बर्लिन में मकान मालिकों को किराया घटाना ही होगा | दुनिया | DW | 24.11.2020
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दुनिया

बर्लिन में मकान मालिकों को किराया घटाना ही होगा

आसमान छूते किराये के बीच जर्मन राजधानी में रेंट कैप लॉ की दूसरी स्टेज शुरू हो गई है. इसके दायरे में लाखों मकान हैं. मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच ये कानून क्यों आया?

निर्धारित सीमा (एक तरह का सर्किल रेट) से 20.01 फीसदी ज्यादा किराया वसूल रहे बर्लिन के मकान मालिकों को 23 नवंबर से किराया घटना ही है. ऐसा न करने पर भारी जुर्माना देना होगा. प्रांतीय सरकार के इस फैसले के खिलाफ संवैधानिक अदालत में गए मकान मालिकों को फिलहाल निराश होना पड़ा है.

यूरोप के जिंदादिल शहरों में शुमार बर्लिन में करीब 85 फीसदी लोग किराये के मकानों में रहते हैं. बर्लिन किरायेदार संघ (बीएमवी) के मुताबिक शहर के 3,65,000 अपार्टमेंट्स तुरंत किराया कम करने की श्रेणी में आते हैं. लेकिन इस संख्या को लेकर विवाद भी है. एफ प्लस बी रियल एस्टेट कंसल्टेंसी के मुताबिक ऐसे अपार्टमेंट्स की संख्या पांच लाख से ज्यादा है जो अधिक किराया वसूल रहे हैं.

बीएमवी के हेड राइनर विल्ड ने किराये पर लगाम लगाने वाले कानून का स्वागत करते हुए कहा, "यह बर्लिन के किरायेदारों के लिए एक सौभाग्यशाली ब्रेक है, वो भी कोविड-19 महामारी के चलते आए आर्थिक संकट के दौरान.” उन्होंने किराये में कटौती को "उपयुक्त, न्यायसंगत और समझदारी से भरा” बताया.

किराया कम करने वाला कानून ज्यादातर ऐसे रेंट एग्रीमेंट्स पर लागू होगा, जो बीते पांच छह साल में किए गए हैं. बर्लिन में 2014 से 2019 के बीच मकानों का किराया बहुत तेजी से बढ़ा. इस दौरान नए कॉन्ट्रैक्ट साइन करते वक्त किराया औसतन 30 फीसदी बढ़ा. बीएमवी के मुताबिक रेनोवेट किए गए मकानों में ऐसा सबसे ज्यादा देखा गया. 60 वर्गमीटर के अपार्टमेंट का किराया करीब 850 यूरो हो गया. यह जर्मनी में औसत हाउसहोल्ड कमाई का करीब एक तिहाई है.

किरायेदारों पर बोझ

राजधानी में अब भी ऐसे कई मकान मालिक हैं, जिन्हें लग रहा है कि उनके किरायेदारों को किराया घटाने वाले नए नियम का पता नहीं चलेगा. ऐसे में वे ऊंचा भाड़ा वसूलते रहेंगे. 23 नवंबर को ग्राहक अधिकारों के लिए काम करने वाले प्लेटफॉर्म कोनी ने अपने सर्वे के नतीजे जारी किए. रिजल्ट में पता चला कि उसके एक तिहाई ग्राहक किराये में कटौती के हकदार हैं, लेकिन ऐसे किरायेदारों को मकान मालिक की तरफ से कोई सूचना नहीं दी गई.

इसका मतलब है कि किरायेदारों को खुद अपना किराया परखना होगा. प्रांतीय सरकार की वेबसाइट पर किराया चेक किया जा सकता है. बर्लिन में इस साल बीएमवी और कई ऐसी कंसल्टेंसी सेवाओं सक्रिय हुईं, जिन्होंने मकान मालिकों पर केस किए. बहुत ज्यादा किराया चुकाने वाले मामलों में पैसा वापस मांगने के क्लेम भी हैं.

कोनी के सीईओ डानिएल हाल्मर कहते हैं, "इसकी पूरी संभावना है कि सारे मकान मालिक इस कानून पर अमल नहीं करेंगे.” बीएमवी के राइनर विल्ड कहते हैं, "हमें डर है कि निजी तौर पर मकान किराये पर देने वाले लोग खास तौर पर अपना किराया कम नहीं करेंगे.” विल्ड किरायेदारों से खुद अपना किराया परखने की अपील कर रहे हैं.

मकान मालिकों का नजरिया

किराये पर लगाम लगाने की शुरुआत फरवरी 2020 में हुई. तब सरकार ने शहर के 15 लाख अपार्टमेंट्स पर अगले पांच साल तक किराया बढ़ाने पर रोक लगा दी. मकान मालिक इसे अपना बड़ा नुकसान बता रहे हैं. एफ प्लस बी कंसल्टेंसी के इंडेक्स के मुताबिक इस नियम से पूरे बर्लिन के मकान मालिकों को कुल 25 लाख यूरो की चपत लग रही है. हर अपार्टमेंट पर औसतन 40 यूरो का नुकसान हो रहा है.

कानून से बचने के लिए मकान मालिक नई जुगत भी निकाल रहे हैं. बर्लिन के लोकल सरकारी प्रसारक आरबीबी ने पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी. रिपोर्ट के मुताबिक सैकड़ों मकान मालिकों ने स्थानीय सरकारी बैंक में किराया बढ़ाने के लिए एप्लीकेशन दी है. मकान मालिकों का कहना है कि वे आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं. जिंदगी गुजारने के लिए करीब करीब पूरी तरह किराये के भरोसे रहने वाले मकान मालिकों की सुरक्षा के लिए सरकारी बैंकों में यह प्रावधान है. लेकिन ऐसे मकान मालिकों की संख्या बहुत कम हैं.

अब इस बात पर कानूनी लड़ाई अगले साल होगी कि क्या बर्लिन की प्रांतीय सरकार को किराये पर इस तरह लगाम लगाने का अधिकार है या नहीं? इस कानूनी कुश्ती के बीच कई मकान मालिक अपने नए अपार्टमेंट्स का विज्ञापन दे रहे हैं. विज्ञापनों में शैडो रेंट का जिक्र किया गया है, यानि अगर संवैधानिक अदालत बाद में उनके पक्ष में फैसला सुनाती है तो वे बकाया किराया वसूलेंगे.

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