पिंजरा तोड़ रही है आधी आबादी | दुनिया | DW | 17.10.2015
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दुनिया

पिंजरा तोड़ रही है आधी आबादी

"हर शाम 7 बजे महिलाओं को कैद कर देने वाले दमनकारी नियमों के खिलाफ महिलाओं का एक स्वायत्त समूह!" यह है पिंजरा तोड़कर बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रही दिल्ली की युवा छात्राओं का आत्म परिचय. आखिर क्यों और कौन करता है कैद?

सार्वजनिक जगहों पर रहने, घूमने और जीने की आजादी का हक जताने वाली ये लड़कियां 'पिंजरा तोड़' अभियान चला रही हैं. 50-60 की संख्या में युवा महिलाओं और पुरुषों का समूह शाम ढलने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कालेजों के बीच मार्च करता है. पोस्टर लिए और नारे लगाता हुआ यह समूह महिला हॉस्टलों के बाहर ठहरता है और वहां अर्थपूर्ण गीत गाता है. ये गीत महिलाओं को सुरक्षित रखने की शर्त के तौर पर उन्हें चारदीवारी में बंद रहने की मानसिकता पर चोट करते हैं.

छात्राओं के कई हॉस्टलों में 6 या 7 बजे शाम को कर्फ्यू आवर लागू हो जाते हैं जिसके बाद वे बाहर नहीं जा सकतीं और हॉस्टल वापस लौटने की भी अनुमति नहीं होती. लड़कों के हॉस्टल में ऐसी शर्तें नहीं रखी गई हैं.

यह अभियान दिल्ली यूनिवर्सिटी, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, अंबेडकर यूनिवर्सिटी और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने मिलकर फेसबुक पेज से शुरु किया. कॉलेज के हॉस्टलों और पेईंग गेस्ट ठिकानों में छात्राओं और कामकाजी महिलाओं के साथ होने वाले सेक्सिस्ट बर्ताव और कड़वे अनुभवों की प्रतिक्रिया के तौर पर शुरु हुआ यह अभियान अब सभी लिंग आधारित भेदभावों और पितृसत्तात्मक संरक्षणवाद की जड़ें हिला रहा है.

दिल्ली महिला आयोग की प्रमुख ने भी इस अभियान का समर्थन करते हुए बदलावों का समर्थन किया. स्वाति मालीवाल का मानना है कि दिल्ली को नाइट लाइफ से ज्यादा नाइट शेल्टर की जरूरत है.

कुछ जगहों पर इन विरोध प्रदर्शनों का असर भी दिखने लगा है. कर्फ्यू टाइम में ढील दी गई है. लेकिन अभियान को आगे बढ़ा रही महिलाओं का मानना है कि ये काफी नहीं है.

दिल्ली सरकार ने हाल ही में लोक निर्माण विभाग से कहा है कि राजधानी के सभी 'अंधेरे कोनों' में रोशनी की जाए और जल्द ही जगह जगह सीसीटीवी कैमरा लगाए जाने का प्रस्ताव लाने का निर्णय किया है.

कई लोग महिलाओं को नैतिकता की दुहाई देते हुए उनके आजादी से घूमने, बोलने और जो चाहे पहनने के अधिकार पर सवाल उठाते रहे हैं. वहीं सार्वजनिक जगहों पर अपना अधिकार जताने के इस क्रम में महिलाओं से जुड़े जन्मजात भेदभावों की सच्चाई भी सामने आती रहती है.

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