″पश्चिमी ताकतें आतंकवाद के असली कारण से बेखबर″ | दुनिया | DW | 20.12.2018
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दुनिया

"पश्चिमी ताकतें आतंकवाद के असली कारण से बेखबर"

जानकारों का कहना है कि जब तक पश्चिमी देश आतंकवाद के असली कारणों को नहीं समझते, वे आतंकवाद को खत्म नहीं कर पाएंगे. वे मानते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जीतना आसान नहीं होगा.

जानकारों का मानना है कि जब तक पश्चिमी देश ये नहीं समझते कि जिहादी का असली कारण क्या है, वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाइयां तो जीत सकते हैं लेकिन यह युद्ध नहीं जीत सकते. अमेरिकन एंटरप्राइज संस्थान की एक रिपोर्ट 'टेररिज्म, टैक्टिक्स एंड  ट्रांसफॉर्मेशन: द वेस्ट वर्सेज द सलाफी-जिहादी मूवमेंट' में कैथरीन जिमर्मन ने कहा कि "जमीन पर कूटनीतिक जीत तो मिल रही है, मगर मौजूदा रणनीति असफल है."

जिमर्मन ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि "इस समस्या पर काम करने वाले सारे सैनिक और खुफिया विश्लेषक समझते हैं कि क्या हो रहा है." उन्होंने कहा, "उनको पता है कि वे जो कर रहे हैं, वे अस्थायी समाधान हैं. इससे अभी का खतरा तो टाल दिया जाएगा मगर ना हमको कोई स्थिरता मिल रही है ना हम आगे बड़ रहे हैं. सारी समस्या नीति और राजनीति की है."

वे आगे कहते हैं, "ये कहना बहुत आसान है कि हम उस आदमी को मार देंगे जिसने बम बनाया. मगर ये कहना ज्यादा मुश्किल है कि हमारी सहयोगी सरकार ने इस गुट को बेदखल कर दिया जिसकी वजह से ये आदमी आतंकवादी बन गया. अब वो बम बनाता है."

जानकारों का मानना है कि वैसे तो आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट को जमीन से भगा दिया गया है, मगर वे अब भी अपने पुराने छुप कर काम करने के तरीके से सक्रिय हैं. कारण यह है कि जिस नाराजगी की वजह से इस्लामिक स्टेट का जन्म हुआ था, वो अभी भी इराकी और सीरिया के लोगों में बरकरार है.

सेंटर फॉर स्ट्रेटीजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) के विशेषज्ञों का मानना है कि "जिन इलाकों की कमजोर और अप्रभावी सरकारें हैं वहां पर जिहादी आराम से शरण ले सकते हैं." सीएसआईएस ने वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों की मदद ले कर एक ऐसा नक्शा बनाया है और उसमें उन इलाकों की तुलना की है, जिसमें अलकायदा और इस्लामिक स्टेट सक्रिय हैं और जिनमें सरकार प्रभावी हैं. नतीजा साफ था, वो क्षेत्र जहां पर विद्रोही सक्रिय थे जैसे यमन, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, माली, नाइजीरिया, सोमालिया वगैरह, वहां की सरकारें भी अप्रभावी हैं.

नौसेना के रिटायर्ड जनरल जॉन एलन जो अब प्रतिष्ठित ब्रुकिंग्स संस्थान के अध्यक्ष हैं उनका कहना है कि "पश्चिमी ताकतों को चुनौतियों से आगे का सोचना चाहिए और पूछना होगा कि अगली समस्या कहां है?" आईएस से लड़ने वाले अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन में राष्ट्रपति के दूत भी रह चुके एलन का मानना है कि "हमको उन क्षेत्रों में देखना चाहिए जहां पर सरकारें कमजोर और सफल हैं. हमको वो इलाके पहचानने होंगे जहां पर रहने वालों की परिस्थितियों कि वजह से जनता के बड़े हिस्से में कट्टरता आ सकती है." उन्होंने कहा कि हम हमेशा तब बात शुरु करते हैं जब कट्टरता काफी समय से सक्रिय हो चुकी होती है. एलन का मानना है कि "मुद्दा आतंकवाद को रोकना नहीं हैं बल्कि विकास का है."

जेम्सटाउन फाउंडेशन के वार्षिक सम्मेलन में कई विशेषज्ञों ने कहा कि इराक में अलकायदा और इस्लामिक स्टेट का जन्म सुन्नियों की तकलीफों की वजह से हुआ था. ये और ज्यादा बड़ी मुसीबत तब बन गया जब शियाओं ने बगदाद की सरकार और कुछ इस्लामी इलाकों में पकड़ बना ली. अगर इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया तो जिहादी जरूर वापस आएंगे.

एनआर/आरपी (एएफपी)

   

 

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