पश्चिम बंगाल चुनाव में मुद्दों पर भारी जाति और धर्म की राजनीति | भारत | DW | 09.04.2021
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भारत

पश्चिम बंगाल चुनाव में मुद्दों पर भारी जाति और धर्म की राजनीति

पश्चिम बंगाल में चल रहे विधानसभा चुनाव पहले के चुनावों से कई मायनों में अलग हैं. साम्यवादियों का गढ़ रहे बंगाल में पहली बार बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदीभाषी राज्यों की तरह जात-पांत और धर्म की राजनीति हावी है.

दस साल से बंगाल पर राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) हो या फिर दो सौ से ज्यादा सीटें जीत कर सत्ता में आने का दावा करने वाली बीजेपी, दोनों इस खेल में शामिल हैं. बंगाल की राजनीति का यह नया पहलू है. पहले वाममोर्चा और फिर तृणमूल कांग्रेस के शासन के शुरूआती दौर में यहां पहचान की नहीं बल्कि पार्टी की राजनीति हावी थी. लेकिन अबकी पहली बार चुनावी राजनीति में हिंदू, मुस्लिम, मतुआ, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दलित वोट बैंक की चर्चा हो रही है. राजनीतिक विश्लेषकों की राय में बीते चार दशकों में यह बंगाल की राजनीति में आने वाला सबसे अहम बदलाव है. खासकर बीते लोकसभा चुनावों में बीजेपी को मिली कामयाबी के बाद जाति और पहचान का मुद्दा मजबूती से उभरा है.

जाति की राजनीति

पश्चिम बंगाल में दरअसल, जाति पर आधारित राजनीति की शुरुआत टीएमसी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही शुरू की थी. तब उन्होंने अपने सियासी फायदे के लिए मतुआ लोगों को लुभाने की कवायद के तहत समुदाय की आध्यात्मिक गुरू बड़ो मां यानी बड़ी मां को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की थी. बाद में उन्होंने मतुआ तबके के कई नेताओं को विधायक, सांसद और मंत्री तक बनाया. सत्ता में आने के बाद ममता अलग-अलग तबके के लिए दर्जन भर विकास बोर्ड भी गठित कर चुकी हैं. उन्होंने इमामों व मौलवियों को भी मासिक भत्ता देने का एलान किया था. बाद में जब उन पर बीजेपी मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाने लगी तो बीते साल के आखिर में मुख्यमंत्री ने हिंदू पुरोहितों के लिए भी मासिक भत्ता शुरू कर दिया.

लोकसभा चुनावों में बीजेपी से मिले झटकों के बाद ममता ने बीते साल जुलाई में पहली बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 84 विधायकों के साथ एक अलग बैठक की थी. उसके बाद हाशिए पर रहने वाले समुदायों की दिक्कतों के निपटारे के लिए सितंबर में एक अलग सेल का गठन किया गया था. ममता ने बीते साल सितंबर में दलित साहित्य अकादमी का गठन कर उसे पांच करोड़ का अनुदान सौंपा. उसके बाद दिसंबर में तृणमूल कांग्रेस ने जब अपनी सरकार के दस साल के कामकाज पर रिपोर्ट कार्ड जारी की तो उसमें अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति तबके के लिए शुरू की गई योजनाओं का खास तौर पर जिक्र किया गया था.

बीजेपी की रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2011 में सत्ता में आने से पहले और उसके कुछ दिनों बाद तक ममता बनर्जी ने मतुआ और ऐसे कुछ अन्य समुदायों का समर्थन लेकर जाति-आधारित राजनीति शुरू करने का प्रयास जरूर किया था. लेकिन यह सब लंबे समय तक नहीं चल सका. उसके बाद वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने आरएसएस के कंधों पर सवार होकर बंगाल पर ध्यान देना शुरू किया. तब तक तृणमूल ने पहचान की राजनीति का मुद्दा छोड़ दिया था. लेकिन बीजेपी ने अपने सियासी हितों के लिए उसे लपक लिया.

अपनी इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में अनारक्षित सीटों पर भी बड़ी तादाद में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों के मैदान में उतारा था. राज्य में पार्टी का कोई मजबूत संगठन नहीं होने के बावजूद तब राज्य के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में उसे 15 से 20 फीसदी तक वोट मिले थे. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने राज्य में बड़े पैमाने पर जाति आधारित राजनीति शुरू की. इसके तहत मतुआ और नमोशुद्र समुदाय को सीएए जैसे हथियारों से लुभाने की कवायद शुरू की गई और पार्टी को इसका काफी फायदा भी मिला.

पूर्वी यूरोप से तुलना

राजनीतिक विश्लेषक समीरन चक्रवर्ती कहते हैं, "बंगाल में बीजेपी के उभार के साथ ही धर्म-आधारित राष्ट्रवाद ने पार्टी सोसाइटी को चुनौती दे दी है. बीजेपी ने अन्य पिछड़ी जातियों की राजनीति में अपना सुनहरा भविष्य देखा और उनको लुभाने में जुट गई. उसकी इस रणनीति की काट के लिए मजबूरन ममता को भी जाति-आधारित कल्याण योजनाएं शुरू करनी पड़ीं.” कोलकाता स्थित सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मइदुल इस्लाम बंगाल के बदलते परिदृश्य की तुलना पूर्वी यूरोप से करते हैं. वह कहते हैं, "यहां जातिगत पहचान की राजनीति की अहमियत बढ़ रही है क्योंकि बीजेपी ने हिंदुत्व के छाते तले विभिन्न तबकों को लाने में कामयाबी हासिल की है.”

सीपीएम और कांग्रेस तो बंगाल में जाति आधारित राजनीति के लिए टीएमसी और बीजेपी दोनों को जिम्मेदार मानती है. सीपीएम के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम कहते हैं, "सत्ता के लिए टीएमसी और बीजेपी में जाति और धर्म के आधार पर जो राजनीति शुरू की है उससे बंगाल के समाज में खाई बढ़ रही है. भविष्य में इसके नतीजे ठीक नहीं होंगे.” सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "राज्य में पहली बार चुनाव पर मुद्दों की बजाय जाति और धर्म हावी है. लेकिन बंगाल के लोग टीएमसी और बीजेपी की हकीकत समझ चुके हैं. इसलिए संयुक्त मोर्चा ही इन दोनों का विकल्प बन कर उभरेगा.”

मतदान का चौथा चरण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में चौथे चरण की 44 सीटों के लिए 10 अप्रैल को मतदान होगा. यह सीटें पांच जिलों---हुगली, हावड़ा, दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार और अलीपुरद्वार जिलों में फैली हैं. कूचबिहार और अलीपुरद्वार जिलों को छोड़ दें तो इस दौर में बाकी जगह यानी हावड़ा, हुगली और दक्षिण 24-परगना में तृणमूल कांग्रेस मजबूत रही है. हालांकि बीजेपी ने यहां पूरा जोर लगाया है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कम से कम चार रैलियां इलाके में कर चुके हैं. इस चरण में जिन सीटों पर सबकी निगाहें टिकी हैं उनमें हुगली जिले की सिंगूर के अलावा कोलकाता की जादवपुर और टालीगंज सीटें शामिल है.

सिंगूर में हुए आंदोलन ने ममता को सत्ता में पहुंचाया था. लेकिन अब पार्टी वहां बिखराव की शिकार है. चार बार टीएमसी के टिकट पर विधायक रहे रबींद्रनाथ भट्टाचार्य इस बार बीजेपी के टिकट पर मैदान में हैं. उनका मुकाबला यहां टीएमसी के बेचाराम मान्ना से है. यह दोनों नेता सिंगूर आंदोलन का अहम चेहरा रहे हैं. कोलकाता की टालीगंज सीट पर बीजेपी के बाबुल सुप्रियो का मुकाबला टीएमसी उम्मीदवार और मंत्री रहे अरूप विश्वास से है. विश्वास दो बार यह सीट जीत चुके हैं. उधर, किसी दौर में कोलकाता का लेनिनग्राद कहे जाने वाले जादवपुर इलाके में भी लड़ाई दिलचस्प है. सीपीएम ने महानगर की अपनी इस इकलौती सीट को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है तो टीएमसी इसपर कब्जा बनाए रखना चाहती है. दोनों की लड़ाई में बीजेपी अपनी जीत देख रही है.

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