पहली हिस्पैनिक जज के नाम को सीनेट की मंज़ूरी | दुनिया | DW | 07.08.2009
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दुनिया

पहली हिस्पैनिक जज के नाम को सीनेट की मंज़ूरी

अमेरिकी सीनेट ने सुप्रीम कोर्ट की पहली स्पानी मूल की जज सोनिया सोटोमायोर के नाम को मंज़ूरी दे दी है. 55 साल की सोटोमायोर इस पद पर पहुंचने वाली तीसरी महिला हैं.

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ओबामा ने किया था सोटोमायोर के नाम का प्रस्ताव

सीनेट ने 68-31 के अंतर से सोटोमायोर के नाम की संस्तुति कर दी. 59 डेमोक्रेटो औऱ 9 रिपब्लिकनों ने उनके पक्ष में वोट किया.

अमेरिकी संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति के जज के पद पर बहाली के बाद वो जीवनपर्यंत इस पद पर रहता है. नियुक्ति से पहले जजों को अमेरिकी राष्ट्रपति की संस्तुति भी चाहिए होती है. लेकिन आखिरी मुहर सीनेट की लगना ज़रूरी है. ओबामा ने सीनेट की मंज़ूरी को ऐतिहासिक करार दिया है. उनके मुताबिक सोटोमायोर के पास जज के रूप में काम करने की बौद्धिकता, क्षमता और उल्लास है.

ओबामा ने कहा कि ये अमेरिका के लिए भी एक अदभुत दिन है. माना जा रहा था कि सीनेट में डेमोक्रेटों का वर्चस्व है लिहाजा़ ओबामा के सोटोमायोर के नामांकन के फ़ैसले में रोड़े अटकने की संभावना कम ही थी. लेकिन अपने स्तर पर रिपबल्किनों ने सोटोमायोर के अतीत को लेकर काफ़ी सवाल उठाए. और उन्हें कई मुश्किल सवालों से जूझना पड़ा.

उनका कहना है कि सोटोमायोर के कुछ फ़ैसले और उनकी कुछ टिप्पणियां ग़ैरवाज़िब रही हैं.

सीनेट की न्यायिक समिति के सामने अपनी नियुक्ति की पुष्टि के लिए हुए सवाल जवाब के दौर में भी सोटोमायोर से ये बात पूछी भी गई थी कि आखिर उन्होंने किस आधार पर ये कहा कि एक बुद्धिमान लातिन महिला, किसी गोरे पुरुष जज के बनिस्पत, अपने मज़बूत अनुभवों के दम पर ज़्यादा बेहतर निर्णय दे सकती है. यानी अश्ववेत महिला जज गोरे पुरुष जज की तुलना में बेहतर साबित होगी. सोटोमायोर की इस कथित टिप्पणी को आलोचक नस्ली मानते हैं. लेकिन सोटोमायोर का कहना है कि ये महज़ शब्दों की बाजीगरी थी और उनका ऐसा कोई मन्तव्य नहीं था. कई महिला संगठनों और एशियाई अमेरिकी संगठनों ने सोटोमायोर की नियुक्ति का समर्थन किया है.

रिपोर्ट- एजेंसियां/एस जोशी

संपादन- एस गौड़

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