″पश्चिमी संगीत से खतरा नहीं″ | मनोरंजन | DW | 18.01.2014
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मनोरंजन

"पश्चिमी संगीत से खतरा नहीं"

देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कत्थक के पर्याय बन चुके बिरजू महाराज का कहना है कि भारतीय शास्त्रीय कलाओं के विभिन्न स्वरूप काफी समृद्ध हैं और यह पश्चिमी संगीत का हर हमला झेल सकते हैं.

बिरजू महाराज का कहना है कि नई प्रतिभाओं को तराशने के लिए स्कूलों में शास्त्रीय नृत्य का प्रशिक्षण अनिवार्य कर देना चाहिए. उनकी 75वीं जयंती के मौके पर उनको पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले दिनों कोलकाता में सम्मानित किया. पेश है डॉयचे वेले के साथ उनकी बातचीत के मुख्य अंश:

भारतीय शास्त्रीय नृत्य में हाल के वर्षों में कैसे बदलाव आए हैं?

हाल के वर्षों में शास्त्रीय नर्तक अक्सर फ्यूजन की ओर आकर्षित होते रहे हैं. लेकिन यह कनफ्यूजन के सिवा कुछ नहीं है. मुख्य प्राथमिकता इस परंपरा को बनाए रखना है. शास्त्रीय नृत्य अपने आप में संपूर्ण है और इसका वजूद बनाए रखने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं है. इसकी कई शाखाएं हैं. मुझे नहीं लगता कि इसके विकास के लिए किसी और चीज का सहारा लेना चाहिए.

आप तो देश भर में सैकड़ों बच्चों को नृत्य का प्रशिक्षण देते रहे हैं. अब तक का अनुभव कैसा रहा है?

मैं जिन युवकों को शास्त्रीय नृत्य का प्रशिक्षण देता रहा हूं उनमें से पांच फीसदी ने भी अगर इसे गंभीरता से अपनाया तो बेहद खुशी होगी. मैं जीवन की आखिरी सांस तक इस कला का प्रशिक्षण देता रहूंगा.

इस कला के प्रति आपका लगाव कैसे हुआ?

मेरे लिए तो यह खानदानी विरासत थी. छह साल की उम्र में रामपुर के नवाब ने मुझे 21 रुपए के वेतन पर रखा था. वह जब मन हो, मुझे नृत्य के लिए बुला लेते थे. सात साल की उम्र में मैंने दिल्ली में दिग्गज कलाकारों के सामने पहली बार सार्वजनिक तौर पर कत्थक नृत्य पेश किया. उसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

देश में अब शास्त्रीय कलाओं की क्या स्थिति है?

धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अब इनके प्रति समर्थन बढ़ रहा है. अब युवा नर्तक कत्थक नृत्य के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. लेकिन युवाओं को याद रखना चाहिए कि यह पैसे कमाने का जरिया नहीं बल्कि एक ऐसी कला है जो समर्पण मांगती है. यह कोई नौकरी नहीं है.

इनको बढ़ावा देने के लिए क्या करना चाहिए?

युवा प्रतिभाओं को तराशने के लिए स्कूलों में शास्त्रीय नृत्य अनिवार्य कर देना चाहिए. देश में स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर ऐसे पाठ्यक्रमों की जरूरत है. कत्थक मनोरंजन नहीं बल्कि एक कला है. शास्त्रीय कलाओं को बढ़ावा देने की दिशा में और प्रयास किए जाने चाहिए.

आप युवा नर्तकों को क्या सलाह देंगे?

मैं उन्हें गुरू के प्रशिक्षण को पूरे ध्यान से अपनाने को कहूंगा. शास्त्रीय नृत्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दिमाग और आत्मा के बीच संतुलन बनाने में सहायता करता है. एक बार संतुलित होने के बाद आप अपनी गलतियों से खुद सीख सकते हैं. किसी भी कला के लिए रियाज सबसे अहम है. प्रकृति किसी भी कलाकार की सबसे अच्छी शिक्षक है. इसलिए प्रकृति की लय-ताल का गहराई से अध्ययन करना चाहिए.

आपने कई फिल्मों के लिए भी काम किया है. कैसा रहा वह अनुभव?

मुझे माधुरी दीक्षित के साथ काम करना सबसे अच्छा लगा. शास्त्रीय नृत्य के प्रति उनमें काफी लगन है और वह हमेशा सीखने को उत्सुक रहती हैं. मैं तब्बू के अभिनय से प्रभावित था. लेकिन उनके साथ किसी नृत्य पर काम नहीं कर सका. इससे पहले मैं मीना कुमारी, मधुबाला और वहीदा रहमान जैसी अभिनेत्रियों के साथ भी काम कर चुका हूं. माधुरी मुझे उसी पीढ़ी की याद दिलाती हैं. इसके अलावा मुझे विद्या बालन में काफी प्रतिभा नजर आती है. उनके लिए कभी किसी नृत्य-गीत की कोरियोग्राफी करने की इच्छा है.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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