पाकिस्तान में कथित नाबालिग की फांसी पर विवाद | दुनिया | DW | 04.08.2015
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दुनिया

पाकिस्तान में कथित नाबालिग की फांसी पर विवाद

पाकिस्तान में शफकत हुसैन की फांसी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गयी है. विवाद कथित अपराध के समय शफकत की नाबालिग उम्र पर उठा है. संयुक्त राष्ट्र ने सजा पर पुनर्विचार करने की अपील की थी.

मंगलवार को पाकिस्तान ने शफकत हुसैन को फांसी के फंदे पर लटका दिया. शफकत पर 2004 में एक सात साल के बच्चे की हत्या का आरोप था. उसके वकील का कहना है कि ना तो अदालत में हत्या साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद थे और ना ही कानूनी रूप से उसे फांसी दी जानी चाहिए थी क्योंकि 2004 में वह नाबालिग था. शफकत की उम्र को ले कर काफी विवाद उठा. बर्थ सर्टिफिकेट ना होने के कारण बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि शफकत की उम्र उस समय 14 साल थी. वकील ने स्कूल के रिकॉर्ड पेश किए थे.

इस मामले से जुड़ा दूसरा मुद्दा है पुलिस की बर्बरता का. वकील का दावा है कि हिरासत में शफकत को यातना दी गयी और जबरन उससे अपराध कबूल कराया गया. फांसी दिए जाने से पहले शफकत के भाई मंजूर हुसैन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "उसे सिगरेट से जलाया गया, उसके कंधों पर निशान हैं. टखनों पर गर्म छड़ी से जलाए जाने के निशान हैं. वो निशान उसके जिस्म पर अब भी हैं, आप जा कर देख सकते हैं." शफकत के वकील का कहना है कि अपराध कबूल कराने के लिए पुलिस ने उसके नाखून तक उखाड़ लिए थे. वहीं शफकत की मां का कहना है कि गरीब परिवार से होने के कारण वे बेटे के लिए महंगा वकील नहीं कर सकते थे, "प्राइवेट वकील 30,000 रुपये मांगता था."

पाकिस्तान के लिए बेहद दुखद दिन

मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे पाकिस्तान के लिए "बेहद दुखद दिन" बताया है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दक्षिण एशिया विभाग के अध्यक्ष डेविड ग्रिफिथ्स ने इस बारे में कहा, "एक ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र को ले कर विवाद था और जिसका अपराध यातना के चलते साबित किया गया, आज उसने उस अपराध की कीमत अपनी जान दे कर चुकाई है और अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती थी." अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते शफकत की सजा चार बार टली. आखिरी याचिका खारिज होने के बाद सजा मिलना तय हो गया था लेकिन रमजान शुरू हो जाने के बाद इसे एक महीने के लिए रोक दिया गया. पाकिस्तान में रमजान के दौरान फांसी नहीं दी जाती.

दिसंबर से अब तक पाकिस्तान में 200 लोगों को फांसी दी जा चुकी है. एमनेस्टी के आंकड़ों के अनुसार ईरान और चीन के बाद पाकिस्तान में ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान ली गयी है. दरअसल 2008 में पाकिस्तान में फांसी पर रोक लगा दी गयी थी लेकिन पिछले साल दिसंबर में पेशावर के एक स्कूल पर हुए आतंकी हमले के बाद इस रोक को हटा लिया गया. पाकिस्तान का कहना है कि दहशतगर्दों को फांसी दी जानी चाहिए लेकिन जानकारों का कहना है कि रोक हटाए जाने का खामियाजा अल्पसंख्यकों और गरीब परिवारों को उठाना पड़ रहा है. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार पाकिस्तान में 8,000 लोगों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है.

आईबी/एमजे (रॉयटर्स, एएफपी)

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