पोर्न की लत से कैसे मिलेगा छुटकारा? | ब्लॉग | DW | 30.10.2018
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ब्लॉग

पोर्न की लत से कैसे मिलेगा छुटकारा?

उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद दूरसंचार विभाग ने 800 से ज्यादा पोर्न वेबसाइटों को ब्लॉक कर दिया है. क्या पोर्न रोक कर उसकी लत और यौन अपराधों पर काबू पाया जा सकता है? यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है.

पूरी दुनिया में लंबे समय से इस पर बहस है कि आखिर पोर्न का वास्तविक समाज में स्त्रियों पर घटित होने वाले अपराधों से कोई संबंध है या नहीं. निर्णायक तौर पर कुछ कहा नहीं जा सका है. पोर्न देखने की मनोवृत्ति और स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों के अलावा नैतिकता, पाबंदी, आचार संहिता, वर्जना, यौन अपराध और मनोविकार और पोर्न की लत से जुड़े अध्ययन भी हुए हैं. जाहिर है भारत भी इससे अछूता नहीं है.

यही कारण है कि जब पिछले दिनों देहरादून के एक बड़े स्कूल हॉस्टल में एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार करने वाले नाबालिग लड़के पोर्न देखने के आदी बताए गए, तो उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सीधे सीधे पोर्न वेबसाइटों के दुष्प्रभावों को रेखांकित किया.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा की अगुवाई में उत्तराखंड हाईकोर्ट की बेंच ने ध्यान दिलाया कि बलात्कार जैसी जघन्यता की एक बड़ी वजह किशोरों और युवाओं में पोर्न के प्रति बढ़ता चस्का भी है. धीरे धीरे यही ड्रग्स जैसा नशा उन्हें अपराध के लिए उकसाता है. हाईकोर्ट ने पोर्न को लेकर बड़ी चिंताएं जताते हुए कहा कि 2015 में केंद्र के नोटिफिकेशन के बावजूद कैसे देश में इंटरनेट सेवा प्रदाता पोर्न वेबसाइटों को ब्लॉक करने में समर्थ नहीं हो पाए.

कोर्ट ने पुराने रिकॉर्ड खंगाले और सितंबर में केंद्र सरकार से 857 वेबसाइटों को फौरन बंद करने का आदेश दिया. केंद्र सरकार ने आदेश मिलते ही इलेक्ट्रॉनिक और आईटी मंत्रालय को कार्रवाई करने को कहा. मंत्रालय ने दूरसंचार विभाग को कहा, विभाग ने इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को अदालती फरमान का हवाला देते हुए पोर्न वेबसाइटों को ब्लॉक करने का हुकुम सुनाया. इस तरह कुछ दिन पहले यह रोक प्रभावी हो गई है. लेकिन 857 वेबसाइटों की काली सूची में से 30 वेबसाइटों को बाहर रखा गया, यह कहते हुए कि उनमें प्रकाशित कंटेंट पोर्न नहीं है.

यह भी सच है कि हाल के मीटू मूवमेंट में पोर्न दिखाने जैसी शिकायतें भी आई हैं, कर्नाटक विधानसभा के भीतर पोर्न देखने का मामला कुछ पुराना जरूर है लेकिन भुलाया नही गया है. बलात्कार के बाद पोर्न वेबसाइटों पर अपलोड करने की धमकी देकर चुप कराने की वारदातें भी सामने आई हैं. लेकिन क्या इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों की रोक भर से पोर्न के शौकीन बाज आएंगें, कहना कठिन है.

इंटरनेट जैसे अथाह वेब समंदर में पोर्न को न खोज पाना भला कितनी देर नामुमकिन रहेगा? इस दिशा में तो होना ये चाहिए कि अगर रोक लगानी है तो ये मुकम्मल और मजबूत रोक होनी चाहिए. पहुंच से पहले उत्पादन और वितरण के सारे रास्ते बंद होने चाहिए, इतनी तकनीकी और प्रौद्योगिकीय कुशलता तो अर्जित करनी ही होगी.

प्रतिबंध से पहले एक एक्सरसाइज यह भी हो सकती है कि दीर्घ अवधि की प्लानिंग और निरतंरता के साथ सामाजिक जागरूकता का लेवल बढ़ाया जाए. सेक्स को लेकर शर्म और लोकलाज का भाव अगर नहीं टूटेगा तो फिर पोर्न वेबसाइटों पर रोक से भी शायद कुछ देर तक अवरोध बना रहकर, आगे टूट सकता है.

कानून और मनोविज्ञान और आपराधिक मामलों के जानकारों का मानना है कि अगर पोर्न देखने से ही बलात्कार हो रहे होते तो तबाही मच जाती. जबकि यह भी सच है कि हर छह घंटे में इस देश में बलात्कार होते हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों और गिरफ्तारियों के आधार पर देखें तो सीधे तौर पर कहना कठिन है कि पोर्न देखने की लोलुपता, बलात्कार या अन्य किस्म के यौन अपराधों के लिए उकसावा बनती है. हालांकि इस बहाने ब्यूरो को चाहिए कि वह ऐसी श्रेणी भी विकसित करे जिनसे इस तरह की आपराधिक मनोवृत्तियों के रिकॉर्ड भी सामने आ सकें.

स्त्रियों पर अलग अलग तरह के बर्बर शारीरिक और मानसिक हमले तो बिना पोर्न देखे भी हो रहे हैं और घरों से लेकर सड़कों और संस्थानों तक कहां कहां नहीं हो रहे हैं. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, एनआईएच के लिए भारत के संदर्भ में इस सवाल पर एक शोध आलेख प्रकाशित किया गया. करीब चार साल पहले हुए इस शोध में इस बात की जांच करने की कोशिश की गई थी कि क्या भारत में यौन अपराध, पोर्नोग्राफी से प्रभावित हैं.

शोध के परीक्षणों पर आधारित निष्कर्षों में पाया गया कि सीधे तौर पर पोर्नोग्राफी को ही कारक मानना कठिन है क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के तत्कालीन आंकड़े भी इस परिकल्पना की पुष्टि करते नहीं पाए गए. ऐसे ही एक अन्य अध्ययन में अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के हवाले से हुए अध्ययन में पाया गया कि वहां पोर्न को लेकर एक खुला माहौल है लेकिन उसकी वजह से बलात्कार की दरों में बढोत्तरी नहीं देखी गई है. अमेरिका विश्व में पोर्न का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और आंकड़ों के मुताबिक वहां बलात्कार के मामलों में पिछले दस साल में गिरावट ही दर्ज की गई है.

पोर्न को लेकर नैतिकता, सजा या शुद्धतावाद की ठेकेदारी करने से ज्यादा ऐसे सुहृद्य, साहसी और समझदार परिजनों, पर्यवेक्षकों, बौद्धिकों, शिक्षकों, मनोविज्ञानियों, कानूनविदों और पुलिस अधिकारियों की जरूरत है जो पोर्न से जुड़ी गलत और भ्रामक धारणाओं पर नई पीढ़ी से, किशोरों से और बच्चों से स्पष्ट और सरल भाषा में संबोधित हो सकें, उन्हें पोर्न देखने से जुड़े नुकसान और समस्याओं के बारे में बताएं, खतरों से आगाह करें, और सेक्स से जुड़े जो भी उनके भ्रम हैं उनसे उन पर खुल कर बात करें, उन्हें उनकी यौन समस्याओं, दुविधाओं या यौन अचरजों के बारे में पूछ सकें.

ऐसा सामाजिक पर्यावरण बनाए बिना, एकतरफा कार्रवाइयों से तो सुधार आना मुश्किल है. कोर्ट ने बेशक संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते हुए सरकारों को रास्ता सुझाया है लेकिन यह सरकारों, नीति निर्माताओं और अन्य दबाव समूहों का काम है कि वे सेक्स और पोर्न जैसे नाजुक मामलों पर एक सुचिंतित रास्ते की तलाश करें.

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