बढ़ते शहरीकरण में बेघरों की कहां है जगह? | दुनिया | DW | 14.08.2018
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दुनिया

बढ़ते शहरीकरण में बेघरों की कहां है जगह?

बरसों पहले पति के घर से निकाली गई मंजीत कौर जब लुधियाना से दिल्ली आईं तो उनके साथ दो बेटे, कुछ सामान और पहाड़ जैसी जिंदगी थी. गुरुद्वारे में कुछ दिन बिताए, लेकिन सिर पर छत न होने से परेशानियों ने साथ नहीं छोड़ा.

दिल्ली में करीब 10 हजार ऐसी महिलाएं हैं जो किसी कारण अपने गांव-घर को छोड़कर आती है. उन्हें उम्मीद होती है कि यहां आकर उन्हें ठिकाना मिल जाएगा. लेकिन यह क्या इतना आसान है? शायद नहीं. दिल्ली में इन महिलाओं को जीने के लिए हर दिन लड़ना पड़ता है. शहरीकरण के विस्तार और सस्ते घरों की कमी की वजह से इन्हें ठिकाना मिलने में परेशानी बढ़ती जा रही है. पुल या फ्लाईओवर के नीचे, सड़क डिवाइडर या फुटपाथ ही इनका घर होते हैं.

मंजीत बताती हैं, ''मैं घर का किराया नहीं दे सकती. बारिश हुई तो प्लास्टिक से ढंक लिया और 45 डिग्री की गर्मी व कड़कड़ाती ठंड में खुद को सिकोड़ लिया. बरसों बीत गए, लेकिन यहां सस्ता ठिकाना नहीं मिला. यहां पुलिस आकर बार-बार तंग करती रहती है और स्थानीय लोग चिल्लाते और गालियां देते हैं. कभी-कभी रात को इतना डर लगता है कि मैं सो नहीं पाती हूं.''

हाइसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क के लिए काम करने वाली शिवानी चौधरी कहती हैं कि बेघर महिलाओं की स्थिति इसलिए बद्तर है क्योंकि उन्हें सड़कों पर कई बार बेइज्जत किया जाता है. कई महिलाएं यौन शोषण और हिंसा, तस्करी आदि की शिकार हो जाती हैं.

भारत की स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि 2024 तक चीन की आबादी को पीछे छोड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, दिल्ली में 1.6 करोड़ की आबादी रहती है जिसमें से 46,724 लोग बेघर हैं. भारत में बेघरों की आबादी का 10 फीसदी हिस्सा महिलाओं का है. हालांकि बेघरों के लिए काम करने वाले संगठन इसे तीन गुना बताते हैं. वे 2011 की जनगणना पर भी सवाल उठाते है जिसमें बेघरों की आबादी के 19 लाख से 17 लाख तक घटने की बात कही गई थी.

सिर पर छत नहीं तो क्या हाथ में वोट तो है

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी एंड रिसर्च से जुड़े अश्विन पारुलकर के मुताबिक, ''हमारे शहर तेजी से विकसित हो रहे हैं. सरकार पर दबाव है कि लोगों और बेघरों की जरूरतों को पूरा किया जाए. बेघरों का सही आंकड़ा न मिलने से योजना बनाने में मुश्किलें आती हैं.''

भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2022 तक 2 करोड़ घर शहरी इलाकों में बनाए जाए. विश्लेषकों का कहना है कि इस योजना के लिए बेघरों को गिना ही नहीं गया है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को आदेश दिया है कि 1 लाख की आबादी वाले इलाकों में कम से कम एक शेल्टर बनाया जाए जो 24 घंटे खुला रहे. इसे कुछ राज्यों ने ही लागू किया है. ऐसे में बेघर कहां जाएं?

दिल्ली के शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के अधिकारी बिपिन राय बताते हैं, ''हमारी योजना शेल्टर बनाकर बेघरों को बुनियादी सुविधाएं और कामकाज देना है, लेकिन दिक्कत जमीन की कमी की है. इसलिए हमें अस्थायी शेल्टर बनाकर ही लोगों को रखना पड़ रहा है.'' दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों में बेघरों की बढ़ती आबादी सरकार के लिए चुनौती बन गई है. इससे कानूनी व्यवस्था को खतरा बना रहता है.

वीसी/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

बेघर लोगों का गांव

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