बड़े शहरों में घटी मगर देश में बढ़ी स्लम आबादी | दुनिया | DW | 26.03.2016
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दुनिया

बड़े शहरों में घटी मगर देश में बढ़ी स्लम आबादी

जहां देश के कई राज्यों में ‘स्लम आबादी’ तेजी से बढ़ रही है, वहीँ अपने झुग्गी बस्तियों के लिए बदनाम महाराष्ट्र एवं दिल्ली की ‘स्लम आबादी’ में कमी आयी है. केंद्र सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है.

भारत की कुल स्लम आबादी का अब केवल 18 फीसदी हिस्सा ही महाराष्ट्र में रहता है. 2001 की जनगणना के समय देश की कुल स्लम आबादी का 23 फीसदी महराष्ट्र में बसता था. इस दौरान देश की कुल स्लम आबादी में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और वह 5.23 करोड़ से बढ़कर 6.55 करोड़ तक जा पहुंची है.

सर्वाधिक स्लम आबादी वाले राज्य

शहरी विकास मंत्रालय की इस रिपोर्ट में 2001 और 2011 की स्लम आबादी की तुलनात्मक जानकारी दी गई है. शहरी विकास मंत्री एम. वैंकेया नायडू द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र की तरह दिल्ली और यूपी की स्लम आबादी में भी कमी आई है. 2001 में जहां देश की कुल स्लम आबादी का 4 फीसदी लोगों का बसेरा दिल्ली में था, वहीं 2011 में यह कम होकर 3 फीसदी ही रह गया है. यूपी में भी स्लम आबादी 11 फीसदी से घट कर 10 फीसदी रह गई है. इसी तरह से पंजाब में भी स्लम आबादी 3 प्रतिशत से कम होकर 2 प्रतिशत ही रह गई है.

महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में देश की कुल स्लम आबादी का 70 फीसदी हिस्सा रहता है. स्लम आबादी में आनुपातिक कमी के बावजूद महाराष्ट्र अब भी स्लम आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है. इसके बाद अविभाजित आंध्र प्रदेश का नंबर आता है. देश की कुल स्लम आबादी का 16 प्रतिशत आंध्र प्रदेश की झुग्गियों में बसता है. बढ़ोत्तरी के लिहाज से आंध्र प्रदेश पहले स्थान पर है. 2001 में यहां 12 फीसदी स्लम आबादी थी. तमिलनाडु की स्लम आबादी 8 से बढ़कर 9 फीसदी हो गई है. कर्नाटक में स्लम आबादी 4 से बढ़कर 5 फीसदी हो गई तो मध्य प्रदेश में भी स्लम आबादी 7 से बढ़कर 9 प्रतिशत हो गई है.

स्लम आबादी और चुनौतियां

2011 की जनगणना के आधार पर सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार देश में साढ़े छह करोड़ से ज्यादा लोग स्लम में रहते हैं. यानी इंग्लैंड या इटली की कुल आबादी जितने लोग भारत में स्लम में रहने को मजबूर हैं. एक अनुमान के मुताबिक 2017 तक देश की कुल स्लम आबादी लगभग 10.4 करोड़ होगी. बुनियादी जरूरतों के लिए तरसने वाले इन स्लमों में लोगों के रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, मृत्यु दर, मानसिक तनाव आदि मानकों पर स्थिति चिंताजनक है.

बीमारियों के घर के रूप में बदनाम स्लम की स्थिति सुधारने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कई योजनाओं के साथ ‘स्लम चुनौती' से निपटने का प्रयास कर रही हैं. देश को स्लम मुक्त बनाने की योजना के तहत यूपीए सरकार ने केंद्र प्रायोजित राजीव आवास योजना की शुरूआत की थी. अब इस योजना और जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूएबल मिशन को मिलाकर केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना की शुरुआत की है. इसके तहत सरकार ने दो करोड़ सस्ते मकान बनाने का लक्ष्य रखा है. इसमें 14 लाख स्लम रीडेवेलपमेंट वाले मकान होंगे. इसमें मौजूदा स्लम बस्तियों को औपचारिक प्रक्रिया के दायरे में लाना तथा देश के अन्य शहरों की भांति उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि सरकार 2022 तक सबके लिए मकान देने को प्रतिबद्ध है.

स्लम से मुक्ति के प्रयास

दिल्ली सरकार और केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने दिल्ली को स्लममुक्त करने के लिए मिलकर काम करने की अपनी वचनबद्धता दोहरायी है. दिल्ली के स्लम क्षेत्र को अगले पांच सालों में पक्के मकानों वाले इलाके में तब्दील कर दिया जाएगा. स्लमवासियों को झुग्गी के बदले उसी स्थान पर पक्का मकान बना कर दिया जाएगा. योजना का लाभ 1 जून 2014 तक चिन्हित किए गए स्लमवासियों को मिलेगा. इसमें केंद्र सरकार प्रति झुग्गी एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता देगी. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली को अगले पांच साल में स्लममुक्त कर दिया जाएगा.

दिल्ली की ही तरह देश के अन्य शहरों में भी स्लम से मुक्त होने के प्रयास किए जा रहे हैं. वेंकैया नायडू का कहना है कि सरकार अगले कुछ सालों में भारत को स्लम मुक्त बनाना चाहती है. पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, बिहार, मिजोरम, राजस्थान, झारखंड और उत्तराखंड में शहरी विकास मंत्रालय प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत गरीबों को लाभांवित करने के लिए डेढ़ लाख रुपये प्रति मकान की दर से केंद्रीय सहायता देने जा रहा है.

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