है. टीम के नेता प्रोफेसर गौड़ ने चेतावनी दी है कि इलाके में कभी भी कोई बड़ा भूकंप आ सकता है. जमीन के नीचे दबी ऊर्जा जब बाहर निकलेगी तब भूकंप से जिस पैमाने पर विनाश होगा, उसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. लेकिन उनकी यह चेतावनी और अध्ययन रिपोर्ट फाइलों में पड़ी धूल फांक रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक, जमीन के नीचे भारतीय व यूरेशियाई प्लेटों के बीच टकराव की वजह से विशालकाय चट्टानें दक्षिण की ओर बढ़ती हैं. इन चट्टानों को एक-दूसरे से अलग करने वाली प्लेटों के जगह बदलने से ही उनके नीचे दबी ऊर्जा के बाहर निकलने की वजह से भूकंप आते हैं.

खतरनाक इलाकों की पहचान

आईआईटी के वैज्ञानिकों की एक टीम हिमालय से सटे भूकंप-प्रवण इलाकों की पहचान करने के काम में जुटी है. उस टीम के प्रमुख शंकर नाथ बताते हैं, "इंफाल में आए भूकंप का केंद्र अराकान इलाके में एक ऐसी जगह था जहां भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट के भीतर घुसती जा रही है." वैज्ञानिकों को आशंका है कि मिसमी क्षेत्र में 9.2 तक की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है. बाकी तीन इलाकों में अधिकतम 8.7 तीव्रता वाला भूकंप आने का ही अंदेशा है. वैज्ञानिकों की इस टीम ने सितंबर 2011 में सिक्किम में आए भूकंप के बाद प्रभावित इलाकों का दौरा किया था. तब रिक्टर स्केल पर 6.9 तीव्रता वाले भूकंप ने ही इलाके में भारी पैमाने पर जान-माल का नुकसान पहुंचाया था. ऐसे में 8.7 या उसे ज्यादा तीव्रता वाले भूकंप से होने वाली तबाही का अनुमान लगाना भी भयावह है.

आईआईटी के वैज्ञानिकों की टीम ने इस मामले पर पश्चिम बंगाल सरकार को भी सतर्क कर दिया है. उनका कहना है कि नेपाल के हिंदूकुश इलाके में भूकंप आने की स्थिति में भी उत्तर बंगाल या कोलकाता पर उसका असर पड़ेगा. लेकिन पूर्वोत्तर भारत में आने वाले किसी भूकंप का बंगाल पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा. मिसाल के तौर पर बीते साल नेपाल में जब रिक्टर स्केल पर 8 की तीव्रता वाला भूंकप आया था तो कोलकाता में तीन की तीव्रता वाले भूकंप के समान ही धरती कांपी थी. लेकिन पूर्वोत्तर में 6.7 की तीव्रता वाले भूकंप की स्थिति में यहां रिक्टर स्केल पर पांच की तीव्रता वाला कंपन महसूस किया गया था. जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल ज्ञानरंजन कयाल कहते हैं, "पूरा पूर्वोत्तर भारत भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. वहां साल में छोटे-छोटे भूकंप तो कई बार होते हैं, लेकिन 10-15 साल के अंतर पर रिक्टर स्केल पर सात तक की तीव्रता वाला भूंकप आना भी अस्वाभाविक नहीं है."

वैज्ञानिकों का अनुमान आंकड़ों पर आधारित है. मणिपुर में आए भूकंप के केंद्र तामेंगलांग के ढाई सौ किलोमीटर के दायरे में बीते सौ वर्षों के दौरान रिक्टर स्केल पर छह या उससे ज्यादा 19 भूकंप आ चुके हैं. इनमें 1946 में आया भूकंप सबसे भयावह (रिक्टर स्केल पर आठ) था. बीते साल जनवरी से अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में 392 भूकंप आ चुके हैं. इनमें से अकेले 136 भारत में आए हैं. भूकंप की सबसे ज्यादा मार झेलने वाले इलाकों में मणिपुर, मिजोरम, मेघालय की गारो पहाड़ियां, असम, अंडमान निकोबार द्वीप समूह और गुजरात का कच्छ इलाका शामिल है जहां एक साल के दौरान 114 भूकंप आ चुके हैं.

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