फंदे में फंसी ईरानी अर्थव्यवस्था | दुनिया | DW | 07.06.2013
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दुनिया

फंदे में फंसी ईरानी अर्थव्यवस्था

बेरोजगारी दर ऊंची है, महंगाई उफान पर है और बिक्री कम हो रही है, ईरान की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है. पश्चिमी देशों की पाबंदियों का उसमें आंशिक हिस्सा है, ज्यादातर समस्याएं खुद की पैदा की गई हैं.

गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई ने पिछले सालों में बहुत से ईरानियों की जिंदगियां बदल दी हैं. महंगाई नई ऊंचाइयां छू रही है और ईरान आर्थिक विनाश की तरफ बढ़ता जा रहा है. हर रोज खाने पीने की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं.

"मेरे परिवार का जीने का स्तर लगातार गिर रहा है," यह कहना है मुहम्मद का जो तेहरान में आईटी का काम करते हैं. मुहम्मद ऐशोआराम की बात नहीं कर रहे, बल्कि एक बोतल दूध जैसी साधारण चीजों ने भी उनकी नाक में दम कर रखा है. कई परिवारों ने उम्मीद खो दी है. अब वह केवल जरूरी चीजें खरीदते हैं. मुहम्मद पहले दोस्तों से मिलने कैफे जाते थे, अब वह पैसे बचाने में लग गए हैं.

इस साल मार्च में ईरानी सरकार ने औपचारिक आंकड़े जारी किए और कहा कि मार्च 2012 से लेकर मार्च 2013 तक दाम 30 फीसदी बढ़े हैं. ऐसा पहले नहीं हुआ. केवल खाने पीने के सामान में 60 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. आर्थिक विश्लेषक मानते हैं कि असल आंकड़े इससे भी ज्यादा हैं.

2012 में अमेरिका और यूरोपीय संघ के ईरानी तेल पर प्रतिबंधों के बाद से ईरानी मुद्रा रियाल का मूल्य काफी गिरा है. एक अमेरिकी डॉलर के लिए ईरान में 35,000 रियाल देने पड़ते हैं. नौ महीने पहले यह आंकड़ा 20,000 रियाल था. शहर में दुकानदार भी शिकायत करते हैं कि उनके ग्राहक कम खरीदने लगे हैं.

उनके व्यापार पर मुद्रा संकट का बेहद बुरा असर पड़ा है. तेहरान में मिठाई की दुकान चलाने वाले एक व्यक्ति का कहना है कि अब ईरानी जनता पहले से कम मेवा खरीद रही है और इस साल मुनाफे के बारे में सोचना भी मुश्किल है.

दवाओं की कमी

ईरान अमेरिका और यूरोपीय संघ से पाबंदियों के बावजूद अब भी दवाएं आयात कर सकता है लेकिन दवा कंपनियां ईरान से कम व्यापार करती हैं. इसकी वजह है ईरान का केंद्रीय बैंक जिसपर पूरे विश्व में प्रतिबंध लगा है. ईरान के साथ पैसों की लेनदेन में इसकी वजह से दिक्कतें आ रही हैं. कई महीनों से ईरान में कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों के लिए दवा मिलना मुश्किल हो रहा है.

इस स्थिति में चीन, पाकिस्तान और भारत से आने वाली दवाएं ईरान के काले बाजार में फैल गई हैं. लेकिन कई लोगों के लिए यह बहुत महंगी हैं. तेहरान के एक अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स का कहना है कि कुछ ऐसे मामले हुए जिसमें एक मरीज को मिर्गी के दौरे पड़े क्योंकि उसने इस तरह की दवाइयां लीं. ऐसे भी मामले थे जिसमें लोगों की मौत हो गई क्योंकि उनको नकली पेनिसिलिन के इंजेकशन दिए गए.

2012 के अंत में ईरानी स्वास्थ्य मंत्री मार्जियेह वाहिद दस्तजर्दी को उनके पद से हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने इस बात की आलोचना की कि सरकार दवाओं के आयात के लिए कम पैसे दे रही है.

बकाया वेतन और बढ़ते दाम

आर्थिक संकट की वजह से कई फैक्ट्रियां अपने मजदूरों को वेतन नहीं दे पा रहीं जिस वजह से हड़ताल हो रहे हैं. ईरान में कार उद्योग को इसके नतीजे झेलने पड़ रहे हैं. मजदूर यूनियन संघ के प्रमुख जफर आजीमजादेह कहते हैं कि फैक्ट्री में काम करने वाला मजदूर बहुत कम पैसे कमाता है और उसका वेतन केवल घर के किराये में खत्म हो जाता है. सरकार कई सालों से ऐसी स्थिति में अतिरिक्त पैसा देने का वादा कर रही है लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है.

जीवनयापन के लिए सरकार द्वारा दिया जाने वाला भत्ता बहुत कम है. आजीमजादेह बताते हैं कि चार लोगों के परिवार को 18 लाख रियाल दिया जाता है, जो बहुत थोड़ी रकम है. वे कहते हैं कि इससे परिवार नहीं चल सकता.

पाबंदियों से पहले भी संकट

ईरान पर अतंरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से हालत और खराब हुई है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि प्रतिबंधों के पहले भी देश आर्थिक संकट में था. पैरिस में ईरानी अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर शाहीन फातेमी कहते हैं, "महंगाई अहमदीनेजाद सरकार की आर्थिक नीति का नतीजा है." उनका कहना है कि वर्तमान सरकार और आने वाले दिनों में भी सरकार इस स्थिति में नहीं होगी कि वह देश को इस संकट से बाहर निकाल सके.

2011 में सरकार ने ऊर्जा और खाने पीने की चीजों के लिए सबसिडी हटा दिए थे. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने पहले तो इस कदम को सराहा लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा बेहद जल्दबाजी में किया गया. साथ ही सरकार ने अरबों रियाल लोगों में बांटे ताकि गरीब ऐसी स्थिति में परेशान न हो. लेकिन फिर ऊर्जा और बाकी सामान के बढ़ते दामों की वजह से लोगों के यह पैसे भी खर्च हो गए. केंद्रीय बैंक ने कृत्रिम तरीकों से रियाल के मूल्य को कम रखा था लेकिन बढ़ते प्रतिबंधों से यह भी नहीं हो पाया.

लेकिन ईरान में अमीर और राजनीतिक नेता अब भी आराम से जी रहे हैं. परेशानी जनसंख्या के गरीब तबकों को हो रही है.

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