बांग्लादेशी नदियों की जान बचाने का फैसला, अतिक्रमण के लिए मिलेगी सजा | विज्ञान | DW | 02.07.2019
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विज्ञान

बांग्लादेशी नदियों की जान बचाने का फैसला, अतिक्रमण के लिए मिलेगी सजा

गंदी नदियां सिर्फ गंगा की समस्या नहीं है, न ही सिर्फ भारत की. बांग्लादेश में सर्वोच्च अदालत ने नदियों पर कब्जे और उसे गंदा करने को अपराध घोषित कर दिया है. साथ ही सरकार से लोगों को जागरूक करने के कदम उठाने को कहा है.

बांग्लादेश हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार से कहा है कि वह नदी संरक्षण आयोग कानून में संशोधन करे और नदियों पर कब्जे और प्रदूषण के लिए कैद और भारी जुर्माने की सजा तय करे. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने ये फैसला पिछली फरवरी में ही सुना दिया था लेकिन अब उसका पूरा टेक्स्ट जारी किया गया है. इस फैसले में नदियों और जलाशयों को बचाने के लिए 17 निर्देश दिए गए हैं. बांग्लादेश नदियों और जलाशयों का देश है लेकिन पिछले सालों में उनकी संख्या लगातार घटती गई है.

हाई कोर्ट बेंच ने तूराग नदी पर मुकदमे की सुनवाई के बाद अपने सख्त फैसले में कहा है, "नदियों की हत्या हम सबकी सामूहिक आत्महत्या है. नदियों को मारना मौजूदा और भावी पीढ़ियों को मारना है." तूराग नदी के कब्जे और प्रदूषण का मामला इतना गंभीर हो गया था कि अदालत ने उसे व्यक्ति और जीवित हस्ती घोषित कर दिया है. वह यह दर्जा पाने वाली दुनिया की चौथी नदी है. इससे पहले न्यूजीलैंड में वांगानुई और भारत में गंगा और यमुना को यह दर्जा मिल चुका है.

बांग्लादेश में एक एनजीओ ने नदियों को भरने, कब्जा करने और अवैध निर्माण के खिलाफ मुकदमा किया था. पिछले साल ही अदालत ने अधिकारियों से यह भी पूछा था कि उनके द्वारा कब्जे और अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई न करने को अवैध क्यों न घोषित कर दिया जाए. स्थानीय रिपोर्टों के आधार पर अवैध निर्माण को हटाने के आदेश मुकदमे के दौरान ही दे दिए गए थे. बांग्लादेश की आजादी के समय नदियों का रास्ता 24,000 किलोमीटर था जो अब घटकर सिर्फ 6,000 किलोमीटर रह गया है. इसकी मुख्य वजह तटीय इलाकों का कब्जा और नदियों को निर्माण के लिए भरा जाना है.

बांग्लादेश की अदालत ने नदियों और जलाशयों पर कुछ अहम निर्णय लिए हैं. एक तो सार्वजनिक ट्रस्टीशिप के सिद्धांत पर राज्य को नदियों, पहाड़ों, जंगलों और सागर के अलावा सभी प्रकार के जलाशयों का ट्रस्टी बना दिया गया है. तूराग और देश की सभी नदियों को कानूनी तौर पर व्यक्ति का दर्जा दे दिया गया है और राष्ट्रीय नदी संरक्षण आयोग को कानूनी अभिभावक बनाया गया है. अब हर तरह की सरकारी संस्थाओं को नदियों के सिलसिले में कुछ भी तय करने या योजना बनाने से पहले राष्ट्रीय नदी संरक्षण आयोग की सहमति लेनी होगी.

डूबते द्वीप में तैरते खेतों का सहारा

बांग्लादेश में आर्थिक विकास के साथ नदियों के कारोबारी इस्तेमाल की समस्या भी गंभीर होती गई है. देश के प्रभावशाली कारोबारी समूह नदियों के किनारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. अधिकारियों द्वारा अवैध संरचनाओं को हटाने के फौरन बाद वे फिर से उसी जगह पर लौट आते हैं. अदालत ने सरकार से नदियों पर कब्जा करने वालों की सूची बनाने और उसका प्रकाशन करने को कहा है, और चुनाव आयोग से कहा है कि ऐसे लोगों को किसी भी स्तर पर चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करे. बैंकों से उन्हें किसी भी प्रकार का लोन नहीं देने को कहा गया है.

नदियों के तटीय इलाकों के कब्जे की समस्या ने तब गंभीर रूप लेना शुरू किया जब कुछ साल पहले जिला प्रशासन ने राजधानी ढाका के आसपास की चार नदियों बूढ़ी गंगा, तूराग, बालू और शीतलख्या की हदबंदी की लेकिन तटीय इलाकों को छोड़ दिया. इससे तटीय इलाकों की प्राइवेट मिल्कियत का रास्ता खुला और कब्जा करने वालों को बढ़ावा मिला. आधिकारिक अनुमान के अनुसार शीतलख्या नदी ने ही करीब 1,860 एकड़ जमीन खो दी है. हालांकि बांग्लादेश के घरेलू जल परिवहन निगम ने नदी तटों पर अवैध कब्जा हटाना शुरू कर दिया है, लेकिन जहां जहां नदियों को मिट्टी और बालू से भर दिया गया है वहां उसे पुराने रूप में लाने का काम शुरू होना बाकी है.

सजा देने के अलावा अदालत का ध्यान नदियों की सुरक्षा पर जागरूकता अभियान चलाने पर भी है. उसने शिक्षा मंत्रालय से स्कूलों, मदरसों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हर दो महीने नदियों के महत्व पर एक घंटे की क्लास चलाने को कहा है. उद्योग मंत्रालय से यही काम उद्योगों के कामगारों के लिए करने को कहा गया है. इस तरह देश की युवा पीढ़ी के अलावा आम तौर पर नदियों को प्रदूषित करने वाले उद्यमों के कामगारों को भी नदियों के संरक्षण का महत्व समझाया जा सकेगा.

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