पाकिस्तान के चुनाव में महिलाओं की हुंकार | दुनिया | DW | 13.07.2018
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दुनिया

पाकिस्तान के चुनाव में महिलाओं की हुंकार

पाकिस्तान में महिला उम्मीदवारों की बढ़ी संख्या ने चुनावी माहौल को रोचक बना दिया है. सभी अहम पार्टियों ने महिलाओं को टिकट दिए हैं.

25 जुलाई को पाकिस्तान में राष्ट्रीय संसद और चारों प्रांतों की असेंबलियों के लिए एक साथ वोट डाले जाएंगे. इस बार वहां बड़ी संख्या में महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं और खूब प्रचार कर रही हैं. बताया जाता है कि पुरुषों के मुकाबले उनकी रैलियों में भीड़ भी ज्यादा जुट रही है.

पाकिस्तानी नेशनल असेंबली की 272 सामान्य सीटों पर 171 महिला उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रही हैं. पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है. दो साल पहले देश में हुए निकाय चुनाव में भी काफी संख्या में महिलाओं ने चुनाव में जीत दर्ज की थी.

निकाय चुनाव की जीत ने पाकिस्तानी महिलाओं में जोश भर दिया है. यही वजह है कि इस बार के आम चुनाव इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में महिला प्रत्याशी मैदान हैं.

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इस बार लगभग सभी पार्टियों ने महिलाओं को टिकट दिए हैं. इसे बदलाव की बयार ही कहेंगे कि सिंध सीट से हिंदू महिला उम्मीदवार भी चुनाव में ताल ठोक रही हैं. मौजूदा 2018 के आम चुनाव में इस बार 105 महिला उम्मीदवार विभिन्न दलों से उम्मीदवार बनाई गई हैं, जबकि सत्तर महिला प्रत्याशी बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान अखाड़े में हैं. 

बताया जाता है कि बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख की एक चचेरी बहन नूरजहां भी चुनावी अखाड़े में हैं. वह खैबर पख्तूनख्वा की असेंबली सीट पीके-77 से निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं. उनके अलावा एक महिला उम्मीदवार ऐसी सीट से चुनाव लड़ रही हैं जहां कभी महिलाओं को मतदान करने की भी इजाजत नहीं थी. उस महिला उम्मीदवार का नाम हमीदा रशीद है. वह पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी से चुनाव लड़ रही हैं. 

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सबसे ज्यादा 19 महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है. इनमें 11 पंजाब से पांच सिंध से और खैबर पख्तूनख्वा से तीन महिलाओं को प्रत्याशी बनाया है. पाकिस्तान का लोकतंत्र मुल्क गठन के बाद से ही संगीनों के साये में कैद रहा है. पाकिस्तान के मौजूदा संसदीय चुनाव में अपनी भागीदारी के जरिए वहां की महिलाएं बंदिशों की बेड़ियां तोड़ना चाहती हैं.

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पाकिस्तान में महिला सशक्तिकरण की जब भी बात की जाती है, तब सिर्फ राजनीतिक और आर्थिक सशक्तिकरण पर चर्चा होती है लेकिन सामाजिक सशक्तिकरण की चर्चा नहीं होती. भले ही पाकिस्तानी महिलाओं को कई कानूनी अधिकार मिल चुके हों, लेकिन जब तक वह राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं होगी, उनका कल्याण नहीं होने वाला. 

पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ओस्लो की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 153 देशों में पाकिस्तान की आधी आबादी की दयनीयता चौथे स्थान पर है. रिपोर्ट में पाकिस्तानी महिलाओं की न्याय, सुरक्षा, समावेश और वित्तीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है. इन विषम परिस्थितियों के बावजूद पाकिस्तान आम चुनाव में महिला उम्मीदवारों की मौजूदगी मुल्क में आशा की किरण जैसी है.

रमेश ठाकुर/आईएएनएस

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