बदबू भगाने वाले केंचुए | विज्ञान | DW | 06.10.2012
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विज्ञान

बदबू भगाने वाले केंचुए

कनाडा के क्यूबेक में ला प्रोविडेंस गोल्फ कोर्स में टॉयलेट ढूंढने के लिए जो भी अपने नाक पर भरोसा करेगा उसे इसका रास्ता नहीं मिलेगा. यहां बने टॉयलेट में बदबू नहीं, जबकि यहां पानी और बिजली दोनों इस्तेमाल नहीं की जाती.

यहां के शौचालयों की एक खासियत है. लकड़ी की तह के नीचे जमीन पर केचुओं की फौज है जो जैविक पदार्थ को खाद में बदल रही है. केंचुओं वाला यह टॉयलेट उत्तरी अमेरिका का इकलौता है. इकोस्फियर टेक्नोलॉजी के अंतरराष्ट्रीय सेल्स रिप्रेजेन्टेटिव फ्रेडरिक न्याऊ बताते हैं कि इसे फ्रांस के पास न्यॉन्स में बनाया गया था.

आइसेनिया फेटिडा या लाल रंग के आधा किलो केंचुए फ्रांस से आयात किए गए और यहां उन्हें हेलेने ब्यूमोंट ने बढ़ाया. उन्हें अब टॉयलेट के नीचे मल और घास के बीच रखा गया है. मॉन्ट्रियाल के पूर्वी हिस्से में बने गोल्फ कोर्स पर ब्यूमोंट ने बताया, केंचुआ अपने वजन जितना हर दिन खाते हैं. जितना ज्यादा वह खाते हैं उतना ज्यादा खाद बनता है.

इस वॉशरूम में न तो पानी इस्तेमाल किया जाता है और न ही बिजली. इसकी मरम्मत से पहले इसे कम से कम 10 हजार बार इस्तेमाल किया जा सकता है. टॉयलेट सीट पर एक पेडल बना हुआ है, ये पेडल एक बेल्ट चालू करता है इससे मूत्र और मल अलग अलग हो जाता है और इसी के साथ बदबू का मुख्य कारण भी मिट जाता है. मूत्र रेत से छनता है और मल केंचुओं वाले हिस्से में चला जाता है.

इकोस्फियर के इस वॉशरूम में हवा आने जाने के लिए खास जगह बनाई गई है ताकि किसी तरह की बदबू यहां न रहे. न्याऊ ने फ्रांस, स्पेन, स्विटजरलैंड और इटली के कई ऐसे इलाकों के बारे में बताया जहां बिजली और पानी का इस्तेमाल करना संभव नहीं है. कनाडा में वैसे भी कई ऐसे इलाके हैं जो बिलकुल अलग थलग हैं. इनमें कैंपग्राउंड, स्कीइंग के लॉज, शिकार की जगहें शामिल हैं जहां पानी की कमी है.

कंपोस्ट खाद बनाने वाले कई शौचालय कनाडा में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इनमें से अधिकतर में मल भूसा, नारियल के रेशे या सूखी काई में मिला दिया जाता. इससे द्रव सूख जाता और बदबू खत्म हो जाती. इस प्रोसेस की अच्छी बात यह है कि यह सेप्टिक टैंक से कहीं जल्दी खत्म हो जाती है.

हालांकि इकोस्फियर टॉयलेट कोई सस्ते नहीं. एक शौचालय की कीमत 40 हजार आठ सौ अमेरिकी डॉलर है. यानी करीब 21 लाख रुपये. लेकिन कंपनी के मार्केटिंग विभाग का कहना है कि जैसे जैसे इनकी बिक्री बढ़ेगी कीमत कम होगी.

इनकी देखरेख और रखरखाव पर खर्च नहीं के बराबर है. इसमें सिर्फ केंचुओं की संख्या पर ध्यान देने की जरूरत पड़ती है.

रिपोर्टः आभा मोंढे (एएफपी)

संपादनः एन रंजन

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