प्लासमोडियम को भुलावे में डाल कर मलेरिया का इलाज | मंथन | DW | 11.06.2015
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मंथन

प्लासमोडियम को भुलावे में डाल कर मलेरिया का इलाज

स्विट्जरलैंड के बाजेल शहर के ट्रॉपिकल इंस्टीट्यूट में मलेरिया पर शोध का एक प्रोजेक्ट चल रहा है. यहां रिसर्चर मलेरिया पैदा करने वाले और उसे फैलाने वाले कीटाणुओं पर शोध करते हैं.

लैब में गर्म रोशनी है और हवा की नमी जो ट्रॉपिकल इलाकों की याद दिलाती है. हंस पेटर बेक लंबे समय से दो पंखों वाले मच्छरों पर शोध कर रहे हैं. यह प्रजाति मलेरिया का एक जानलेवा कीटाणु फैलाती है, प्लासमोडियम फाल्सीपेरुम. यह परजीवी जो माइक्रोस्कोप में एक नीली ग्रंथि जैसा दिखता है, इंसान की लाल रक्त कोशिकाओं यानि एरिथ्रोसाइट को संक्रमित करता है. बाजेल के ट्रॉपिकल इंस्टीट्यूट के हंस पेटर बेक बताते हैं, "इस परजीवी ने ऐसा मैकेनिज्म विकसित कर लिया है कि वह केपिलरी वॉल पर जमकर चिपक सकता है. यदि हम इसे चिपकने और एरिथ्रोसाइट में घुसने से रोक पाएं तो हम कीटाणुओं को फैलने से रोक पाएंगे."

बाजेल यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री इंस्टीट्यूट में रिसर्चर चार साल से परजीवियों को बहकाने की कोशिश में लगे हैं. इसके लिए वे पॉलिमरों को मिला रहे हैं. इसकी सामग्री आसान है लेकिन सही नतीजा पाना मुश्किल है. पिस्टन में उनसे अपने आप कृत्रिम बुलबुले बनने चाहिए. एकदम छोटे, आंखों को नहीं दिखने वाले. आइडिया यह है कि कृत्रिम बुलबुले इंसानी रक्त कोशिकाओं की ऊपरी सतह जैसे दिखें.

ट्रॉपिकल इंस्टीट्यूट के एड्रियान नायर बताते हैं, "यह दरअसल कीटाणुओं को भुलावे में डाल देगा. जब वह सेल से बाहर निकलेगा तो उसे सामान्य रक्त कोशिकाओं के अलावा नकली रक्त कोशिकाएं भी दिखेंगी. और चूंकि उसका दिमाग नहीं है, इसीलिए वह बस उससे जुड़ जाएगा. और अगर यह कुशल हो तो उसे ब्लॉक किया जा सकेगा. यह आइडिया था जिस पर हम कामयाब हुए हैं."

मलेरिया के हरे कीटाणु असली रक्त कोशिकाओं की जगह कृत्रिम बुलबुलों के करीब जा रहे हैं. वहां उनका प्रसार नहीं हो सकता और वे मर जाएंगे. एड्रियान नायर का कहना है, "अगर बहुत बड़े नैनोस्ट्रक्चर को ऑर्गेनिज्म में डाला जाए तो वे रक्त वाहिका में सर्कुलेट नहीं करेंगे. लेकिन मलेरिया के एप्लिकेशन में हमें उसकी जरूरत है."

कृत्रिम बुलबुलों का निर्माण संभव है. लेकिन नैनो तकनीक के एक्सपर्ट वोल्फगांग मायर को पता है कि अभी बहुत से खुले सवालों का जवाब खोजना है, "यदि उसे एजेंट के तौर पर मरीज को देना है तो वह कितना स्थिर है, उसे इस्तेमाल से पहले कब तक रखा जा सकता है, उसे इंजेक्शन या दवा के रूप में दिए जाने पर वह नष्ट होने में कितना वक्त लेता है." जब लैब टेस्ट पूरा हो जाएगा उसके बाद इसका चूहों और इंसानों पर टेस्ट किया जाएगा. जिज्ञासा और धैर्य का नतीजा मलेरिया के खिलाफ एक नई दवा के रूप में सामने आ सकता है.

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