बच्चों की मदद के लिए बच्चों का साथ | मनोरंजन | DW | 06.01.2013
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मनोरंजन

बच्चों की मदद के लिए बच्चों का साथ

क्रिसमस और नए साल की धूम के बाद जनवरी में भी एक पर्व आता है जिसके बारे में बहुत ज्यादा लोग नहीं जानते. जर्मनी में इस पर्व पर बच्चे घर घर जा कर जरूरतमंद बच्चों के लिए पैसे इकट्ठा करते हैं.

6 जनवरी को मनाए जाने वाले इस पर्व को थ्री किंग्स डे या प्रभुप्रकाश के नाम से जाना जाता है. इस दिन ईसा मसीह के जन्म लेने के बाद तीन संत उन्हें देखने आए और उनके लिए तीन उपहार साथ लाए. पश्चिमी देशों में बच्चे इस दिन इन तीन संतों के लिबास में आते हैं. खास तौर से जर्मनी में 1959 से गरीब और जरूरतमंदों के लिए चंदा इकट्ठा करने का चलन रहा है. ये बच्चे घर घर जाते हैं, यीशु की प्रशंसा में गाने गाते हैं और मदद की राशि लेने के बाद दरवाजे पर "20+C+M+B+13" लिखते हैं. इसका मतलब होता है "यीशु आपके घर की रक्षा करें". इन्हें स्टार सिंगर के नाम से जाता है.

नन्हे स्टार सिंगर

15 साल की सारा पिछले सात साल से इसमें हिस्सा लेती आई हैं, "लोगों के यहां जाने में बहुत मजा आता है और यह जान कर भी अच्छा लगता है कि वे हमें देख कर कितना खुश होते हैं." 6 साल का जेकब पहली बार इसमें हिस्सा ले रहा है, "यह सच है कि हम जो पैसा जमा करते हैं उस से हम बच्चों की जिंदगी बचा सकते हैं". ओस्नाब्रुक के सारा और जेकब जर्मनी के पांच लाख स्टार सिंगर में से हैं. लोग उन्हें पैसे के साथ साथ मिठाइयां भी देते हैं. 11 साल की मिरियम कहती हैं, "लोग हमें इतनी मिठाइयां देते हैं कि कई बार हम ओस्नाब्रुक के अनाथ आश्रम में उन्हें दे आते हैं."

माना जाता है कि इन तीन में से एक संत अफ्रीका से आया था. इसलिए तीन में से एक बच्चे के चेहरे पर काला रंग लगाया जाता है. हालांकि किसी अश्वेत व्यक्ति को दर्शाने के लिए चेहरे पर इस तरह से रंग लगाने को अब देश में नस्लवादी माना जाता है और नाटकों और फिल्मों में भी ऐसा करने की अनुमति नहीं हैं. लेकिन बच्चों के साथ सालों से चलती आई इस परंपरा को नस्लभेद से जोड़ कर नहीं देखा जाता.

नेक काम

हर साल जर्मन कैथोलिक यूथ एसोसिएशन और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था किंडरमिशन मिल कर बच्चों को सूचित करते हैं कि उनके जमा किए गए पैसे के साथ क्या किया गया. ओस्नाब्रुक के सेंट एलिजाबेथ कॉन्ग्रेगेशन की मारियोन गेर्डेस बताती हैं, "हम हमेशा जनवरी में बैठक करते हैं. इसमें हम बच्चों को फिल्म के माध्यम से किसी एक देश का उदाहरण दे कर बताते हैं कि मदद की राशि से वहां क्या फायदा पहुंचा है." मारियोन बताती हैं कि बच्चे इस फिल्म में बहुत रूचि दिखाते हैं, "मैं यह देख कर हैरान रह जाती हूं कि फिल्म के दौरान वे कितने खामोश होते हैं और उन देशों में बच्चों की हालत देख कर उन पर कितना असर पड़ता है."

6 साल के जेकब को इस बार तंजानिया के बारे में जानकारी मिली है. वह बताता है, "वहां लोग किस्वाहिली बोलते हैं और हेलो की जगह जाम्बो कहते हैं." जेकब को फिल्म से यह भी सीखने को मिला है कि तंजानिया में अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी है, "इसीलिए स्टार सिंगर द्वारा जमा की गयी राशि से तंजानिया में एक अस्पताल को एक खास एम्बुलेंस दी जाएगी."

चांसलर के दर पर

पांच दशक पहले शुरू हुई यह मुहिम आज बच्चों द्वारा बच्चों की मदद करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी पहल बन गयी है. अब तक करोड़ों यूरो जमा किए जा चुके हैं और अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और पूर्वी यूरोप में लाखों बच्चों तक इसका फायदा पहुंचा है.

वैसे संत बने ये बच्चे एक खास दरवाजा भी खटखटाते हैं: चांसलर अंगेला मैर्केल का. हर साल ये बच्चे राजधानी बर्लिन पहुंचते हैं और चांसलर के सामने गाने गाते हैं. सारा भी बर्लिन जाने की तैयारी कर रही हैं. वह बताती हैं, "जरूर बहुत मजा आएगा. हम दो दिन वहां रहेंगे. गुरूवार को हमारा रिहर्सल है और शुक्रवार को हम मंच पर होंगे." मैर्केल ने उन्हें दूसरों के हित के लिए काम करने वाले "प्रकाशमयी उदाहरण" का नाम दिया है.

प्रभुप्रकाश से दो तीन दिन पहले ही बच्चे घरों तक जाने लगते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसा जमा किया जा सके. चर्च की कोशिश रहती है कि उन्हें पूरा साल ही किसी ना किसी रूप में इस पर्व से और इसकी तैयारियों से जोड़ कर रखा जा सके.

रिपोर्ट: सुजाने हाफेरकांप/ आईबी

संपादन: महेश झा

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