पाकिस्तान और इमरान खान से भी नाराज हैं कश्मीरी | भारत | DW | 07.10.2019
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भारत

पाकिस्तान और इमरान खान से भी नाराज हैं कश्मीरी

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में पुलिस ने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों को लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) तक पहुंचने से रोका.

भारत और पाकिस्तान की सीमा से महज आठ किलोमीटर दूर जसकूल में पुलिस को बड़े बड़े कंटेनर लगा कर रास्ता बंद करना पड़ा. प्रदर्शनकारी धरने पर बैठे रहे और मांग करते रहे कि पुलिस रास्ता साफ करे. ये लोग भारत सरकार के 5 अगस्त को संविधान के अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मू कश्मीर से विशेषाधिकार छीन लिए जाने के फैसले के खिलाफ अपनी नाराजगी दिखा रहे हैं. शुक्रवार को शुरू हुए इस प्रदर्शन को आजादी मोर्चे का नाम दिया गया है और इसे जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) ने आयोजित किया है. जेकेएलएफ कश्मीर की आजादी की मांग करता है और उसे पाकिस्तान और भारत दोनों का ही हिस्सा मानने से इंकार करता है. भारत का आरोप है कि पाकिस्तान इस संगठन की आर्थिक रूप से मदद कर रहा है. कश्मीर के अलग अलग हिस्सों में इसके सदस्यों को गिरफ्तार भी किया गया है.

प्रदर्शनों के शुरू होने पर इमरान खान ने ट्वीट कर शांति बनाए रखने की अपील की पर साथ ही कश्मीरियों को भारत से संभल कर रहने की चेतावनी भी दी. खान ने लिखा, "मैं आजाद कश्मीर में रहने वाले कश्मीरियों के गुस्से को समझता हूं जो भारत अधिकृत कश्मीर में अपने साथी कश्मीरियों को पिछले दो महीने से कर्फ्यू में देख रहे हैं. लेकिन आजाद कश्मीर से अगर कोई भी एलओसी पार कर कश्मीरियों की मदद करने के लिए जाएगा तो वह भारत के उसी प्रचार का हिस्सा बन जाएगा जो कश्मीरियों के संघर्ष को नजरअंदाज कर, उनकी मदद करने वालों को पाकिस्तान द्वारा भेजे गए इस्लामी आतंकवादी बताता है."

डॉयचे वेले से बातचीत में जेकेएलएफ के अध्यक्ष तौकीर गिलानी ने कहा कि खान के शब्द दिखाते हैं कि उन्होंने एलओसी को भारत और पाकिस्तान के बीच स्थाई सीमा मान लिया है. गिलानी ने कहा, "हमने यह प्रदर्शन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कश्मीर के विशेषाधिकार छीन लिए जाने के फैसले के खिलाफ आयोजित किए हैं. हमारी मांग है कि भारत सरकार कर्फ्यू खत्म करे, लोगों को आजादी से बाहर निकलने का अधिकार मिले और गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा किया जाए."

गिलानी कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप भी चाहते हैं, "हमारी मांग है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर के अपने अपने हिस्सों से अपनी फौज हटाएं और उसे "डीमिलिटराइज्ड जोन" घोषित करें. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र को यहां सक्रिय होना होगा और आने वाले सालों में एक जनमत संग्रह कराना होगा." 

पाकिस्तान पर आरोप लगाते हुए गिलानी ने कहा कि कश्मीर मुद्दे पर इस्लामाबाद सिर्फ बातें ही बनाता रहा है, "संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार एलओसी के दोनों ओर से लोग सीमा पार कर सकते हैं. लेकिन पाकिस्तान हमारे प्रदर्शन को रोक रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि उसने इसे स्थाई सीमा के रूप में स्वीकार लिया है."

कश्मीर मुद्दे की पूरी रामकहानी

6 सितंबर की एक रिपोर्ट के अनुसार 5 अगस्त के बाद से भारत ने करीब चार हजार लोगों को हिरासत में लिया. हालांकि इनमें से कइयों को बाद में छोड़ भी दिया गया. लेकिन कश्मीर में प्रदर्शन होने के डर से भारत सरकार ने यह कदम उठाया. इसके बाद से भारत के पाकिस्तान के साथ संबंध काफी खराब हुए हैं. 12 सितंबर को डॉयचे वेले से बातचीत के दौरान जर्मनी में पाकिस्तान के राजदूत ने कहा था कि अगर भारत फिर से पाकिस्तान के साथ राजनयिक संबंध चाहता है, तो उसे कश्मीर में लगाए गए कर्फ्यू को खत्म करना होगा.

जानकारों का मानना है कि 1980 के दशक में कश्मीर में पाकिस्तान के हस्तक्षेप ने इस पूरे मुद्दे को काफी नुकसान पहुंचाया है. इसके बाद से एक उदारवादी कश्मीरी आंदोलन पर धर्म का रंग चढ़ गया. माना जाता है कि अगर पाकिस्तान ने उस वक्त यह हस्तक्षेप ना किया होता, तो इस पूरे मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल सकता था. स्टॉकहोम स्थित एक कश्मीरी संगठन नॉर्डिक कश्मीर ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष तलत भट्ट का कहना है, "पाकिस्तान की कश्मीर नीति दोहरे मानदंडों और पाखंड पर आधारित है. एक तरफ तो इस्लामाबाद कहता है कि वह भारत अधिकृत कश्मीर की आजादी के हक में है और दूसरी तरफ वह अपने हिस्से के कश्मीर में लोगों का दमन करता है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पूरा का पूरा कश्मीर - भारत वाला हिस्सा भी और पाकिस्तान वाला भी - विवादित है." भट्ट का संगठन भी एक आजाद कश्मीर की मांग उठा रहा है.

ब्रसेल्स स्थित साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के अध्यक्ष सीगफ्रीड ओ वुल्फ का कहना है कि कश्मीर मुद्दे में पाकिस्तान का हस्तक्षेप हमेशा ही मामले को पेचीदा बनाएगा. वुल्फ के अनुसार इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की हैसियत इस्लामी आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले की है और ऐसे में उसे कश्मीर के लोगों का मसीहा नहीं समझा जा सकता. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, "पाकिस्तान की विदेश नीति का एक मकसद है भारत को कमजोर करना. इसके लिए वह कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है. आज जो स्थिति है, उसके लिए पाकिस्तान ने ही भारत को मजबूर किया है."

पाकिस्तान की रणनीति के बारे में वुल्फ कहते हैं, "पाकिस्तान को लगता है कि अगर भारत ने कश्मीर मसले में सैन्य हस्तक्षेप किया, तो इससे भारत की आर्थिक स्थिति और उसके अंतरराष्ट्रीय रुतबे पर असर पड़ेगा." इस बीच भारत लगातार पाकिस्तान से आतंकवादियों के सीमा पार करने की बात कर रहा है और पाकिस्तान इन आरोपों का खंडन कर रहा है. पाकिस्तान का दावा है कि कश्मीर और वहां के लोगों को वह सिर्फ राजनयिक और राजनीतिक तरीके से ही मदद कर रहा है.

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