पोलो में किस्मत आजमाती मणिपुर की लड़कियां | दुनिया | DW | 28.03.2019
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दुनिया

पोलो में किस्मत आजमाती मणिपुर की लड़कियां

पोलो को अमीरों का खेल माना जाता रहा है और अब तक इस खेल में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है. लेकिन अब मणिपुर में लोकप्रिय इस खेल को महिलाएं भी खेलने से नहीं हिचक रही हैं.

Manipuri Polo Spielerinnen (IANS)

पोलो खेलने वाली मणिपुर की महिला खिलाड़ी

पूर्वोत्तर के मणिपुर राज्य में पुरुष सदियों से पोलो खेलते आ रहे हैं, लेकिन अब स्थिति बदल रही है. महिलाएं भी इस खेल में अपना दबदबा जमा रही हैं. इस प्रदेश की महिलाओं की पांच पेशेवर पोलो टीमें हैं, जिनका मुकाबला दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों से है. साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली इन मणिपुरी महिलाओं इस धारणा को तोड़ा है कि पोलो सिर्फ पुरुषों का खेल है, साथ ही इन्होंने यह भी दिखा दिया है कि यह केवल अमीरों का खेल नहीं है.

प्रदेश में महिला पोलो को प्रोत्साहन देने वालों में अग्रणी एल. सोमी रॉय इसे आइकॉनिक मणिपुरी घोड़ों के संरक्षण का अभियान भी मानते हैं, जिनकी आबादी साल दर साल घटती जा रही है. वह बताते हैं कि परंपरा के अनुसार, मणिपुरी महिलाएं पोलो नहीं खेलती थीं, क्योंकि यह घुड़सवारी का खेल है. इसकी शुरुआत वैवाहिक परंपरा से हुई है, लेकिन 1980 के दशक में वे अपने पुरुष रिश्तेदारों से प्रेरित हुई.

रॉय ने आईएएनएस को बताया, "ऑल मणिपुर पोलो एसोसिएशन ने उनको प्रोत्साहित किया. दुनियाभर में करीब 40-45 फीसदी पोलो खिलाड़ी महिलाएं हैं. इसलिए हम अभी इस पर पकड़ बना ही रहे हैं. खेल के रूप में यह लिंग-भेद से मुक्त है."

Prinz Harry bei Veuve Clicquot Manhattan Polo Classic (picture-alliance/abaca/G. Binuya)

अब तक पोलो को पुरुषों का खेल माना जाता रहा है.

मणिपुर में जहां देश के एक तिहाई पुरुष खिलाड़ी हैं, जबकि महिला खिलाड़ियों की तादाद तीन-चौथाई है. राय ने बताया कि आर्थिक रूप से पिछड़े प्रदेश के इन खिलाड़ियों में से अधिकांश इंडियन पोलो एसोसिएशन के सदस्य नहीं हैं.

मणिपुर में देश का सबसे लंबा पोलो सीजन होता है जो नवंबर से मार्च तक चलता है. इस दौरान दो अंतरराष्ट्रीय और चार राज्य स्तरीय टूर्नामेंट होते हैं, जिनमें मणिपुर स्टेटहुड वुमंस पोलो टूर्नामेंट भी शामिल है. यह देश में पहला ऐसा टूर्नामेंट है, जिसमें अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, केन्या, ऑस्ट्रेलिया और अर्जेटीना के खिलाड़ी मणिपुरी लड़कियों के साथ स्पर्धा में उतरते हैं. मैच इंफाल के मपल कांगजीबंग स्टेडियम में होते हैं, जो दुनिया को सबसे पुराना पोलो ग्राउंड है.

फिल्मकार रूपा बरुआ ने 2016 में मणिपुर में महिला पोलो की कहानी पर आलेख बनाना शुरू किया था. वह कहती हैं कि प्रदेश में प्रचलित हो रहे पोलो से लड़कियां करीब आ रही हैं. रूपा ने बताया, "2014-15 में मणिपुर में खेलने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला खिलाड़ियों को लाने का प्रयास किया गया. इस प्रयास का मकसद मणिपुरी घोड़ों का संरक्षण करना था, क्योंकि उनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था. मैंने इसमें एक सहजीविता का संबंध पाया और इस कहानी का मैंने चार साल तक अनुसरण किया." बरुआ मानती हैं कि मणिपुरी महिलाएं नैसर्गिक घुड़सवार और बेहतरीन एथलीट हैं."

फिल्म की हिमायती रही 19 साल टन्ना थॉडम 2010 में एक मैच मं कुछ महिला खिलाड़ियों को खेलते देख पोलो खेल के प्रति उत्साहित हुई थीं. उन्होंने 2011 में असम राइफल्स पोलो क्लब ज्वाइन किया और वह 2017 में स्टेटहुड डे वुमंस पोलो टूर्नामेंट के फाइनल में जाने वाली एकमात्र जूनियर थीं. उन्होंने कहा, "यह मेरे जीवन का सबसे सुखद पल था."

जेथोलिया थांगबम ने 2016 में पोलो खेलना शुरू किया. उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ खेलने से मणिपुरी खिलाड़ी साल दर साल बेहतर कर रही हैं.

मणिपुर पोलो सोसायटी के सचिव एन. इबुनगोचौबी ने कहा कि मणिपुरवासियों और घोड़ों के बीच खास संबंध है.

लेकिन हाल के दिनों में मणिपुरी घोड़े शहरीकरण के अभिशाप के कारण अपने आवास से वंचित हो गए हैं और उनकी आबादी 2003 में जहां 1,893 थी वह 2014 में घटकर 500 रह गई है.

आईएएनएस

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