बस की सीट पर समानता की लड़ाई | दुनिया | DW | 22.12.2011
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दुनिया

बस की सीट पर समानता की लड़ाई

इस्राएल में एक महिला ने अति धार्मिक यहूदी के दबाव के बावजूद एक बस में अपनी जगह छोड़कर पीछे बैठने से मना क्या किया, देश में धर्म निरपेक्ष और धार्मिक ताकतों के बीच बढ़ती खाई पर गरमा गरम बहस छिड़ गई है.

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कई बसों में महिलाएं और पुरुष अलग अलग बैठते हैं.

28 साल की तान्या रोजेनब्लिट ने पिछले शुक्रवार को जब येरुशलम में 451 नंबर की बस पकड़ी तो किसी ने सोचा भी नहीं था वह इतिहास रचने जा रही हैं. आम तौर पर रूढ़िवादी यहूदियों द्वारा इस्तेमाल होने वाली यह बस उन्होंने इसलिए पकड़ी कि उन्हें उस इलाके में कुछ काम था जहां अत्यंत धार्मिक यहूदी रहते हैं और यह बस वहां तक जाने का सबसे तेज जरिया था.

बस में बैठने से छिड़ी बहस

अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स यहूदियों की इस्तेमाल की जाने वाली बसों में औरतें पिछली सीटों पर बैठती हैं जबकि आगे की सीटें मर्दों के लिए सुरक्षित होती हैं. हालांकि उसने ढंग की पोशाक पहन रखी थी, लेकिन एक अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स मर्द ने जब तान्या को अगली सीट पर बैठे देखा तो उसने बस पर चढ़ने से मना कर दिया और उससे पिछली सीट पर जाने को कहा.

तान्या का कहना है कि उसने उसे "शिक्से" कहा जो गैर यहूदी महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल होने वाला अपमानजनक शब्द है. तान्या द्वारा पीछे जाने से मना किए जाने पर उसने बस के अगले गेट को घेरकर 30 मिनट तक रोके रखा. ड्राइवर ने पुलिस को बुलाया. लेकिन पुलिस अधिकारी ने बस को रोकने वाले मर्द को कुछ कहने के बदले रोजेनब्लिट से पूछा कि क्या वह अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स जीवन शैली का सम्मान करने और पीछे बैठने को तैयार हैं. ऑर्थोडॉक्स जीवनशैली में पुरुषों को उन महिलाओं के नजदीक जाने की मनाही है जिनसे उनका कोई संबंध नहीं है.

बाद में रोजेनब्लिट ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा, "मैंने जवाब दिया कि मैं सभ्य पोशाक पहन कर उनका पर्याप्त सम्मान कर रही हूं, लेकिन मेरा अपमान नहीं किया जाना चाहिए." पुलिस प्रवक्ता मिकी रोजेनफेल्ड ने डीपीए को बताया कि पुलिस अधिकारी ने रोजेनब्लिट से जरूर पूछा कि क्या वह अपनी जगह छोड़ने को तैयार हैं लेकिन साथ ही यह भी कहा कि कोई उनके साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता.

Ultraorthodoxe Juden in Jerusalem

अमेरिका से तुलना

इस्राएल की बस कंपनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित उसके निर्देश ड्राइवरों को बस में किसी भी तरह का विभाजन करने या उसकी अनुमति देने से मना करते हैं. रूढ़िवादी पैसेंजरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक बस के ड्राइवर का कहना है कि उसकी बस कुछ कुछ सप्ताह पर ऐसी घटना होती है जब महिला पैसेंजर सीटों के स्वैच्छिक बंटवारे को मानने से इनकार कर देती है और उसके बाद गाली गलौज की नौबत आ जाती है.

इस घटना को इस्राएल की मीडिया में भारी पब्लिसिटी मिल रही है. कुछ कमेंटेटर तान्या रोजेनब्लिट की तुलना एफ्रो अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता रोजा पार्क्स के साथ कर रहे हैं, जिसने 1955 में एक गोरे पैसेंजर के लिए बस में अपनी सीट छोड़ने से मना कर दिया था. इसी घटना के बाद अश्वेतों की लड़ाई लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग को नई पहचान मिली थी. यह इस बात का ताजा संकेत है कि अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स और अल्ट्रा राष्ट्रवादी यहूदी इस्राएली समाज को कट्टरपंथ की ओर ले जा रहे हैं.

चोटी के राजनीतिज्ञों की दिलचस्पी

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने घटना पर टिप्पणी करते हुए रविवार को एक कैबिनेट बैठक में कहा, "इस्राएली समाज यहूदी और अरबों, धर्मनिरपेक्ष और अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स लोगों से बना मोजाइक है, और अब तक हम सभी क्षेत्रों में शांतिपू्र्ण सह अस्तित्व और आपसी आदर पर सहमत रहे हैं." उन्होंने रोजेनब्लिट को हटने के लिए कहे जाने का विरोध किया और कहा, "छोटे गुटों को हमारी तहजीब को छिन्न भिन्न करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए, और हमें सार्वजनिक जगह को सभी के लिए खुला और सुरक्षित रखना चाहिए."

तान्या रोजेनब्लिट को परिवहन मंत्री यिजराइल कात्स के साथ मुलाकात के लिए बुलाया गया जबकि विपक्षी नेता सिपी लिवनी ने उन्हें फोन किया और उनके साहत के लिए उन्हें बधाई दी. रोजेनब्लिट ने डीपीए से कहा कि उन्हें ध्यान पाकर अच्छा लग रहा है. उन्होंने कहा कि कोशर बस का चलन नया नहीं है, और उन्हें उम्मीद है कि उनकी कार्रवाई पर शुरू हुई सार्वजनिक बहस दिखाती है कि इस्राएल एक आजाद और खुला समाज है.

लेकिन तेल अवीव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इफराइम यार का कहना है कि यह घटना इस्राएल के लोकतंत्र के लिए खतरे को दिखाती है. उनका कहना है कि दक्षिणपंथ की ओर झुकाव का कारण फलीस्तीनियों के साथ रुकी शांति वार्ता से पैदा गहरा असंतोष है. वे कहते हैं, "भविष्य की रुझान उतनी सकारात्मक नहीं दिखती."

बढ़ रही है रूढ़िवादी आबादी

एक समस्या यह भी है कि रूढ़िवादी और राष्ट्रवादी यहूदियों के बड़े परिवार हैं और उनकी आबादी धर्मनिरपेक्ष लोगों के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है. पिछले पांच सालों में अपने को रूढ़िवादी या धार्मिक कहने वाले लोगों की संख्या 17 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई है. इसी अवधि में धर्मनिरपेक्ष आबादी की संख्या 44 से घटकर 41 हो गई. अपने को यहूदी परंपरा मानने वाला, लेकिन न तो धार्मिक और न ही धर्म निरपेक्ष मानने वाले लोगों की संख्या 39 प्रतिशत बनी हुई है.

धर्म से जुड़े कई मुद्दों पर पिछले महीनों में बहस होती रही है जिसमें यह विवाद भी शामिल है कि क्या धार्मिक सैनिकों को उन सभाओं में जाने से छूट दी जा सकती है जिनमें महिला सैनिक भी गाती हैं. जबकि बाकी मामले मीडिया में नहीं आ पाते रोजेनब्लिट ने अपने फेसबुक पेज पर इसकी जानकारी देकर इसे सार्वजनिक मुद्दा बना दिया है.

रिपोर्ट: डीपीए/महेश झा

संपादन: ए जमाल

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