पेड़ों को बचाने के लिए यहां शुरू हुआ ‘मिनी चिपको आंदोलन’ | दुनिया | DW | 07.01.2019
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दुनिया

पेड़ों को बचाने के लिए यहां शुरू हुआ ‘मिनी चिपको आंदोलन’

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में वर्षों पुराने पेड़ों को बचाने के लिए करीब दो दर्जन गांवों के लोगों ने ‘चिपको आंदोलन’ जैसा अभियान शुरू किया है. इसकी जगह गोशाला बनाने की है योजना.

Indien Kuhdorf Malerei (DW/F. Fareed)

गांयों का गांव नाम से मशहूर हो रहे रामेश्वर गांव की गोशाला. यूपी के संभल में भी गोशाला बनाने की योजना.

संभल जिले के पवांसा ब्लॉक स्थित कैला देवी मंदिर के आस-पास एक हेक्टेयर जमीन पर ढाई करोड़ रुपये की लागत से गोशाला बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए पचास लाख रुपये जारी भी कर दिए हैं. बताया जा रहा है कि प्रशासन ने उस जमीन को गोशाला के लिए चुना है, जहां बड़ी संख्या में वर्षों पुराने पेड़ लगे हैं.

ग्रामीणों का कहना है कि गोशाला खाली जमीन पर भी बनाई जा सकती है. उनका मानना है कि प्रशासन जिस स्थान पर इसे बनवाना चाहता है उसके कारण वहां सैकड़ों पेड़ों का अस्तित्व संकट में आ गया है और ये पर्यावरण के लिए भी गंभीर संकट का सबब बन सकता है. इसी वजह से गांव के लोगों ने संकल्प लिया है कि वो पेड़ों से चिपककर अपनी जान दे देंगे, लेकिन पेड़ कटने नहीं देंगे.

सैंकड़ों साल पुराने पेड़

संभल में भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह बताते हैं, "कैला देवी मंदिर से लगी ग्राम समाज की करीब बीस बीघा जमीन में पाकड़, बरगद, पिलखन समेत विभिन्न प्रजातियों के करीब चार सौ पेड़ हैं. यह स्थान झाड़ी वाला जंगल के नाम से मशहूर है. मंदिर होने के कारण लोगों का धार्मिक जुड़ाव भी यहां से बना हुआ है. इस जंगल में आठ-दस पेड़ तो ऐसे हैं, जो सैकड़ों वर्ष पुराने हैं. इन सभी पेड़ों की रक्षा के लिए ही बीस गांव के लोगों ने एक पंचायत की और उसमें तय किया गया कि हम अपने प्राण दे देंगे लेकिन पेड़ कटने नहीं देंगे.”

स्थानीय पत्रकार रजनीश बताते हैं कि कुछ दिन पहले आस-पास के कई गांव के लोगों ने उन पेड़ों से लिपट कर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लिया है, जिन्हें गोशाला की स्थापना के लिए कार्यदायी संस्था द्वारा काटे जाने का अंदेशा है. रजनीश के मुताबिक, तब से लगातार ग्रामीण इन पेड़ों के आस-पास जमा हैं.

वहां मौजूद दर्शन सिंह नामक एक व्यक्ति ने बताया, "हम गोशाला का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि ये तो बहुत आवश्यक है लेकिन उसके लिए खाली जमीन को भी तो चुना जा सकता है. हम लोगों ने प्रशासन से ग्राम समाज की दूसरी भूमि पर गोशाला निर्माण का आग्रह किया है लेकिन अभी तक प्रशासन ने कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है.”

ग्रामीणों ने इस बारे में एसडीएम को ज्ञापन भी दिया है. एसडीएम दीपेंद्र यादव कहते हैं, "मामला संज्ञान में आया है और जांच कराई जा रही है. पेड़ काटकर गोशाला बनाना औचित्यपूर्ण नहीं है लेकिन अन्य पहलुओं की भी जांच होगी. यदि जरूरत पड़ी तो जगह को बदला भी जा सकता है.”

आवारा पशुओं की समस्या का निदान है गोशाला

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने ये भी फैसला लिया है कि वो हर ग्राम सभा, क्षेत्र पंचायत, नगर पंचायत इत्यादि निकायों में गोशाला निर्माण कराएगी ताकि आवारा पशुओं से होनी वाली दिक्कतों से निपटा जा सके. पिछले कुछ सालों में सड़कों को चौड़ा करने और विकास के लिए तमाम निर्माण कार्य की वजह से हजारों की संख्या में पेड़ काटे गए हैं.

जगह-जगह इनका विरोध भी होता है लेकिन संभल के लोगों ने विरोध का यह तरीका अपनाया है. पिछले सितंबर महीने में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने यूपी सरकार द्वारा जारी उस अधिसूचना को भी रद्द कर दिया था जिसके तहत कुछ खास किस्म के पेड़ों को छोड़कर अन्य को काटने के लिए अनुमति लेने के प्रावधान को खत्म कर दिया था. बावजूद इसके, पेड़ों का काटा जाना जारी है.

Indien Umweltschützer Chandi Prasad Bhatt (imago/Xinhua)

चिपको आंदोलन चलाने वाले पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट

चिपको आंदोलन से प्रेरित

चिपको आंदोलन की सबसे पहले शुरुआत 18वीं शताब्दी में राजस्थान से हुई थी जहां बिश्नोई समुदाय के लोग पेड़ों से लिपट कर उनकी रक्षा करते थे. उस दौरान अमृता देवी के नेतृत्व में गांव के 383 लोगों ने केहरी नामक पेड़ों की रक्षा के लिए प्राण गंवा दिए. इसके बाद जोधपुर के महाराजा के आदेश पर पेड़ों की कटाई पर तत्काल रोक लगा दी गई.

आधुनिक भारत में यह आंदोलन एक बार फिर 1973 में उत्तर प्रदेश के मंडल गांव से शुरु हुआ जहां चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में तत्कालीन उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के चमोली जिले से इसकी शुरुआत हुई. इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. इस आंदोलन के बाद ही इंदिरा गांधी की सरकार ने पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई थी.

पिछले दिनों गूगल ने इस आंदोलन के पैंतालीस साल होने पर डूडल के जरिए इस आंदोलन और उसमें हिस्सा लेने वाले लोगों को याद किया था.

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