बाजार का फायदा, बच्चों को नुकसान | विज्ञान | DW | 20.06.2012
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

विज्ञान

बाजार का फायदा, बच्चों को नुकसान

फुटबॉल के मौसम में जर्मनी में बच्चों के लिए जंक फूड की बाढ़ आ गई है. पहले ही देश में आधी आबादी मोटापे की शिकार है. बाजार के मुनाफे के लिए बच्चों की सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है.

चिप्स, चॉकलेट और कोल्ड ड्रिंक बच्चों के पसंदीदा होते हैं. इन्हें बनाने वाली कम्पनियां भी बच्चों को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़तीं. कभी टॉफी के साथ स्टीकर और टैटू मिलते हैं तो कभी पसंदीदा फिल्मी सितारे और खिलाड़ी विज्ञापनों में इन्हें बेचते हैं. और अगर मौका फुटबॉल के यूरो कप जैसा हो, तो कम्पनियां जी तोड़ मेहनत करती हैं. जर्मनी में आज कल हालात कुछ ऐसे ही हैं और बच्चों की सेहत सरकार की चिंता का विषय बन गई है.

बच्चों के खाने में शराब

जर्मनी की ग्रीन पार्टी की मांग है की टीवी पर बारह साल से कम उम्र के बच्चों को दिखाते हुए विज्ञापन ना चलाए जाएं. ग्रीन पार्टी ने ऐसे प्रोडक्ट्स की जांच भी कराई है जो खास तौर से यूरोकप के दौरान बच्चों के लिए बाजार में लाए गए हैं. जाहिर है मैच देखते समय बच्चे और बड़े सभी स्नैक्स खाना पसंद करते हैं, लेकिन अधिकतर लोग यह नहीं समझ पाते कि इनमें जरूरत से ज्यादा नमक, चीनी और तेल होता है. ग्रीन पार्टी द्वारा कराई गई जांच के अनुसार तीन चौथाई प्रोडक्ट ऐसे हैं जो सेहत के लिए हानिकारक हैं. इनके अलावा दस प्रतिशत ऐसे हैं जिनमें अल्कोहल का इस्तेमाल किया गया है.

GDA-Angaben Portionsgröße

कितना खा रहे हैं इस पर ध्यान देना जरूरी

पांच गुना कैलोरी

खाने की चीजों में प्रति सौ ग्राम सौ कैलोरी को स्वस्थ माना जाता है, लेकिन इनमें से आधे प्रोडक्ट ऐसे हैं जिनमें हर सौ ग्राम में पांच सौ कैलोरी हैं. एक व्यस्क पुरुष को एक दिन में 2100 कैलोरी लेनी होती हैं, महिलाओं को 1800 और बच्चों को उम्र के अनुसार 1000 से 1400 के बीच कैलोरी लेनी होती हैं. इसका मतलब यह हुआ कि यदि बच्चे पुडिंग के तीन पैकेट खा लें तो उनके पूरे दिन का कैलेरी काउंट पूरा हो जाता है.

जर्मनी में बच्चों के डॉक्टर मिशाएल राडके का कहना है कि यदि पैकेट पर कैलोरी की मात्रा के बारे में पूरी जानकारी दी जाए तो उस से लोगों में जागरूकता फैलाने में मदद मिल सकती है. वैसे तो खाने पीने की सभी चीजों पर कैलोरी टेबल देना अनिवार्य है, लेकिन अक्सर यह पैकेट के किसी कोने में छिपा कर दिया जाता है और बेहद छोटे अक्षरों में लिखा जाता है. राडके कहते हैं, "अगर आप दादा दादी हैं और अपने पोते पोतियों के लिए कुछ मीठा खरीदना चाहते हैं, तो आप ये सब पढ़ ही नहीं सकते अगर वह बड़े अक्षरों में साफ साफ न लिखा गया हो तो. और अगर आप पढ़ भी लें तो आपको ठीक से समझ ही नहीं आएगा कि इनमें क्या क्या डाला गया है."

मुनाफे के लिए

खाने पीने की चीजों की गुणवत्ता पर ध्यान देने वाली संस्था फूडवॉच ने साल की शुरुआत में बच्चों के खाने पीने वाली 1500 ऐसी चीजों की लिस्ट तैयार की जो सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह हैं. लेकिन माता पिता को अक्सर इनके बारे में कोई जानकारी नहीं होती. फूडवॉच का कहना है कि बाजारों में इन चीजों को प्रोत्साहन दिया जाता है क्योंकि मुनाफा इन्हीं से कमाया जा सकता है, "फल सब्जियों से आप बहुत ही कम मुनाफा कमा सकते हैं, जबकि जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक्स से बहुत ज्यादा. इसलिए बच्चों को स्वस्थ खाना बेचने से तो घाटा ही होगा." यानी बाजार के फायदे के लिए बच्चों को नुकसान पहुंचाने में कोई हर्ज नहीं समझा जाता.

Kinderlebensmittel mit Ampel

बाजार में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक चीजों की कोई कमी नहीं

भ्रामक विज्ञापन

डॉक्टर राडके का कहना है कि इन चीजों पर लाल और हरे निशान बने होने चाहिए ताकि माता पिता खरीदते वक्त ही समझ सकें कि वे बच्चों के लिए क्या ले रहे हैं. ऐसे में चिप्स और कैंडी पर लाल निशान बना हुआ होगा. राडके का कहना है कि टीवी पर विज्ञापन भी भ्रामक होते हैं और जब पसंदीदा खिलाड़ी उनकी तारीफ करते दिखते हैं तो बच्चे उनकी कही बातों पर यकीन कर लेते हैं, "आप केलोग्स कॉर्नफ्लेक्स के विज्ञापन में फुटबॉल टीम के एक खिलाड़ी को यह कहते देखते हैं कि यह पौष्टिक नाश्ता है. लेकिन जब आप पैकेट पर पढेंगे कि उसमें क्या क्या है, तो समझ में आएगा कि यह कोई ताकत देने वाला नाश्ता नहीं, बल्कि मिठाई है."

इसी तरह से न्यूटेला के विज्ञापन में भी खिलाड़ियों को ब्रेड पर एक मोटी परत लगा कर खाते देखा जाता है. बच्चे इसे देख कर सोचते हैं कि यह खिलाड़ी के स्वास्थ्य का राज है, जबकि यह केवल मक्खन, चीनी और चॉकलेट का मिश्रण है. डॉक्टर राडके का कहना है कि जब तक सरकार कोई ठोस कदम नहीं लेती और बाजार में बच्चों को लुभाने वाले इन चीजों के रंग बिरंगे पैकेट बिकते रहेंगे तब तक समस्या बनी रहेगी.

रिपोर्ट: आन्द्रेयास नॉल / ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

DW.COM

विज्ञापन