बच्चों की संसदः छोटी उम्र, बड़े इरादे | ताना बाना | DW | 05.01.2010
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ताना बाना

बच्चों की संसदः छोटी उम्र, बड़े इरादे

16 या 17 साल की उम्र में जो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जैसी जिम्मेदारी उठा सकता है, वह जरूर बच्चों की संसद का सदस्य बन सकता है. यह बात है तमिलनाडु के एक गांव की बाल संसद की जो कई अहम काम कर रही है.

बच्चों की संसंद के तीन सदस्य

बच्चों की संसंद के तीन सदस्य

इस संसद का लक्ष्य यह है कि बच्चों और नौजवानों को ज़िम्मेदारी सौंपी जाए और उनमें गांव और शहरों की समस्याओं की समझ पैदा हो. तमिलनाडु के गांव पल्लिनीरोदाई की आबादी सिर्फ़ ढाई सौ है और यहां बच्चों की यह संसद काम कर रही है.

14 साल की महालक्ष्मी इस संसद की सदस्य है. वह 9वीं कक्षा में पढ़ती है और नर्स बनना चाहती है. खिलते चेहरे के साथ वह बताती है कि वह इस संसद में सूचना मंत्री है और यह ज़िम्मेदारी उसके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना स्कूल और घर का काम. वह कहती है, "मैं मीटिंग्स में अख़बार लेकर आती हूं और आस पास की ताज़ा ख़बरों के बारे में सब को बताती हूं. मेरी अब तक की सब से बड़ी कामयाबी यह रही है कि मैंने अपने गावं के कई माता-पिता को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मना लिया है."

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युवाओं में बढ़ती जागृति

नियमित बैठक

पल्लिनीरोदाई के इन नन्हें संसद सदस्यों की हर दूसरे हफ़्ते में मीटिंग होती है, अक्सर शाम के वक़्त, जब बच्चे स्कूल से लौटते हैं. यहां वे अपनी समस्याओं और कठिनाइयों पर बात करते हैं और उनका हल निकालने की कोशिश करते हैं, जैसे कि जगह जगह सड़ते कचरे के ढेर. तमिलनाडु में ऐसे 90 स्कूल हैं, जिनके तक़रीबन 3.000 बच्चे इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं. प्रोजेक्ट चीफ़ पेरूमल सामिनाथन का कहना है , "इस संसद के बच्चों की उम्र 10 से 17 के बीच है. हमारा लक्ष्य है कि वे समझे कि लोकतंत्र का सही मतलब क्या है. उन्हें अच्छा नेता बनना है, जिसकी भारत में कमी है. उन्हें अच्छा नागरिक बनना है."

शुरू में सामाजिक कार्यकर्ता बैठक की कार्रवाई में मदद करते हैं. वे बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में बताते हैं और सिखाते हैं कि कैसे उन्हें हासिल किया जा सकता है. बच्चे तौर-तरीक़ों में माहिर होने लगते हैं और फिर बड़े-बूढ़ों के साथ बैठकर भी मसलों का हल निकालने की कोशिश करते हैं. सामिनाथन का कहना है कि सामुदायिक भावना पैदा करना सबसे जरूरी है. उनके मुताबिक़, "बच्चों के अधिकार हैं, साथ ही जिम्मेदारियां भी. दोनों जुड़े हुए हैं. हम चाहते हैं कि ये बच्चे बदलाव का ज़रिया बनें."

कई हैं मुश्किलें

पल्लिनीरोदाई जैसे छोटे से गावं में भी अनेक समस्याएं अनेक है. मसलन शिक्षा, इलाज, बीमारियों की रोकथाम या बेरोज़गारी. बच्चे इन समस्याओं से भी निपटने की कोशिश करते हैं.

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सामुदायिक भावना पैदा करना ज़रूरी

पेरूमल समिनाथन कहते हैं कि उन्हें क़तई इस बात का डर नहीं है कि बच्चों की बातों पर ग़ौर नहीं किया जाएगा. उनके शब्दों में, "पिछले ढाई सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ. सरकारी अफ़सर भी उनकी बातें सुनते हैं. ऐसी बात है कि बड़े लोग अगर कुछ कहते हैं, तो उसके पीछे दूसरे मकसद भी होते हैं. बच्चों में यह बात नहीं होती. इसलिए मेरा यह मानना है कि राजनीतिक मामलों में बच्चों की भागीदारी की सिर्फ़ सराहना ही नहीं की जाती है, बल्कि पंचायतें भी उनका स्वागत करती हैं."

बेटियों पर गर्व

जया की बेटी अनीता काफ़ी समय तक इस संसद की अध्यक्ष रही है. जया को इस बात का गर्व है कि बिल्कुल नए विचारों के कारण उसकी बेटी की बात सुनी जाती है. सांस्कृतिक और संगीत कार्यक्रमों के ज़रिए वह समस्याओं की ओर ध्यान दिलाती है. जया की और तीन बेटियां है और वे भी अपनी बड़ी बहन की तरह बच्चों की संसद में शामिल होना चाहती हैं. जया कहती हैं, "यहां उसने काफ़ी कुछ सीखा है. मसलन उसने गहने बनाने के एक कोर्स में भाग लिया. उसका आत्मविश्वास अब बहुत बढ़ गया है. वह अब साफ़ लफ़्ज़ों में अपनी बात रख सकती है.

यह भी महत्वपूर्ण है कि लडकियां बच्चों की इस संसद में लड़कों के मुक़ाबले अधिक सक्रिय हैं. शायद उन्हें समाज की भलाई की अधिक फ़िक्र है. जर्मनी के अलावा फिनलैंड और ज़िम्बाब्वे में भी ऐसी बच्चों की संसद काम कर रही हैं.

प्रिया एसेलबोर्न (संपादनः ए कुमार)

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