पारदर्शी हो जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया | ब्लॉग | DW | 16.10.2015
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ब्लॉग

पारदर्शी हो जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन वाले संविधान संशोधन और उसके बाद आयोग का गठन करने वाले कानून को निरस्त करके सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की संभावना पैदा कर दी है.

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि दो दशक पुरानी कॉलेजियम प्रणाली कमोबेश ठीक-ठाक चल रही है और यदि उसमें सुधार की जरूरत है, तो वह तीन नवम्बर को इस बारे में दिये गए सुझावों पर विचार करेगा. संविधान संशोधन और आयोग के गठन वाला कानून संसद के दोनों सदनों ने बिना किसी विरोध के पारित किया था और उसे 20 विधानसभाओं का भी अनुमोदन प्राप्त था. इसलिए यह कहा जा सकता है कि ये जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें असंवैधानिक करार देकर पुरानी प्रणाली को बहाल कर दिया है जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज ही विभिन्न हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों के बारे में फैसले लेते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अपनी जगह है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि कॉलेजियम प्रणाली बहुत सुचारु ढंग से काम नहीं कर रही है. तीन नवंबर को इसमें सुधार-संबंधी सुझावों पर विचार करने की बात कहकर खुद सुप्रीम कोर्ट ने प्रकारांतर से यह स्वीकार किया है कि प्रणाली में खामियां हैं. पिछले कई वर्षों के दौरान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल उठे हैं. देश के शीर्षस्थ कानूनविदों में से एक फाली एस. नरीमन ने हालांकि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का विरोध किया था, लेकिन उनका भी यह कहना था कि कॉलेजियम प्रणाली बिलकुल भी पारदर्शी नहीं है और इसे बदलने की जरूरत है. वह आयोग का इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि छह सदस्यों वाले इस आयोग में तीन ऐसे सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है जिनमें कानून मंत्री भी शामिल होंगे और शेष दो सदस्य ऐसे होंगे जिनका कानून से कोई वास्ता ही नहीं होगा. इस तरह जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप की गुंजाइश पैदा हो जाएगी. नरीमन ऐसे आयोग के पक्ष में थे जिसमें राजनीतिक या कानूनी क्षेत्र से बाहर के लोग न हों. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन भी कॉलेजियम प्रणाली की कटु आलोचक है.

दरअसल समस्या यह है कि एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति पर चाहे कितना भी गंभीर आरोप क्यों न लग जाए, उसे उसके पद से हटाने की प्रक्रिया इतनी कठिन और लंबी है कि हटाना लगभग असंभाव ही है. इसके कारण यह सवाल पैदा होता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए उसे जवाबदेह कैसे बनाया जाए. इस समय किसी को भी यह नहीं पता है कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है और उन्हें किन कसौटियों पर कसने के बाद नियुक्त किया जाता है, यानी उनकी नियुक्ति के लिए क्या मानक तय किए गए हैं. इसलिए यह राय बल पकड़ती जा रही है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के नाम पर उसे निरंकुश बना दिया गया है. और, लोकतंत्र में उसका कोई भी स्तंभ निरंकुश नहीं हो सकता.

न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी बहुत संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में उस पर कई गंभीर आघात किए गए थे. उसी समय “प्रतिबद्ध न्यायपालिका” का नारा दिया गया था और वरिष्ठतम जज की उपेक्षा करके उससे जूनियर जज को भारत का प्रधान न्यायाधीश बनाने की शुरुआत की गई थी. इमरजेंसी के दौरान न्यायपालिका की भूमिका गौरवपूर्ण नहीं रही. इसीलिए उसके बाद पूरी कोशिश की गई कि न्यायपालिका को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए और जजों की नियुक्ति में सरकारी भूमिका को समाप्त कर दिया जाए.

वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली के विरोधी भी यह नहीं चाहते कि उसे समाप्त करके एक ऐसी प्रणाली स्थापित की जाए जिसके तहत प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, संसद में विपक्ष के नेता और “विशिष्ट व्यक्ति” जजों की नियुक्ति में भूमिका निभाएं. लेकिन वे यह जरूर चाहते हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए भी उसे जवाबदेह बनाया जाए और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी हो. यह कैसे हो सकेगा, अभी स्पष्ट नहीं है. यह जरूर स्पष्ट है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने फिर से इस संबंध में कानून बनाने की कोशिश की तो संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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