प्रदूषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे नन्हे बच्चे | दुनिया | DW | 03.10.2015
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दुनिया

प्रदूषण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे नन्हे बच्चे

अपनी तरह के पहले मामले में 6 से 14 महीने की उम्र वाले तीन बच्चों के अभिभावकों ने उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली है कि बच्चों के प्रदूषण मुक्त वातावरण में पलने के संवैधानिक अधिकार की रक्षा हो.

राजधानी दिल्ली के निवासी तीन परिवारों ने अपने कुछ महीनों के बच्चों की ओर से एक जन हित याचिका डाली है. उन्होंने देश के सर्वोच्च न्यायालय से कुछ ऐसे निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है जिससे उन्हें एक साफ और सेहतमंत वातावरण के मूलभूत अधिकार का हक मिले.

मात्र 3 से 14 महीने के हुए तीन बच्चों के नाम से दायर यह याचिका सबसे पहले तो त्योहारों या किसी भी मौके पर पटाखे जलाने पर प्रतिबंध की मांग करती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत देश के सभी नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का अधिकार मिला है. अपने इसी अधिकार का हवाला देते हुए नन्हें बच्चों की याचिका में लिखा गया है, "हमारी वृद्धि और विकास के लिए हमें साफ हवा में सांस लेने का अनुकूल माहौल देना जरूरी है.”

विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही जिस शहर को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बता चुका है, उस दिल्ली में अब भी खूब पटाखे जलाए जाते हैं. याचिका में लिखा है कि दशहरे और दिवाली के समय तो खास तौर पर इतने सारे पटाखे जलते हैं, जिनसे नवजात बच्चों को अस्थमा और फेफड़ों की कई तरह की बीमारियां होने का खतरा होता है. छोटे बच्चों के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए होते हैं और उनका आंतरिक प्रतिरक्षा तंत्र भी काफी संवेदनशील होता है.

एडवोकेट पूजा धार ने इस याचिका को दायर किया है और इस पर अक्टूबर में ही सुनवाई होने की उम्मीद है.

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प्रकाश का त्योहार दिवाली

इस बीच नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने भारत की केंद्र सरकार से एक अन्य वकील द्वारा दायर याचिका पर भी जवाब मांगा है, जिसमें दिवाली के दौरान पटाखे जलाने के लिए जगह और समय तय करने की बात कही थी. जस्टिस यूडी साल्वे की बेंच ने पर्यावरण, वाणिज्य और पेट्रोलियम मंत्रालयों से 12 अक्टूबर तक इसका उत्तर देने को कहा है. इस याचिका में कहा गया है, “किसी भी धार्मिक किताब में नहीं लिखा है कि दिवाली पर पटाखे जलाने चाहिए. दिवाली प्रकाश का त्योहार है, शोर का नहीं."

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