बचाना जरूरी है समुद्र तट रेखा पर फैली इस दीवार को | भारत | DW | 21.06.2021
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भारत

बचाना जरूरी है समुद्र तट रेखा पर फैली इस दीवार को

जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र अब तटीय इलाकों में प्रवेश कर रहा है जिससे जैव विविधता और बड़ी आबादी के रोजगार को खतरा है. लेकिन इस संकट से बचाने वाले प्राकृतिक मैंग्रोव की दीवार आज खतरे में है.

मैंग्रोव समुद्र तट रेखा पर एक प्रतिरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं.

मैंग्रोव समुद्र तट रेखा पर एक प्रतिरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं.

समुद्र तट पर उगने वाले मैंग्रोव न केवल हमारे तटों की रक्षा करते हैं बल्कि वह कई वनस्पतियों और जैव विविधता का घर हैं. भारत की विशाल तट रेखा और इस पर बसी आबादी को देखते हुए इनका महत्व और भी बढ़ जाता है लेकिन बदलती जलवायु में जैसे मैंग्रोव का महत्व बढ़ रहा है इनके संरक्षण के लिए उस हिसाब से उपाय नहीं किए जा रहे.

क्या होते हैं मैंग्रोव

मैंग्रोव समुद्र या विशाल वॉटर बॉडीज के पास दलदली इलाके में उगने वाली वनस्पतियों को कहते हैं जो नन्हीं घास से लेकर एक विशाल वृक्ष के आकार के हो सकते हैं. इनकी करीब 80 प्रजातियां हैं जो ऊष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) इलाकों में उगती हैं जहां मिट्टी में कम ऑक्सीजन हो. दलदली इलाकों में इनकी जड़ें मिट्टी से बाहर निकली देखी जा सकती हैं जिससे यह प्रतिदिन ज्वार-भाटा की स्थिति में खुद ढाल सकें.

क्यों जरूरी हैं मैंग्रोव फॉरेस्ट 

मैंग्रोव का पारिस्थितिकी महत्व समुद्री घास और कोरल रीफ की तरह ही है और इनका आपस में एक करीबी रिश्ता है. जहां मैंग्रोव और समुद्री घास गाद और प्रदूषकों को समुद्र के भीतर जाने से रोकते हैं और कोरल रीफ को जिन्दा रखते हैं वहीं दूसरी और कोरल रीफ विनाशकारी समुद्री लहरों की ताकत को कम करके मैंग्रोव और समुद्री घास को बचाती है. जानकार कहते हैं मैंग्रोव के जंगल इस सहजीविता का आधार तैयार करते हैं.

Indien | Mangrovenwälder in Gefahr

मैंग्रोव के जंगल जैव विविधता का घर हैं और यहां जंतुओं और वनस्पतियों की सैकड़ों प्रजातियां पनपती हैं

मैंग्रोव न केवल तटीय भूमि में समुद्र के प्रवेश को रोकते हैं बल्कि वह मछलियों, झींगा, केकड़ों और कई जन्तुओं और वनस्पति प्रजातियों को निवास और प्रजनन क्षेत्र प्रदान करते हैं. इस तरह से जैव विविधता के संरक्षण में उनका अहम रोल है. मैंग्रोव के जंगल कई पक्षियों और जानवरों का घर भी हैं और खाद्य सुरक्षा चक्र में उनकी विशेष भूमिका है. वह चक्रवातों और समुद्र जल स्तर में बढ़ोतरी से तटीय क्षेत्र में रहने वाली आबादी की रक्षा ही नहीं करते बल्कि खारे पानी को रोककर यहां जमीन को कृषि योग्य बनाए रखते हैं. ग्लोबल इन्वायरमेंटल चेंज जर्नल में 2014 में प्रकाशित जानकारी के मुताबिक भारत के तटों पर फैले मैंग्रोव के जंगल जितनी इकोलॉजिकल सेवाएं देते हैं उनकी कीमत 14 करोड़ रु प्रति हेक्टेयर से अधिक है.

भारत में मैंग्रोव का फैलाव 

भारत में मैंग्रोव का फैलाव कई राज्यों की समुद्र तट रेखा पर है लेकिन यह सब जगह नहीं हैं. पूर्वी तट पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा और पश्चिमी तट पर गुजरात में मैंग्रोव के घने जंगल हैं. यह दिलचस्प है कि भारत के दो राज्यों, पश्चिम बंगाल में जहां तट रेखा सबसे छोटी है और गुजरात में जहां तट रेखा की लंबाई सबसे अधिक है, मैंग्रोव का सबसे घना फैलाव है. दूसरे राज्यों में ओडिशा, तमिलनाडु और केरल के अलावा अंडमान में मैंग्रोव बहुतायत में हैं.

यह महत्वपूर्ण है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसा सुंदरवन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव फॉरेस्ट है और यूनेस्को की विश्व धरोहर (वर्ल्ड हैरिटेज) में शामिल है. मैंग्रोव को यहां सुंदरी भी कहा जाता है जिस वजह से इस जगह का नाम सुंदरवन पड़ा. सुंदरवन कई वनस्पतियों और वन्य जीवों की प्रजातियों के अलावा बंगाल टाइगर का भी घर है और इसलिए यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है.

क्लाइमेट चेंज में मैंग्रोव का महत्व

पूर्वी तट के मुकाबले भारत का पश्चिमी तट चक्रवाती तूफानों के मामले में अपेक्षाकृत शांत रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों से स्थिति लगातार बदल रही है. पिछले 4 साल में लगातार हर मॉनसून से पहले अरब सागर में चक्रवाती तूफान उठा और तट तक पहुंचा. भारत के पश्चिमी तट पर कम से कम 1980 के बाद से यह पहली बार हुआ है. दूसरी ओर पूर्वी तट पर हालांकि अधिक चक्रवात आते हैं लेकिन वहां भी इनकी संख्या और मारक क्षमता तेज हो रही है.

Indien | Salziges Seewasser zerstört Felder

मैंग्रोव के नष्ट होने से समुद्र का पानी तटीय इलाकों में कृषि भूमि को बर्बाद कर रहा है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग से समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण यह बदलाव आ रहे हैं और ऐसे में मैंग्रोव कई मोर्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने के लिए जरूरी हैं. खासतौर से तब जब भारत की समुद्र तट रेखा 7,500 किलोमीटर से अधिक लम्बी है और करीब 20-25 करोड़ लोग अपनी जीविका के लिए सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तटों पर निर्भर हैं.

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर विजटिंग फेलो अनुराग दंडा, जो प्रकृति संरक्षण और सस्टेनबिलिटी पर दो दशकों से काम कर रहे हैं, के मुताबिक, "हमने देखा है कि जब चक्रवाती तूफानों की वजह से खारा पानी खेतों में भर जाता है तो कई सालों के लिए जमीन बर्बाद हो जाती है और आप वहां कुछ नहीं उगा पाते. सुंदरवन में 2009 में आइला तूफान के बाद इसका विकराल प्रभाव दिखा और वहां लगातार तूफान आ ही रहे हैं. ऐसे में मैंग्रोव एक प्रतिरक्षा दीवार की तरह काम करते हैं. ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि वह इस समस्या का पूरा समाधान हैं लेकिन इस प्रभाव को काफी हद तक कम जरूर कर सकते हैं."

दंडा बताते हैं कि मैंग्रोव मछलीपालन की नर्सरी है. "हर मछली, झींगा या केकड़ा अपनी जीवन चक्र का कोई न कोई हिस्सा मैंग्रोव वाले क्षेत्र में बिताता है. अगर ये मैंग्रोव न रहे तो इन प्राणियों का अस्तित्व और मछुआरों का रोजगार नहीं रहेगा."

मैंग्रोव संरक्षण में चुनौतियां 

भारत में मैंग्रोव की अधिकता वाले सभी इलाकों में या तो आबादी का दबाव है या औद्योगिक विकास का. मिसाल के तौर पर भारत के पूर्व में बंगाल की सीमा पर घनी आबादी है और पश्चिमी तट पर आबादी के अलावा उद्योग लगे हैं या प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के शोधकर्ताओं के मुताबिक पिछली एक सदी में भारत में मैंग्रोव फॉरेस्ट 40% घट गए हैं लेकिन इन पर छाया संकट कम नहीं हो रहा है.

दंडा बताते हैं, "जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र मैंग्रोव को पीछे धकेल रहा है लेकिन जिन इलाकों में आबादी अधिक है वह मैंग्रोव को पीछे नहीं आने देता. इन जगहों पर इसे कोस्टल स्क्वीज कहा जाता है और यहां इन्हें सबसे अधिक खतरा है. इसी तरह जिन जगहों में उद्योगों को लगाने के लिए अनुबंध किए जा चुके हैं वहां भी इन्हें नष्ट होने से बचाना मुश्किल है. हमें सोचना होगा कि इस चुनौतीपूर्ण हालात में क्या किया जा सकता है."

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