फिल्म बनाना नहीं बेचना मुश्किल है | मनोरंजन | DW | 15.02.2014
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मनोरंजन

फिल्म बनाना नहीं बेचना मुश्किल है

बर्लिन फिल्म महोत्सव सिर्फ बड़ी फिल्मों और बड़े सितारों का मंच नहीं है. यहां से उड़ान भरते हैं कई नए युवा कलाकार. भारत से अपनी शॉर्ट फिल्म लेकर आए समर्थ दीक्षित भी उन्हीं में से एक हैं.

भारत में शॉर्ट फिल्म बनाना आमतौर पर आर्थिक रूप से फायदे का सौदा साबित नहीं होता. न तो इन फिल्मों की बाजार में जगह है न ही इनके लिए बढ़िया मंच. डॉक्यूमेंटरी और शॉर्ट फिल्म बनाने वाले कलाकारों को फिल्म बेचने के लिए विदेशी डिस्ट्रिब्यूटरों का सहारा लेना पड़ता है. बर्लिन फिल्म महोत्सव ऐसे बहुत से कलाकारों के लिए अहम मंच है. समर्थ दीक्षित की फिल्म प्रभात फेरी बर्लिन में दिखाई गई. पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से पिछले साल पढ़ाई पूरी करके निकले समर्थ के साथ इस फिल्म का निर्देशन जेसिका सदाना ने किया है जो अभी भी इंस्टीट्यूट में पढ़ाई कर रही हैं. डॉयचे वेले के साथ समर्थ दीक्षित की बातचीत के कुछ अंश.
किस बारे में है आपकी फिल्म प्रभात फेरी?

यह कहानी फिल्म इंस्टीट्यूट कैंपस के बारे में है. फिल्म प्रभात फिल्म कंपनी के बारे में है जो 1929 में शुरू हुई थी. यह फिल्म लोगों की यादों के जरिए इतिहास के बारे में है. असल में जब प्रभात फिल्म कंपनी करीब दो दशक बाद बंद हुई तो कैंपस को बागबानी के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा. स्टूडियो वहां बाकी रह गए थे और वो मुंबई के फिल्मकारों को शूटिंग के लिए दिए जाते थे. गुरुदत्त और देवानंद की कई पिल्में वहां शूट हुईं. बाद में 1959 में जब सरकार ने उसे खरीद लिया और उसे फिल्म इंस्टीट्यूट में तबदील किया तो कई पुराने लोग, कई पुरानी मशीनें और बहुत सारी यादें कैपस में आईं. उन्हीं के बारे में है यह फिल्म. उन्हें आत्माओं के रूप में दिखाते हुए फिल्म की कहानी सुनाई गई है.

हर निर्देशक चाहता है कि उसकी फिल्म ज्यादा से ज्यादा लोग देखें. ऐसे में डॉक्यूमेंट्री बनाने का फैसला क्यों लिया, कमर्शियल फिल्म क्यों नहीं?

डॉक्यूमेंट्री बनाना ही मेरा मकसद था. जब यह आइडिया आया तब इस बारे में नहीं सोचा था कि इसकी बाजार में मांग है या नहीं, बिकेगी या नहीं. कलाकार के लिए आइडिया खास होता है. उसे कहना सुनाना ज्यादा जरूरी था. किस रूप में यह सोचा नहीं था. जिन लोगों और मशीनों और औजारों की हमने बात की है कुछ साल बाद वे सब रह भी नहीं जाएंगे और फिर उनके कोई दस्तावेज नहीं होंगे. हम उसे कैमरे में कैद करना चाहते थे. इस फिल्म पर दिल्ली की सरकारी संस्था पीएसबीटी ने पैसे लगाए हैं.

फिल्म महोत्सवों से इस तरह की फिल्मों को किस तरह का फायदा होता है?

फिल्म महोत्सवों के बारे में, खासकर अगर मैं बर्लिन के बारे में बात करूं तो एक फिल्ममेकर के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है कि उसे इस स्तर के दर्शक मिल रहे हैं. दुख की बात यह है कि भारत की स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं की फिल्में भारत से ज्यादा यूरोप में देखी जाती हैं. भारत में फिल्म को दिखाने के लिए बहुत कम मंच हैं. यहां लोग आपकी फिल्म को बहुत गंभीरता से देखते हैं. यह बहुत प्रोत्साहित करता है. अभी तक दो स्क्रीनिंग हुई हैं और लोग सवाल करने में दिलचस्पी लेते हैं जो कि हमारे लिए बहुत अच्छा है. यह स्वतंत्र काम के लिए बहुत बड़ा मंच है.

Berlinale Stratos Pressekonferenz

बर्लिन फिल्म महोत्सव में प्रभात फेरी भी दिखाई गई


आपको कितना फायदा हुआ?

बर्लिन में कई लोगों ने हमें फिल्म के राइट्स खरीदने के लिए संपर्क किया.
भारत में नॉन कमर्शियल फिल्म बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
पिछले पांच सालों में फिल्म बनाना बहुत आसान हो गया है. फिल्म को बनाना इतना बड़ा मुद्दा नहीं है. सबसे बड़ी मुश्किल होती है इस तरह की फिल्मों को बेचना जो मुख्यधारा से अलग हैं या जिनमें बड़े सितारे काम नहीं कर रहे. हाल में आई उड़ान जैसी फिल्में देखकर लगता है कि समय बदल तो रहा है लेकिन अभी भी उस तरह का समर्थन नहीं है.

विदेश में शॉर्ट फिल्मों को दिखाने वाले भी कई चैनल हैं. उनकी भी मांग है, जो कि भारत में नहीं है. कभी इस बात से खीझ होती है?

अभी तक तो हम इंस्टीट्यूट में रहे हैं तो नहीं पता जब आप अपनी फिल्म के लिए धक्के खाते हैं तो कैसा होता है. क्योंकि अभी तक हम यह सब कुछ छात्रों की तरह करते आए हैं तो इस बारे में नहीं सोचा कि इसे बाजार में कैसे देखा जाएगा या यह बिकेगी या नहीं. हो सकता है पांच साल बाद हकीकत पता चले और झुंझलाहट हो. लेकिन हम वही फिल्में बनाना चाहते हैं जिन्हें कहना जरूरी होता है.

क्या कमर्शियल फिल्में बनाने का इरादा है भविष्य में?

आगे क्या होगा पता नहीं. हो सकता है कि कमर्शियल फिल्में भी बनाऊं लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि उस समय क्या जरूरी है. मुंबई भी कोई छोटा शहर नहीं है. वहां रह कर काम करने के लिए आपके पास बहुत पैसे होने चाहिए.
इंटरव्यू: समरा फातिमा

संपादन: महेश झा

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