पेट की कीमत चुकाता बचपन | दुनिया | DW | 04.07.2014
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दुनिया

पेट की कीमत चुकाता बचपन

विकास और प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में 44 लाख बाल मजदूर हैं. हालांकि 2001 के मुकाबले तादाद में कुछ गिरावट आई है लेकिन पांच से 14 साल की उम्र वर्ग के 43.5 लाख बच्चे अब भी विभिन्न क्षेत्रों में मजदूरी करते हैं.

देश में सबसे ज्यादा नौ लाख बाल मजदूर उत्तर प्रदेश में हैं और उसके बाद महाराष्ट्र (पांच लाख) का नंबर है. केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर जारी ताजा आंकड़ों से यह तथ्य सामने आया है. लेकिन बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों के मुताबिक, देश में बाल मजदूरों की तादाद इससे बहुत ज्यादा है. पेट की आग बुझाने के लिए लाखों नौनिहालों का बचपन झुलस रहा है.

सरकारी आंकड़ा

केंद्र सरकार के आंकड़ों में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश में ज्यादातर बाल मजदूर ग्रामीण इलाकों में काम करते हैं. मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश के नौ लाख बाल मजदूरों में से सात लाख ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे हैं. पूरे देश में ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले बाल मजदूरों की तादद 32.7 लाख है, जबकि शहरी इलाकों में यह तादाद 10.8 लाख है.

सरकारी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2001 की जनगणना के मुकाबले बाल मजदूरों की तादाद में 65 फीसदी गिरावट आई है. लेकिन बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों ने सरकार के इन आंकड़ों का खंडन करते हुए कहा है कि पूरे देश में बाल मजदूरों की तादाद और उन पर होने वाले अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

जागरुकता जरूरी

चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन (मुंबई) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में बाल मजदूरी के खिलाफ शिकायतों की तादाद तेजी से बढ़ी है. वर्ष 2009 में ऐसी 4,183 शिकायतें मिली थीं लेकिन पिछले साल यह बढ़ कर 15,636 तक पहुंच गईं. संगठन के कार्यकर्ता नीशीत कुमार कहते हैं, "इन आंकड़ों से साफ है कि लोगों में बाल मजदूरी के खिलाफ जागरुकता बढ़ी है. लेकिन यह काफी नहीं है". वह कहते हैं कि संगठन के सर्वेक्षण से पता चला है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 18 साल या उससे कम के बाल मजदूरों का योगदान 11 फीसदी है.

बच्चों के हितों में काम करने वाले संगठनों का कहना है कि बाल मजदूरी पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून बनाए जाने चाहिए. इससे बाल मजदूरी में शामिल बच्चों के बचाव और पुनर्वास का काम आसान हो जाएगा. कुमार कहते हैं, "मौजूदा नियमों में बाल मजदूरी के खिलाफ सजा देने का अधिकार श्रम विभाग के पास है. लेकिन बचाव और सजा की प्रक्रिया को जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत शामिल करना जरूरी है." इससे बाल कल्याण समितियों को इस समस्या पर अंकुश लगाने के मामले में ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे.

सामाजिक सुरक्षा

कार्यकर्ताओं के मुताबिक, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बाल मजदूरी में शामिल नियोक्ताओं से वसूला गया जुर्माना संबंधित बच्चों को दिया जा सके. बचपन बचाओ आंदोलन के राकेश सेंगर कहते हैं, "नियोक्ताओं पर जुर्माने की रकम बढ़ाने से यह समस्या हल नहीं होगी. श्रम विभाग को बाल मजदूरों के बचाव और दोषियों को सजा देने का अधिकार होना चाहिए." क्राई (सीआरवाई) की शोध b नीति निदेशक कोमल गनोत्रा कहती हैं, "बाल मजदूरी की समस्या को अलग नजरिए से देखना सही नहीं है. यह मुद्दा बाल सुरक्षा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के साथ जुड़ा है. तमाम मंत्रालयों को मिल कर उन वजहों को दूर करने की दिशा में पहल करनी चाहिए जिसकी वजह से बाल मजदूर बनते हैं".

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि नई सरकार बाल मजदूरों के बचाव और पुनर्वास की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए और कड़े कानून बनाएगी. नरेंद्र मोदी सरकार ने श्रम कानूनों में बड़े बदलाव की बात कही है.

यूपीए सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन श्रम व रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने 04 दसंबर, 2012 को बाल मजदूर (पाबंदी व नियमन) संशोधन विधेयक, 2012 राज्यसभा में पेश किया था. लेकिन वह ठंढे बस्ते में है. कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि नई सरकार उक्त विधेयक को पारित करने की दिशा में ठोस पहल करेगी.

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