पाकिस्तान में ऐसे चलती है ″जिहाद की यूनिवर्सिटी″ | दुनिया | DW | 17.11.2020
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दुनिया

पाकिस्तान में ऐसे चलती है "जिहाद की यूनिवर्सिटी"

मौलाना यूसुफ शाह जब अपने उन पूर्व छात्रों की लिस्ट दिखाते हैं जो तालिबान के नेता बने तो उनके चेहरे पर मुस्कान खेल जाती है. ये सभी लोग पाकिस्तान में "जिहाद की यूनिवर्सिटी" से निकले हैं.

पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में स्थित दारूम उलूम हक्कानिया मदरसे ने पूरी फेहरिस्त तैयार की है कि तालिबान के नेतृत्व में कौन नेता किस पद पर है. इनमें कई ऐसे लोग भी हैं जो अफगानिस्तान में 20 साल से जारी युद्ध को खत्म करने के लिए अफगान सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे हैं. 

आलोचक इस मदरसे को "जिहाद की यूनिवर्सिटी" कहते हैं. लेकिन इससे जुड़े एक प्रभावशाली मौलवी को अपने पूर्व छात्रों पर गर्व है. यूसुफ शाह कहते हैं, "दारूम उलूम हक्कानिया के छात्रों ने रूस को टुकड़ों टुकड़ों में बांट दिया और अमेरिका का बोरिया बिस्तर बांध कर उसे भी दफा कर रहे हैं. हमें इस पर गर्व है."

पेशावर से लगभग 60 किलोमीटर दूर पूर्व में अकोरा खटक में यह मदरसा स्थित है. यहां पर लगभग चार हजार छात्र पढ़ते हैं. वे सभी यहीं रहते हैं. यहां उन्हें खाना, कपड़े और शिक्षा, सब कुछ मुफ्त मिलता है. यहां पढ़ने वाले बच्चों में बहुत से पाकिस्तानी और अफगान शरणार्थी रहे हैं. कुछ लोगों ने वापस अफगानिस्तान जाकर रूस और अमेरिका के खिलाफ युद्ध लड़ा तो कुछ जिहादी विचारधारा का प्रचार करते हैं.

Pakistan Leiter des Darul Uloom Haqqania Seminars Maulana Yousaf Shah

यूसुफ शाह को अपने छात्रों पर गर्व है

सरकार का समर्थन

कुछ हल्कों में आलोचना के बावजूद इस मदरसे को पाकिस्तान की सरकार से पूरा समर्थन मिलता है. पाकिस्तान में मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां मजहबी धड़ों से संपर्कों का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए करती हैं.

इसी महीने दारूल उलूम हक्कानिया के नेताओं ने इंटरनेट पर पोस्ट एक वीडियो में खुल कर तालिबान उग्रवादियों का समर्थन किया. अफगान सरकार ने इस पर अपनी आपत्ति जताई, जो अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के हटने की तैयारियों के बीच बढ़ती हुई चरमपंथी हिंसा से जूझ रही है.

अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सादिक सिद्दीकी ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा कि हक्कानिया जैसे मदरसे "कट्टरपंथी जिहाद को जन्म देते हैं और फिर तालिबान पैदा होते हैं जिनसे हमारे देश को खतरा है." वह ऐसे मदरसों को बंद करने की मांग करते हैं. अफगान के नेताओं का तर्क है कि ऐसे मदरसों को पाकिस्तान की मंजूरी बताती है कि वह तालिबान का समर्थन करता है.

शाह इस आरोप को खारिज करते हैं कि मदरसे हिंसा को भड़काते हैं, लेकिन वह विदेशी सैनिकों पर हमलों को सही ठहराते हैं. उनका कहना है, "अगर कोई हथियार लेकर आपके घर में घुस आए और आपको उससे खतरा हो.. तो फिर निश्चित तौर पर आप भी बंदूक उठाएंगे."

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तालिबान के जनक

इस मदरसे के पूर्व कर्ताधर्ता समी उल हक बड़े शौक से कहते थे कि वह तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के सलाहकार रहे हैं और इसीलिए उन्हें "तालिबान का जनक" नाम मिला है. हक ने 1990 के दशक में अपने छात्रों को अफगानिस्तान भेजा था ताकि वे तालिबान की तरफ से लड़ सकें. 

तालिबान के बेहद हिंसक धड़े हक्कानी नेटवर्क का नाम इसी मदरसे के नाम पर रखा गया है. अपने ही देश में हमले करने वाले कई पाकिस्तानी चरमपंथियों का संबंध भी इसी मदरसे से रहा है. इनमें पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या करने वाला आत्मघाती हमलावर भी शामिल था.

एक विश्लेषक माइकल सैंपल कहते हैं, "हक्कानिया मदरसा सबसे अहम और सबसे प्रभावशाली सुन्नी नेटवर्कों में से एक का मूल केंद्र है. माना जाता है कि वहां पढ़ने वाले लोग तालिबान के भीतर पद और जिम्मेदारियां संभालेंगे."

लेकिन सैंपल इन आरोपों को खारिज करते हैं कि यह मदरसा आतंकवाद की फैक्ट्री है जहां छात्रों को लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है या फिर यहां के लोगों का तालिबान के रणनीतिक फैसलों में कोई दखल है. यहां से पढ़ चुके लोग भी वहां किसी तरह की सैन्य ट्रेनिंग मिलने से इनकार करते हैं. 2009 में इस मदरसे से पढ़कर निकले मौलवी सरदार अली हक्कानी कहते हैं, "यह नहीं कहा जाता था कि हर किसी को अफगानिस्तान में जाकर लड़ना है, लेकिन हां, वहां जिहाद के बारे में खुल कर बात होती थी. इसके लिए अलग से क्लासें भी होती थीं. अगर कोई जिहाद के लिए जाना चाहता था, तो वह छुट्टियों में जा सकता था."

पाकिस्तान का मदरसा

इस मदरसे में हजारों छात्र पढ़ते हैं

आतंकवादी बनेंगे?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी ने राजनीतिक समर्थन के बदले हक्कानिया मदरसे को करोड़ों डॉलर की मदद दी है. यह मदरसा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लाखों गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देता है.

सरकारी अधिकारी और कार्यकर्ता लगातार चेतावनी देते रहते हैं कि ऐसे मदरसों पर निर्भरता घटानी होगी. उनका दावा है कि वहां पर कट्टरपंथी मौलवी छात्रों का ब्रेन वॉश करते हैं. यहां तक कि तालिबान का समर्थन करने के आरोप झेलने वाली पाकिस्तानी सेना भी मानती है कि मदरसों की वजह से क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ रही है.

पाकिस्तान में ऐसे दसियों हजार मदरसे हैं. 2017 में 25 लाख छात्र ऐसे मदरसों में पढ़ रहे थे. उस वक्त पाकिस्तानी सेना के प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने पूछा था, "वे मौलवी बनेंगे या फिर आतंकवादी बनेंगे."

एके/ओएसजे (एएफपी)

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