प्रेमचंद के साथ न्याय नहीं हुआ फिल्मों में | मनोरंजन | DW | 02.07.2015
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मनोरंजन

प्रेमचंद के साथ न्याय नहीं हुआ फिल्मों में

गांव देहात से लेकर आम आदमी की जिन्दगी के कुशल चितेरे महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों पर कई फिल्में बनीं लेकिन हिन्दी चित्रपट उनकी प्रतिभा का सही दीदार दर्शकों को नहीं करा पाया है.

प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों पर कई फिल्में बनी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. उनकी कहानियों और उपन्यास को सुन मुग्ध हो जाना स्वाभाविक है लेकिन फिल्मों ने कभी उसके साथ न्याय नहीं किया. दरअसल प्रेमचंद को सिनेमा कभी रास ही नहीं आया. वह खुद अपनी किस्मत आजमाने 1934 में तब के बम्बई गए. अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी लेखक की नौकरी भी की लेकिन एक साल का अनुबंध पूरा करने के पहले ही वाराणसी वापस आ गए. बम्बई और उससे भी ज्यादा वहां की फिल्मी दुनिया का हवा पानी उन्हें रास नहीं आया.

उन्होंने मिल मजदूर फिल्म की पटकथा भी लिखी. मोहन भगनानी के निर्देशन में बनी यह फिल्म नाकाम रही. प्रेमचंद की कहानियों पर 1934 में नवजीवन बनी. के सुब्रमण्यम ने 1938 में सेवासदन उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनाई जिसमें सुब्बा लक्ष्मी ने मुख्य भूमिका अदा की थी. ए आर कारदार ने 1941 में त्रिया चरित्र पर स्वामी बनाई जो नहीं चली. सन 1946 में रंगभूमि पर इसी नाम से फिल्म बनी. मृणाल सेन ने 1977 में कफन कहानी पर बांग्ला में 'ओका ऊरी कथा' बनाई. साल 1963 में गोदान तथा 1966 में गबन का निर्माण हुआ. दूरदर्शन ने उनके उपन्यास निर्मला पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण किया जो सालों चलता रहा.

प्रेमचंद के उपन्यास या कहानी पर बनी किसी फिल्म ने शतरंज के खिलाड़ी के रूप में आखिरकार सफलता का मुंह देखा. निर्देशक सत्यजित रे 1977 में इसका निर्माण किया. शतरंज के खिलाड़ी को तीन फिल्म फेयर के अलावा 1978 में बर्लिन महोत्सव में गोल्डन बीयर अवार्ड मिला. उपन्यास में कहानी 1856 के अवध नवाब वाजिद अली शाह के दो अमीरों के ईद गिर्द घूमती है. सत्यजित रे ने 1981 में सदगति का भी निर्माण किया. यह सवाल बार बार उठाया जाता है कि जिस प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों ने पाठकों को झकझोरा उस पर बनी फिल्में दर्शकों को पसंद क्यों नहीं आयीं.

हिन्दी कथा साहित्य को तिलस्मी कहानियों के झुरमुट से निकाल कर जीवन के यथार्थ की ओर ले जाने वाले प्रेमचंद देश ही नहीं दुनिया में मशहूर हुए. उन्होंने साहित्य में यथार्थवादी परम्परा की नींव रखी. सिनेमा और साहित्य अलग अलग विधा हैं लेकिन दोनों का पारस्परिक समबन्ध काफी गहरा है. जब कहानी पर आधारित फिल्मों की शुरूआत हुई तो इसका आधार साहित्य ही बना. भारतेंदु हरिश्चन्द्र के नाटक हरिश्चन्द्र पर दादा साहब फाल्के ने इसी नाम से फिल्म बना दी लेकिन उसका हश्र कुछ ऐसा हुआ कि निर्माता हिन्दी की साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने से गुरेज करने लगे. कहानी या उपन्यास में बाजार की भूमिका नहीं होती लेकिन सिनेमा में बाजार का तत्व हावी होता है.

एमजे/एसएफ (वार्ता)

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