पशुपतिनाथ में निर्माण से खतरा | दुनिया | DW | 01.08.2013
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दुनिया

पशुपतिनाथ में निर्माण से खतरा

संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक विभाग ने नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर में एक विशाल श्मशान बनाए जाने के खिलाफ चेतावनी दी है कि यह दुनिया के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में है और ऐसा करना लोगों की आंख में खटकेगा.

करीब 2.6 वर्गकिलोमीटर में फैला पशुपतिनाथ मंदिर परिसर बागमति नदी के तट पर नेपाल की राजधानी काठमांडू के पास है. हर साल भारत से हजारों श्रद्धालु यहां पूजा और दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर का कुछ हिस्सा पांचवीं सदी का है और 1979 से ही यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दे रखा है. इस तरह से यह भारत के ताजमहल और चीन की विशाल दीवार जैसी धरोहरों में है.

यूनेस्को ने मंदिर प्रशासन से विशाल विद्युत शवदाहगृह और एक सड़क बनाने पर दोबारा विचार करने के लिए कहा है. सड़क बनाने पर तो काम शुरू भी हो चुका है. यूनेस्को का मानना है कि इस निर्माण से मंदिर को नुकसान पहुंचेगा और उसे ठीक नहीं किया जा सकेगा. यूनेस्को के नेपाल प्रमुख एक्सेल प्लेथ ने इस बात की पुष्टि की कि निर्माण की योजना "यूनेस्को के लिए चिंता" है और उनसे दूसरे विकल्प ढूंढने के लिए कहा गया है, "नेपाली अधिकारियों की अनुमति लिए बगैर ही निर्माण शुरू कर दिया गया है." यूनेस्को खास तौर से दोमंजिली इमारत के निर्माण से नाखुश है जिसमें तीन अलग अलग शवदाहगृह होंगे.

बिना तैयारी के फैसले

इस निर्माण की वकालत करने वालों का कहना है कि नदी किनारे शवों को जलाने की तुलना में यह शवदाहगृह पर्यावरण के लिए ज्यादा अनुकूल होगा. प्लेथ का कहना है कि इस बारे में कोई रिसर्च नहीं किया गया है और उन्होंने चेतावनी दी है कि इमारत के ऊपरी हिस्से में विशाल चिमनी से यह देखने में भी काफी बुरा लगेगा. सड़क बनाने का काम फिलहाल रुका हुआ है लेकिन कच्ची हालत में ही सैकड़ों गाड़ियां इस पर से गुजरती देखी जा सकती हैं.

24 साल के छात्र दीपक रिजाल ने बताया, "मैं और हजारों लोग हर दिन इसका इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यह हमारे लिए सुविधाजनक है. मैं अपने घर 15 मिनट में पहुंच सकता हूं, नहीं तो मुझे एक लंबे रास्ते पर उल्टा जाना होगा."

पशुपतिनाथ मंदिर क्षेत्र विकास ट्रस्ट के सचिव गोविंदा टंडन का कहना है कि मंदिर प्रशासन यूनेस्को की चिंता दूर करने की कोशिश कर रही है और उसके विशेष दर्जे को खतरे में डालने से बचना चाहती है. टंडन ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "अगर मंदिर को दुनिया की धरोहरों से बाहर कर दिया गया तो यह हमारे लिए नुकसानदेह होगा. निर्माण के काम में कई सरकारी विभाग शामिल हैं तो हम उनसे बात कर रहे हैं."

पर्यावरण की चिंता

हालांकि इसके साथ ही उन्होंने शवदाहगृह बनाने के फैसले का बचाव भी किया. टंडन का कहना है बागमति के किनारे हर रोज दर्जनों शव लकड़ी साथ जलाए जाते हैं और इससे पर्यावरण में भारी प्रदूषण होता है.

यूनेस्को ने पशुपतिनाथ को धरोहरों से बाहर करने के लिए चेतावनी तो जारी नहीं कि है लेकिन टंडन का कहना है कि यूनेस्को ने 2015 की शुरुआत तक इस मामले को निपटा लेने के लिए कहा है. अब तक के इतिहास में केवल दो ही ऐसे नाम हैं जिन्हें यूनेस्को की धरोहरों से बाहर किया गया है. 2007 में ओमान के अरेबियन ओरिक्स अभयारण्य को धरोहरों से बाहर कर दिया गया. सरकार ने इसके संरक्षित क्षेत्र को 90 फीसदी घटा दिया था. इसी तरह 2009 में जर्मनी के ड्रेसडेन एल्बे वैली में चार लेन का पुल बनाने के बाद उसे सूची से बाहर किया गया.

एनआर/एजेए (एएफपी)

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